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‘घिसते-घिसते धारदार हुआ 370’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार अपनी बेबाक बयानी को लेकर अक्सर सुर्खियों में रहे हैं। संघ के आनुसांगिक संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के अलावा वे जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से विस्थापित कश्मीरियों के पुनर्वास को लेकर प्रयासरत रहे हैं। कई वर्ष वे जम्मू-कश्मीर में संगठन का कामकाज देखते रहे। 370 के
हटने पर कुमार गुंजन की उनसे विशेष बातचीत

 

क्या 370 की समाप्ति कश्मीर की सभी समस्याओं का हल है?
अनुच्छेद 370 और 35ए अलगाववादी, आतंकवादी और भारत को तोड़ने वाली धाराएं थीं। इसने कश्मीर, कश्मीरी और कश्मीरियत का अहित किया है। वहां इस धारा के ही कारण पाकिस्तान का झंडा बुलंद हुआ और हिंदुस्तान के झंडे का अपमान वहां पर जन्मा। इस धारा का एक भी लाभ गिनाने वाला कोई एक इंसान नहीं मिलता। यदि जब उसके होने का लाभ नहीं है, तो उसकी समाप्ति ही लाभ का कारण बनेगी। ये कहने में कोई हर्ज नहीं है।

तो क्या 70 सालों में एक नाजायज कानून कश्मीर को चलाता रहा?
मैंने जम्मू कश्मीर में रहते हुए और बाद में भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि कोई एक ऐसा आलेख तो लिखो जिसमें धारा 370 से हुए 10 फायदे हों। इस्लाम के रूप में, मुसलमान के रूप में, हिंदुस्तानी के रूप में, कश्मीरी के रूप में, आज तक किसी ने इसके लाभ नहीं बताएं। सदन में हुई 2 दिन की बहस में भी किसी ने इस धारा के लाभ नहीं बताए। तो इसका मतलब यही है कि इसे मात्र थोपा गया था।

ज्यादातर लोग कश्मीर समस्या का दोषी कांग्रेस को मानते हैं, आप इस बात से कितना इत्तेफाक रखते हैं?
जब भारत का विभाजन हुआ, पूरा जम्मू-कश्मीर हिंदुस्तान में आया था। महाराजा हरि सिंह ने विलय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करके पूरे कश्मीर का विलय भारत में किया था। उस समय जम्मू कश्मीर का क्षेत्रफल 2,22,000 वर्ग किलोमीटर था। इसके बाद 1948 में पंडित नेहरू ने किसी भी व्यक्ति को विश्वास में लिए बिना यूएन में जाने का फैसला किया। इसी फैसले की वजह से 72 हजार वर्ग किलोमीटर कश्मीर क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में चला गया। यह कदम भारत और कश्मीर के साथ बहुत बड़ा विश्वासघात था। तिब्बत हड़पने को बाद चीन भारतीय हिमालय के ऊपर आक्रांता बनकर आया।1962 में अक्साई चीन पर उसने कब्जा कर लिया। पंडित नेहरू ने कहा कि क्या हो गया अगर अक्साइ चीन का कब्जा हो गया, वहां तो एक भी घास का तिनका नहीं उगता था। बंजर जमीन थी। ऐसे 43000 वर्ग किलोमीटर लद्दाख का क्षेत्र चीन के कब्जे में चला गया। कुल मिलाकर 121000 वर्ग किलोमीटर भारत का क्षेत्र पाकिस्तान और चीन के कब्जे में है। यह पंडित नेहरू और कांग्रेस की ही देन है।

क्या आपको लगता है कश्मीर समस्या पर पहला प्रयास वर्तमान सरकार ने किया प्रयास है?
14 नवंबर 1962 में देश की संसद में एक प्रस्ताव पारित हुआ कि संसद संकल्प करती है कि वह चीन से एक-एक इंच भूमि भारत की खाली करवाएगी। 22 फरवरी 1994 को फिर से दोनों सदनों का सम्मेलन हुआ। उसमें एक में प्रस्ताव पारित हुआ कि पाकिस्तान भारत में सब विवाद खत्म हो गए हैं। केवल जो पाकिस्तान के अवैध कब्जे में जम्मू-कश्मीर के रूप में भारत का हिस्सा है, उसका एक-एक इंच खाली करवाना शेष बचा है। दोनों संसदीय संकल्प हैं। इसमें लद्दाख का हिस्सा लद्दाख और जम्मू का एक-एक इंच खाली करवाना भारत का लक्ष्य है। जिसको कि अभी तक के सत्ताधारीयों ने नजरअंदाज किया। इसकी अवहेलना होती रही है। आज की सरकार ने इन दोनों प्रस्तावों को ध्यान में रखकर कदम आगे बढ़ाया है।

