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पुण्यतिथि विशेष: वकालत छोड़ आजादी के आंदोलन में शामिल हो गए थे मोतीलाल नेहरू

पुण्यतिथि विशेष: वकालत छोड़ आजादी के आंदोलन में शामिल हो गए थे मोतीलाल नेहरू

इलाहाबाद के एक प्रसिद्ध अधिवक्ता मोतीलाल नेहरू की आज पुण्यतिथि है। एक जमाने में उनकी गिनती देश के सबसे धनी लोगों में होती थी। तब वो देश में सबसे महंगे वकील कहे जाने लगे थे। जलियांवाला बाग काण्ड के बाद 1919 में कांग्रेस के वे पहली बार अध्यक्ष बने। 1923 में उन्होने देशबंधू चितरंजनदास के साथ काँग्रेस पार्टी से अलग होकर अपनी ‘स्वराज पार्टी’ की स्थापना की, जिसके जरिए वे ‘सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली’ पहुंचे और बाद में विपक्ष के नेता बन गए। फिर 1928 में कलकत्ता में दोबारा कांग्रेस के अध्यक्ष बने।

1928 में काँग्रेस द्वारा स्थापित भारतीय संविधान आयोग के भी वे अध्यक्ष बने। इसी आयोग ने ‘नेहरू रिपोर्ट’ प्रस्तुत’ की थी। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ‘पी सद्शिवम’ ने उनके बारे में ‘इंडियन लॉ इंस्टीट्यू’ट के एक जर्नल में लिखा, “वो लक्षणरहित वकील थे। अंग्रेज जज उनकी वाकपटुता और मुकदमों को पेश करने की उनकी खास शैली से प्रभावित रहते थे। शायद यही वजह थी कि उन्हें इतनी जल्दी और बढ़िया तरीके से सफलता मिली। तब भारत के किसी वकील को ग्रेट ब्रिटेन के प्रिवी काउंसिल में केस लड़ने के लिए शामिल किया जाना लगभग दुर्लभ था। लेकिन मोतीलाल ऐसे वकील बने, जो इसमें शामिल किए गए।”

भारतीय सरकार को सौंप दिया था ‘आनंद भवन’

इलाहाबाद के ‘सिविल लाइन्स’ में उन्होंने एक विशाल हवेली खरीदी, जिसका नाम रखा गया था ‘आनंद भवन’। बाद में इस भवन को इंदिरा गांधी ने भारतीय सरकार को सौंप दिया था, जिसमें संग्रहालय खोला गया। 1920 में कलकत्ता के स्पेशल कांग्रेस के दौरान वो पहली पंक्त‍ि के नेता थे, जिन्होंने ‘असहयोग आंदोलन’ को अपना समर्थन दिया था। मोतीलाल नेहरू की छोटी बेटी कृष्णा ने अपनी आत्मकथा में लिखा, “उनका परिवार तब पाश्चात्य तरीके से रहता था, जब भारत में इसके बारे में सोचा भी नहीं जाता था। डायनिंग टेबल पर एक से एक महंगी क्राकरीज और छूरी-कांटे होते थे।”

 

महात्मा गांधी के बहुत मोतीलाल नेहरू

1920 में जब मोतीलाल नेहरू ने महात्मा गांधी के साथ बातचीत की और उनके करीब आए तो वो वकालत छोड़कर देश की आजादी के आंदोलन में शामिल हो गए। हालांकि, तब मोतीलाल नेहरू बहुत ऊंचाई पर थे बहुत पैसा कमा रहे थे। ये भी कहा जाता है कि उस समय जब भी कांग्रेस आर्थिक संकट से गुजरती थी तो मोतीलाल उसे धन देकर उबारते थे। उनका निधन सात फरवरी 1931 को लखनऊ में हुआ।

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