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The Sunday Post Special

‘धर्म के आधार पर नागरिकता कानून बनाना गलत’

सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे कई जन आंदोलनों से जुड़े रहे हैं। सूचना का अधिकार कानून के लिए वे अरुणा राय के साथ लंबे समय तक सक्रिय रहे। यूपीए सरकार के दौरान लागू सूचना का अधिकार कानून के समय वे काफी चर्चित हुए थे। उस वक्त ज्यादातर समाचार चैनलों पर वे आरटीआई के बारे में बता रहे थे। किसानों और गरीबों को उनके अधिकार दिलाने में भी निखिल का योगदान है। बताया जाता है कि देश में लागू रोजगार गारंटी योजना और आरटीआई को लाने में अरुणा राय के बाद उन्हीं का नाम आता है। वे हमेशा पृष्ठिभूमि में रहकर काम करना पसंद करते हैं। कुछ समय पहले सरकार ने आरटीआई में कई बदलाव किए हैं। जिस पर निखिल का कहना है कि सरकार के इन संशोधनों से आरटीआई कानून कमजोर होगा और सूचना आयुक्त केंद्र सरकार के अधीन हो जाएंगे। आरटीआई में इन बदलावों के अलावा नागरिकता संशोधन कानून लागू होने और उसके बाद देश में हिसंक प्रदर्शन जैसे मामलों पर निखिल डे से कुमार गुंजन की खास बातचीत के मुख्य अंश

 

नए नागरिकता संशोधन कानून पर आपकी क्या राय है?
हालांकि मेरा इस पर ज्यादा काम नहीं है। लेकिन देश का एक जागरूक नागरिक होने के कारण मैं यह जरूर मानता हूं कि यह कानून देश के लिए अच्छा नहीं है। अपने संविधान की प्रस्तावना में ही इस देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया है। इस लिहाज से धर्म के आधार पर हमें नागरिकता देने जैसा कानून बनाना गलत है। यह संविधान के विरुद्ध है। यह सरकार सत्ता के नशे में है। सरकार अभी मदमस्त होकर चल रही है। इस नशे को देश की जनता एक दिन जरूर उतार देगी।

आपने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया है। पिछले कई दिनों से देश में हिंसक प्रर्दशन हो रहे हैं। क्या विरोध प्रदर्शन सही दिशा में हो रहा है?
मेरा स्पष्ट मानना है कि आंदोलन हमेशा अहिसंक होना चाहिए। आंदोलन में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। जैसे ही किसी आंदोलन में हिंसा प्रवेश करती है, वह अपवित्र हो जाता है। लेकिन यहां यह भी देखना होगा कि आज जो हो रहा है वह आंदोलन नहीं है, बल्कि विरोध-प्रदर्शन है। सरकार के प्रति लोगों में गुस्सा है। वह गुस्सा हिंसा का रूप ले रहा है। इस प्रदर्शन से आप देश की जनता में सरकार के प्रति गुस्से को समझ सकते हैं। इसके बावजूद मैं यही कहूंगा कि विरोध-प्रदर्शन भी शांति पूर्ण होना चाहिए। उससे बड़ी से बड़ी सरकार को झुका सकते हैं।

आरटीआई एक्ट में भी पिछले दिनों संशोधन हुआ है। इसके मद्देनजर क्या इससे सूचना मांगने वाले को कठिनाई भी होगी?
सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन करके सरकार ने इस कानून की रीढ़ ही कमजोर कर दी है। यह जनता का बनाया हुआ कानून है। जनता ने ही आयोग को यह अधिकार दिया था कि वह सरकार से सूचना लेकर उन तक पहुंचाए। लेकिन जिस तरीके से सरकार ने जल्दबाजी में लोकसभा और राज्यसभा में इस कानून को पारित करा दिया, उसे देखकर तो यही लगता है कि सरकार अब जनता से सूचना का अधिकार छीन रही है।

इन संशोधनों से कानून मजबूत होगा या कमजोर?
इस संशोधन से कानून कमजोर होगा। मजबूत होने का तो सवाल ही नहीं उठता। ताजे संशोधन के बाद सूचना आयुक्त स्वतंत्र नहीं रह पाएंगे। संशोधन के पहले सूचना आयुक्त की जवाबदेही जनता के प्रति थी, लेकिन अब सूचना आयुक्तों की पहली जवाबदेही सरकार के प्रति रहेगी, क्योंकि सारी सेवा शर्तें अब केंद्र सरकार तय करेगी। सूचना आयोग या सूचना आयुक्त पहले संवैधानिक पद या संस्था थे, पर अब वे केंद्र सरकार के अधीन हो जाएंगे। ऐसे में आरटीआई कानून कमजोर ही हो रहा है।

