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‘हरिजन’ अख़बार में गांधी के सम्पादकीय का यह अंश जरूर पढ़ना चाहिए

 

9 मई 1936 को महात्मा गांधी ने अपने अख़बार ‘हरिजन’ के संपादकीय में लिखा था कि,
“कोई संस्कृति जिंदा नहीं रह सकती, अगर वह दूसरों का बहिष्कार करने की कोशिश करती है। इस समय भारत में शुद्ध आर्य संस्कृति जैसी कोई चीज मौजूद नहीं है। आर्य लोग भारत के ही रहने वाले थे या ज़बरन यहां आ घुसे थे, इसमें मुझे बहुत दिलचस्पी नहीं है। मुझे जिस बात में दिलचस्पी है वह यह है कि मेरे पूर्वज एक दूसरे के साथ बड़ी आजादी के साथ मिल गए और मौजूदा पीढ़ीवाले हम लोग उस मिलावट की उपज हैं।”

महात्मा गांधी आदर्श समाज व्यवस्था के निरर्थक चित्र खींचने में विश्वास नहीं रखते थे। इस आदर्श को वे ध्रुव तारे से अधिक नहीं मानते थे, जिसकी सहायता से मानव जीवन के तूफानों में से खेकर जीवन नैया को पार लगाया जा सकता है। दूर के दृश्य उन्हें लुभाते नहीं थे।इसलिए उन्होंने हमें आदर्श समाज व्यवस्था का विस्तृत चित्र देने का प्रयास नहीं किया। उन्हें साधनों की अर्थात इस बात की ज्यादा चिंता थी कि आदर्श को ध्यान में रखते हुए वर्तमान का निर्माण कैसे किया जाए। उन्हें विश्वास था कि अगर हम अपने तात्कालिक वर्तमान काल को दृष्टि में रखकर अपने आदर्श पर अमल कर सकें, तो हमारा उद्देश्य अवश्य सिद्ध होगा।

अपने जीवनकाल में महात्मा गांधी ने चार अख़बारों का प्रकाशन किया। इसमें ‘इंडियन ऑपिनियन’, ‘यंग इंडिया’, ‘नवजीवन’ और ‘हरिजन’ शामिल हैं।

यहां ‘हरिजन’ अख़बार में लिखे महात्मा गांधी के संपादकीय के कुछ अंश प्रस्तुत है,

9 जुलाई 1938 को ‘हरिजन’ में लिखे अपने संपादकीय में गांधी ने लिखा,”मैं चाहता हूं कि उस भाषा(अंग्रेजी) में और इसी तरह संसार की अन्य भाषाओं में जो ज्ञान भंडार भरा पड़ा है, उसे राष्ट्र अपनी ही देशी भाषाओं के द्वारा प्राप्त करे। मुझे रविन्द्रनाथ की अपूर्व रचनाओं की खूबियां जानने के लिए बंगला सीखने की जरूरत नहीं। वे मुझे अच्छे अनुवाद से मिल जाती हैं। गुजराती लड़कों और लड़कियों को ‘टॉलस्टॉय’ की छोटी -छोटी कहानियों से लाभ उठाने के लिए रूसी भाषा सीखने की आवश्यकता नहीं। वे तो उन्हें अच्छे अनुवादों के जरिये सीख लेते हैं। अंग्रेजों को यह गर्व है कि संसार में जो उत्तम साहित्य उत्पन्न होता है,वह प्रकाशित होने के एक सप्ताह के भीतर सीधी सादी अंग्रेजी में उस राष्ट्र के हाथों में आ जाता है। शेक्सपीयर और मिल्टन ने जो कुछ सोचा या लिखा है, उसके उत्तम भाग को प्राप्त करने के लिए मुझे अंग्रेज़ी सीखने की जरूरत क्यों हो?
यह अच्छी मितव्ययिता होगी यदि हम विद्यार्थियों का एक अलग वर्ग ऐसा रख दें, जिसका काम यह हो कि संसार की भिन्न-भिन्न भाषाओं में से सीखने की उत्तम बातें वह जान ले और उनके अनुवाद देशी भाषाओं में से सीखने की उत्तम बातें वह जान लें और उनके अनुवाद देशी भाषाओं में करके देता रहे।”

ऐसे ही न जाने कितने विचार गांधी हमें दे गए जो वास्तव में कठिन परिस्थिति में एक सरल उपाय के समान हमारे सामने है।
हमें गांधी के सादगी और आर्थिक स्वयं पूर्णता वाले छोटे सामाजिक संगठन के उस मार्ग पर चलना चाहिए, जिसमें व्यक्ति सेवा और त्याग के द्वारा सबके लिये जिएगा।

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