370 के पक्ष में उस दौरान सभी बड़े नेता थे, इस बात में कितनी सच्चाई है?
370 कांस्टेंट असेंबली में जब आया तो जो लोग कहते हैं उसका सबने समर्थन किया वह झूठ बोलते हैं। डॉ भीमराव अंबेडकर ने स्वयं विरोध किया डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जनसंघ की फॉरमेशन के बाद प्रजा परिषद के आंदोलन को समर्थन देते हुए एक देश में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान नहीं चलेंगे को लेकर मुखर थे। श्यामा प्रसाद जब जम्मू कश्मीर गए तो शेख अब्दुल्ला ने उन्हें वहां बंदी बना लिया। धीरे-धीरे बंदी गृह में ही स्लो पॉइजन देते रहे। जिससे उनकी मौत हो गई। डॉक्टर मुखर्जी की माताश्री ने पंडित नेहरू को पत्र लिखकर इस विषय का संज्ञान लेने को कहा। जांच की मांग हुई। लेकिन पंडित नेहरू ने इसकी अनदेखी की। डॉक्टर लोहिया खुद हमेशा से 370 के खिलाफ रहे हैं। इन्हीं विरोधों के चलते पंडित नेहरू ने एक छलावा किया कि यह धारा खुद-ब-खुद घिसते-घिसते घिस जाएगी और समाप्त हो जाएगी। पंडित नेहरू के बाद से आज तक इसको ढोया जा रहा है। यह एक ऐसा खतरनाक हथियार था कि यह जितना घिसा उतना तीखा और नुकीला होता चला गया। यह देश की अखंडता और एकता का कत्लेआम करता रहा। उसने ऐसा भयानक आतंकवाद कश्मीर में जन्मा कि वहां 41 हजार से ज्यादा लोग मर चुके हैं।

आज दिल्ली में एक वर्ग जिसमें कुछ कश्मीरी छात्र भी हैं वह सरकार का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार ने ये फैसला जबरन लिया है?
मैं जम्मू कश्मीर में 17 साल रहा हूं। आतंकवादियों ने तीन चार बार मेरा अपहरण करने की कोशिश की। धमकी भरे पत्र भी भेजे। मैं हमेशा ऐसे मजाक में कहा करता था कि मुझे पहला ‘प्रेम पत्र’ आतंकवादियों से ही मिला कि जबान नहीं संभाले तो ऊपर भेज देंगे। वे असफल हुए। मेरा कुछ भी बुरा नहीं कर पाए। मैं इसके लिए ईश्वर के प्रति आभारी हूं। लेकिन पूरा जम्मू रीजन 370 और 35-ए समाप्त हो, इसका पक्षधर था।

आप किस आधार पर कह रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर के लोग धारा 370 के खत्म होने के पक्षधर हैं?
जम्मू रीजन क्षेत्रफल में भी कश्मीर से कहीं अधिक है और जनसंख्या में भी कहीं अधिक है। लद्दाख क्षेत्रफल में बहुत अधिक है और जनसंख्या भी उसकी संतुलित है। वह भी 370 और 35ए के विरुद्ध था। यहां तक कि कश्मीर घाटी में लाखों कश्मीरी पंडित, डोगरा, शिया, बोरा, गुज्जर और बकरवाल ये सभी समुदाय धारा 370 और 35 ए के विरोधी थे। वहां चंद लोग ही थे जो सारी योजनाओं और पैसे को खा रहे थे। वह लोगों को भड़का रहे थे। इसका फल यह हुआ कि जन्नत जहन्नुम में बदल गई। वहां की अमन सलामती और तरक्की को बबार्दी में बदल दिया। यह बिल पास करके सरकार ने लद्दाख में होने वाले अत्याचारों से भी लद्दाख को मुक्त किया है। जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित करके प्रदेश का दर्जा दे दिया। साथ ही आश्वासन दिया है सब कुछ सामान्य होते ही जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा।

