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जयंती विशेष:गांधीवादी दर्शन के एक प्रमुख व्याख्याता थे कृपलानी 

राजनीतिक, पर्यावरणविद  और गांधीवादी समाजवादी नेता आचार्य जेबी कृपलानी को राष्ट्र ने आज उनकी पुण्यतिथि के मौके पर श्रद्धांजलि दी।उन्हें सम्मान से आचार्य कृपलानी कहा जाता था। वे सन् 1947 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे। जब भारत को आजादी मिली तब भावी प्रधानमंत्री के लिये कांग्रेस में मतदान हुआ तो सरदार पटेल के बाद सबसे अधिक मत उनको ही मिले थे। लेकिन, गांधीजी के कहने पर सरदार पटेल और आचार्य कृपलानी ने अपना नाम वापस ले लिया। फिर जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री  बनाया गया।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद देश के निर्माण में उनका योगदान बहुत ही उपयोगी रहा। कृपलानी ने  भारतीय संविधान के निर्माण में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभायी। कृपलानी चंपारण सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी के सम्पर्क में आये। उन्होंने 1920 से 1927 तक महात्मा गांधी द्वारा स्थापित गुजरात विद्यापीठ में प्राधानाचार्य के रूप में नौकरी की।  कृपलानी ने 1934 से 1945 तक कांग्रेस के महासचिव के रूप मे सेवा की। उन्होंने 1921 से होने वाले कांग्रेस के सभी आन्दोलनों में हिस्सा लिया और अनेक बार जेल गये। सन् 1946 में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। कांग्रेस के गठन और सरकार के संबंध को लेकर नेहरू और पटेल से मतभेद थे। अन्त में 1951 में उन्होंने कांग्रेस को अपना इस्तीफा दे दिया।

जेबी कृपलानी का पूरा नाम जीवतराम भगवानदास कृपलानी था। उनका जन्म 11 नवम्बर 1888 में हिन्दू परिवार में हैदराबाद के सिंध इलाके में हुआ था। साल 1936 में वे सुचेता कृपलानी के साथ विवाह सूत्र में बंध गए।जेबी कृपलानी तथा सुचेता कृपलानी एक दूसरे से गांधी के आश्रम में मिले वहीं से उनके बीच नजदीकियां बढ़ी। उनकी पत्नी हमेशा कांग्रेस पार्टी के साथ रही। राजनीतिक कॅरियर में मंत्री पद भी रहीं और उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री भी बनीं।जेबी कृपलानी ने जनता सरकार के गठन में अहम भूमिका निभायी। वे गांधीवादी दर्शन के एक प्रमुख व्याख्याता थे और उन्होंने इस विषय पर अनेक पुस्तकें लिखीं। 19 मार्च 1982 को उन्होंने अंतिम सांस ली थी।

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