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The Sunday Post Special

अनावश्यक चुनाव थोपने वाले नेताओं से ही वसूला जाए चुनाव खर्च

भारत की सबसे पुरानी सियासी पार्टी इस समय संकट के दौर से गुजर रही है। पार्टी के नेता अपने सिद्धांतों को तिलांजलि देकर एक के बाद एक भाजपा में शामिल हो रहे हैं। वह पार्टी जिसने कभी आजादी के आंदोलन में पूरे देश को एक कर दिया था, आज अपने कार्यकर्ताओ को ही एक नहीं संभाल पा रही है। माना कि भारतीय जनता पार्टी इन लोगों को अपनी तरफ येन-केन-प्राकरेण बुला रही है, पर इन कांग्रेस नेताओं को क्या हो गया है जो किसी भी लालच में आकर अपने विचारों की तिलांजलि दे रहे हैं।

माना यह प्रलोभन बहुत बड़ा होगा जिससे कि उनके जीवन में काफी सुख आ जाए। इसलिए कांग्रेस पार्टी को इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए कि संगठन का पूरी तरह से कायाकल्प किया जाए।कांग्रेसियों की पूरी राजनीति अब इस पर आ गई है की किसी प्रकार हम विधान सभा या लोकसभा का टिकट पा जाएं, जीतकर सदन में पहुंचें तथा सरकार बनने पर मंत्री बन जाए। यदि मंत्री न बन पाएं तो मौके की तलाश करें।

विपक्षी दलों से मिलकर सरकार को गिराकर उनके साथ सहयोग कर कोई मंत्री पद प्राप्त करें। दूसरी तरफ जो भी दल इसमें सरकार गिराने का प्रयास करता है वह भी सभी नीतियों का त्यागकर सबसे पहले सरकार को अपदस्थ करने में लग जाता है।चाहे उसके बाद वह उसे चला पाए या न चला पाए। इससे देश या प्रदेश का कितना भी नुकसान हो उसे परवाह नहीं। जब इस फरेब के साथ सत्ता का परिवर्तन होता है तब सरकार का कितना पैसा बर्बाद होता है वह भी किसी से छुपा नहीं है। सरकार बनने में ,उसकी व्यवस्था करने में करोड़ो रुपये व्यय होते है। फिर यदि सरकार नहीं चल पाई तो मध्यावधि चुनाव में अरबो रुपये का व्यय होता है।

यह रुपया जनता का है जो प्रदेश और देश के विकास में खर्च होना चाहिए उसे यह राजनेता अपने स्वार्थ में बर्बाद करते है। क्या इनकी सजा हमें इन्हें नहीं देनी चाहिए। आप मध्य प्रदेश का उदाहरण लें जहां लगभग 20 विधायकों ने अपना त्याग पत्र दिया है। अब अगर इनका त्याग पत्र स्वीकार हो जाता है तो इनकी सीटों पर दोबारा चुनाव होगा। इस चुनाव में जो पैसे की बर्बादी होगी उसका जिम्मेवार कौन होगा? और उसके बाद अगर भाजपा की सरकार बनती है और कुछ विधायक उनसे नाराज होकर स्तीफा देते हैं तो मध्यवधि चुनाव की नौबत आएगी। फिर जो प्रदेश के विकास में पैसे का सदुपयोग होना चाहिए वह चुनाव में खर्च होगा।

इसी प्रकार अभी गुजरात में कांग्रेस के चार विधायकां ने अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दिया, उनका त्यागपत्र स्वीकार भी हो गया। अब यहां फिर उपचुनाव होंगे उस पैसे की बर्बादी का जिम्मेवार कौन होगा? गुजरात में तो कोई सरकार भी जाने वाली नहीं थी वहां तो इन विधायकां से इसलिए त्यागपत्र दिलवाया गया कि राज्यसभा में भाजपा का प्रत्याशी कैसे जीत जाए वरना यही समय त्यागपत्र देने के लिए माननीय सदस्य ने क्यों चुना?

अब जरा भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार का काम देखिए। आप सभी जानते हैं कि प्रदेश सरकार के विधायकों या राज्यसभा के सदस्यों से इस्तीफा दिलवाने का काम कौन कर रहा है, क्योंकि यह सभी इस्तीफा देने के बाद भाजपा में ही ज्वाइन कर रहे हैं।

उपचुनावों में उन्हीं लोगों को टिकट भी मिल रहा है जिन्होंने अपनी सीट से त्यागपत्र दिया है। लोकतंत्र में सरकार की मालिक जनता होती है। अब आप लोग तय करे कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें नहीं है क्या भाजपा द्वारा उनको तोड़ना न्यायोचित है? क्या सरकार का अरबों रुपया उपचुनाव या मध्यवधि चुनाव में बर्बाद करना उचित है? यह आप पर छोड़ता हूं। पर इस पर मेरा सुझाव है

कि अब कानून में संशोधन करने का समय आ गया है उसे करना चाहिए। आप अपना अमूल्य वोट भी किसी प्रत्याशी को चुनने के लिए देते है वह इस विश्वास के साथ कि वह आपके क्षेत्र की सेवा पूरे पांच वर्ष उसी पार्टी के सदस्य रह कर करने का वादा करता है। यदि वह करने में असफल होता है यो यह उसकी वादा खिलाफी होगी।

वह अपनी सदस्यता से त्यागपत्र देते हुए जिन आदर्शों और सिद्धांतां की दुहाई देता है या उसके बदले उसे रुपया या कोई प्रलोभन मिला हो हमें उससे कोई सरोकार नहीं। यह उसका ईमान जाने। पर इसकी सजा तो उसे ही मिलनी चाहिए या आपको मिले? हाल ही में केंद्र और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुई निर्णय लिया कि दंगा होने पर जो नुकसान दंगाइयों द्वारा किया जाएगा उसकी भरपाई दंगाइयों से कराई जाएगी। यह एक अच्छा कदम है कम से कम आंदोलनों में आगजनी और तोड़-फोड़ करने से पहले लोग सोचेंगे।

इसलिए हमें संविधान में संशोधन करना चाहिए। मेरा सुझाव है कि जो भी सदस्य विधायक या सांसद बनने के बाद अपने पद से त्याग पत्र देता है तो उसके क्षेत्र में होने वाले उपचुनाव का सारा खर्चा उसे उठाना पड़ेगा। यदि ऐसा वह करता है तो उसका त्यागपत्र उचित रहेगा। यदि सहमत हो तो जनमत तैयार कर सरकार पर दबाव बनाए और उसके लिए यही उचित होगा जिस प्रत्याशी ने आपके साथ धोखा किया उसे दंड देकर आने वाले उपचुनाव में पराजित करे।

-ओंकार नाथ सिंह (महासचिव, उत्तर प्रदेश कांग्रेस)

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