कश्मीर के भविष्य को आप अब किस तरह देख रहे हैं?
यह शुरुआत है। आने वाले समय में कश्मीर भारत से और तेजी से जुड़ेगा। टूरिज्म हो व्यापार हो शिक्षा हो नीति हो समझौते हों या कोई भी फैसला हो। अब जम्मू-कश्मीर उससे सीधा लाभान्वित होगा। सकारात्मक बदलाव के साथ ही घाटी में हिंसा, अलगाववाद और नफरत को खत्म करने का एक मौका जरूर मिलेगा। जिसका बदलाव जल्दी जम्मू कश्मीर में देखने को मिलेगा। अब किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं रहेगा। लगभग 106 से अधिक ऐसे संसदीय कानून हैं जिन्हें आज तक पारित होने नहीं दिया गया। जिसमें तिरंगे के सम्मान का कानून भी आज तक वहां पारित नहीं हुआ। यह कैंसर अब इससे आगे ना बढ़े इसकी रोकथाम के लिए जरूरी था कि हालात बदले जाएं और क्रांतिकारी कदम उठाया जाए। इसी क्रांतिकारी कदम को वर्तमान सरकार नरेंद्र मोदी, अजीत डोभाल, राजनाथ सिंह, अमित शाह इन सारी टीम ने मिलकर उठाया और एक बड़ा क्रांतिकारी बदलाव हुआ।

देश में बहुत से नक्सल प्रभावित क्षेत्र हैं। वहां भारत का कानून भी लागू है। क्या वहां से आतंक की समस्या समाप्त हो गई है?
प्राथमिक तौर पर देश में जो अलगाववादी ताकतें थीं उनको फिलहाल यह पता चल चुका है कि देश में एक ऐसी सरकार है जो अलगाववाद के सामने झुकना पसन्द नहीं करेगी। वह आयरन हैंड गवर्नमेंट है। इसलिए समय-समय पर जो अलगाववादी ताकतें सिर उठाती थी उन पर लगाम लगेगी। दूसरी बात जम्मू कश्मीर में जो पाकिस्तान गतिविधियां करता था उस पर एक बहुत बड़ी लगाम लगने वाली है। तीसरी बात देश के अंदर पाक ऑक्यूपाइड कश्मीर और अक्साई चीन को आजाद कराने की दिशा में एक जन जागरण अब आगे बढ़ेगा। साथ ही अब जम्मू कश्मीर से संपर्क बढ़ जाएगा और जम्मू-कश्मीर विकास की तरफ बढ़ेगा।

आपको लगता है पाकिस्तान इतने आसानी से मान जाएगा?
सन 1986 में जम्मू-कश्मीर में मैंने ‘मुस्लिम डायलॉग’ में कहा था कि जो जन्मता है वह मरता है। पाकिस्तान का जन्म हुआ है उसकी जन्म तिथि है। हिंदुस्तान अजन्मा है। सभी धार्मिक रीति और परंपराएं यही कहती हैं कि जो जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है। पाकिस्तान में अपने आप टूटने और बिखरने का सिलसिला शुरू होगा। 370 की समाप्ति उस सिलसिले की पहली कड़ी थी। पाकिस्तान पूरी तरह से चीन की गिरफ्त में जा चुका है। चीन दिन-प्रतिदिन उस पर अपना कब्जा बढ़ाता जा रहा है। अब पाकिस्तान में पख्तूनिस्तान, बलूचिस्तान, जियोतिस्तान, बालटिस्तान, गुलाम कश्मीर, सिंध, पंजाबी पाकिस्तान के कई क्षेत्र बगावती सुर में आ गए हैं। जो आवाजें लम्बे समय से पाकिस्तान में कुचली जा रही थीं वही आवाजें आज विरोध का स्वर मुखर कर रही हैं।

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