क्या एक्ट में किए गए संशोधन का असर राज्यों के सूचना आयुक्तों पर भी होगा?
आरटीआई में हुए संशोधन पर राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद यह पूरे देश में लागू किया जाएगा और इस कानून के दायरे में मुख्य सूचना आयुक्त से लेकर सभी आयुक्त आएंगे। इनकी सेवा शर्तें केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में होंगी। आरटीआई कानून की धारा 13ए, 16 और 27 में संशोधन किया गया है। इन धाराओं के तहत मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त, राज्य मुख्य सूचना आयुक्तों और राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन व भत्ते तय किए जाते हैं। सरकार इन्हीं कानूनों में संशोधन कर सूचना आयोग को कमजोर कर रही है।

क्या इस मुद्दे को लेकर आप कोई देशव्यापी आंदोलन करेंगे? अगर हां तो इसकी रूपरेखा क्या होगी?
आरटीआई कानून में हुए संशोधन को लेकर नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टु इन्फॉर्मेशन (एनसीपीआरआई) के बैनर तले देशभर में आंदोलन चलाया जा रहा है। 01 अगस्त से पूरे देश में ‘आरटीआई लगाओ, आरटीआई बचाओ’ अभियान शुरू किया गया है। वह अभी भी कई स्थानों पर चल रहा है। इस दौरान सूचना के अधिकार में किए गए संशोधन के बारे में भी लोगों को अवगत कराया जा रहा है। लगभग दो लाख लोगों ने इस कानून में हुए संशोधन के विरोध में राष्ट्रपति को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन पत्रों, संशोधन के विरोध में किए गए हस्ताक्षरों, पोस्टकार्डों को हमने राष्ट्रपति सचिवालय में पहुंचाने की कोशिश की है। लेकिन इस दौरान हमारे साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन हम पीछे हटने वालों में नहीं हैं।

इस बिल में जो संशोधन हुआ है उस पर विपक्ष के रवैये पर आपका क्या कहना है?
विपक्ष ने बिल का विरोध तो किया, लेकिन संगठित विरोध नहीं होने के कारण यह प्रभावी नहीं रहा। वाईएसआर कांग्रेस और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) सहित बीजू जनता दल (बीजेडी) को आरटीआई में हुए संशोधन का विरोध करना था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। एक तरफ पूर्ण बहुमत वाली सरकार है और दूसरी तरफ विपक्ष एकजुट नहीं है। इस कारण सत्ता पक्ष मनमानी कर रहा है। बिल को सिलेक्ट कमेटी में भेजने के लिए सत्ता पक्ष पर दवाब बनाने की जरूरत थी, लेकिन इस कार्य में विपक्ष पूरी तरह विफल रहा।

इस मुद्दे को आप कोर्ट में ले जाएंगे?
इस मुद्दे को लेकर एनसीपीआरआई सबसे पहले जनता की अदालत में जा रही है। जो भी संशोधन किए गए हैं, उसके बारे में देशवासियों को बताया जा रहा है। साथ ही लोगों को आरटीआई कानून के प्रति और अधिक जागरूक किया जा रहा है। आरटीआई को बचाने के लिए ‘आरटीआई लगाओ, आरटीआई बचाओ’ नाम से अभियान की शुरुआत की गई है। इसके तहत देश के सभी राज्यों में लोगों से विभिन्न मुद्दों पर आरटीआई लगवाई जा रही है और इसे मीडिया से भी साझा किया जाएगा।

संशोधनों को लेकर भाजपा की दलील से आप कितने सहमत हैं?
सत्ता पक्ष का कहना है कि वो कानून को मजबूत कर रहे हैं। लेकिन मेरा मानना है कि भाजपा कानून को कमजोर कर रही है। अगर सरकार को लगता है कि इसमें कुछ संशोधनों की गुंजाइश है तो जनता से राय लेनी चाहिए थी। फिर उन पर अमल करते हुए कानून में जरूरी संशोधन करना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। यह बात समझ के परे है कि सरकार इतनी जल्दबाजी में क्यों हैं। ऐसा भी नहीं है कि सूचना आयुक्त किसी तरह का अधिकार मांगने की कोशिश कर रहे थे। आरटीआई एक संवैधानिक और मौलिक अधिकार है। इसमें किसी तरह के संशोधन की जरूरत नहीं थी लेकिन सरकार इसकी शक्ति को कम करने के लिए ऐसा कर रही है।

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