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The Sunday Post Special

तुम जैसे गए ऐसे भी जाता है कोई….

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई। कैफ़ी आज़मी की यह नज़्म आज बार-बार याद आ रही। अभिनेता इरफ़ान खान का यूं आकस्मिक जाना , उनके सभी चाहने वालों को भारी दुःख दे गया। वैसे तो इरफ़ान ने हमें इतने क़िरदार दिए हैं कि वे कभी हमारे बीच से नहीं जाएंगे। वे जीवंत रहेंगे।

मशहूर अभिनेता इरफ़ान खान का 29 अप्रैल को निधन हो गया। उन्हें सांस लेने में दिक्कत थी। 25 अप्रैल दिन शनिवार को इरफ़ान की मां सईदा बेगम का जयपुर में निधन हो गया था। लॉकडाउन के चलते इरफ़ान अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाए थे। उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ही उन्हें अलविदा कहा था।

2018 में उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर बताया था कि वह न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर से पीड़ित हैं। हालांकि, इसका पता चलते ही वह लंदन अपने इलाज के लिए रवाना हुए। सालभर से ज्यादा समय तक वह लंदन में रहे और वहां उनका इलाज चलता रहा।

इऱफान खान को याद करते हुए वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजित राय ने एक संस्मरण लिखा है ,आप भी पढ़िए,


“इरफ़ान खान से मेरी पहली मुलाकात प्रशांत कश्यप ने 28 सितंबर 2013 को मुंबई के मैरिएट होटल में कराई थी। जब मैं जागरण फिल्म फेस्टिवल का कंसल्टेंट हुआ करता था। ये तस्वीरें भी प्रशांत की ही खींची हुई है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से आने के कारण उनमें विनम्रता और समझ दोनों थी। हालांकि सिनेमा में मेरी उनसे पहचान ” मकबूल ” ( विशाल भारद्वाज, 2004) से हो चुकी थी। जब मैं एफटीआईआई पुणे से सर्टिफिकेट कोर्स करके लौटा ही था।
उसके बाद के संवाद के कई संदर्भ है जिसमें मुख्य बात थी उनपर किताब लिखना। हालांकि शिवकेश मिश्रा भी इस दिशा में कुछ कर रहे थे और इरफान से नियमित संपर्क में थे। मैंने अपने अक्षम्य आलस्य और लापरवाही से एक बड़ा अवसर खो दिया। उम्मीद है शिवकेश इसे अब भी पूरा करेंगे।
इरफ़ान खान का अचानक चले जाना हम सबको स्तब्ध और नि: शब्द कर गया। ओम पुरी के बाद वे अकेले ऐसे अभिनेता थे जिनकी ख्याति विश्व सिनेमा में थी। ” द वारियर ” ( आसिफ कपाड़िया, 2001), ” द नेमसेक ” ( मीरा नायर, 2006) ” ” अ माईटी हार्ट” ( विलियम विंटरबाटम, 2007),” “स्लमडाग मिलिनायर”( डैनी बायले, 2008), ” लाइफ आफ पाई”(अंग ली, 2012) , ” किस्सा ” ( अनूप सिंह, 2014), ” इनफरनो “( रोन हावर्ड, 2016) आदि कई अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में उनका काम बेमिसाल है। मैं यहां उनकी हिंदी फिल्मों की चर्चा नहीं कर रहा हूं, इसका यह मतलब नहीं है कि उनका काम कम महत्वपूर्ण है। वे एक क्षण में कमाल कर जाते थे।
उनसे जब भी मुलाकात हुई, उनका सूफियाना खिलंदड़ापन दिल में उतरता चला गया। उनकी बातों हमेशा हमारा पीछा करती थी। कान फिल्म फेस्टिवल में उनके चर्चे होते थे। अभी पिछले महीने ही मुंबई में एनडीटीवी के फिल्म पत्रकार प्रशांत सिसोदिया से उनके बारे में ढेर सारी बातें हुई। उनके निधन से विश्व सिनेमा में भारतीय प्रतिभा की बहुत बड़ी क्षति है। अभी उन्हें बहुत कुछ करना था। विनम्र श्रद्धांजलि।”

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