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The Sunday Post Special

भारतीय जनता पार्टी को यूं मिला ‘कमल’ निशान

देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा ‘मेरा देश, मेरा जीवन’ में भारतीय जनता पार्टी के झंडे से लेकर पार्टी के नाम तक के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है कि शुरू से ही पार्टी का जोर जनसंघ पर वापस लौटने का नहीं बल्कि एक नई शुरुआत करने का था।

पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों ने नई पार्टी के नाम पर गहन विचार-विमर्श किया। कुछ लोग इसे भारतीय जनसंघ का नाम देना चाहते थे। पर बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के दिए गए नाम ‘भारतीय जनता पार्टी’ को भारी समर्थन मिला। इसके साथ ही हम नई पहचान के साथ एक नई पार्टी के रूप में सामने आए।

आडवाणी ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि जब पार्टी बनी तो एक नया चिह्न और झंडा को भी अपनाया गया। जनसंघ के ‘दीये’ की जगह ‘कमल’ ने लिया। नया झंडा कुछ-कुछ जनता पार्टी से मिलता था। इसका एक तिहाई हिस्सा हरा और दो तिहाई केसरिया था, जिसमें फूल बना था। बाद में कमल बीजेपी का चुनाव चिह्न भी बन गया। उन्होंने लिखा है कि जनता पार्टी से अलग होने के बाद हमने अपनी पहचान बना ली थी, इसलिए जरूरी था कि हम मतदाताओं के पास जनता पार्टी के हलधर किसान से अलग चुनाव-चिह्न के साथ जाएं।

आडवाणी ने लिखा है कि हमारे पास पार्टी को चुनाव आयोग के पास पंजीकृत कराने का पर्याप्त समय नहीं था, न ही हम अपने पार्टी चिह्न पर चुनाव लड़ सकते थे क्योंकि हमें अभी तक यह आवंटित नहीं किया गया था। पार्टी ने मुझे तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एस एल शकधर से इस मुद्दे पर विचार-विमर्श के लिए जा रहे प्रतिनिधिमंडल की अध्यक्षता करने को कहा।

उन्होंने आगे लिखा है। शकधर ने मुझे कहा, ‘मेरे लिए इस समय एक नई पार्टी को शामिल करना कठिन है, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और आपकी पार्टी अभी तक पंजीकृत भी नहीं हुई है। फिर भी आप उनमें से कोई चुनाव चिह्न पसंद कर सकते हैं जो स्वतंत्र उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध हैं, मैं आपके सभी उम्मीदवारों को समान चिह्न अपनाने की अनुमति दूंगा। जिससे कि उनकी एक समान संगठनात्मक पहचान बन सके।’ आडवाणी ने आगे लिखा है, ‘हमने उपलब्ध चिह्नों को देखा। हमें देखकर खुशी हुई कि कमल भी उनमें से एक था। मैंने चुनाव आयुक्त से पूछा कि क्या वे हमें कमल चिह्न दे सकते हैं? शकधर, जो जानते थे कि हमने कमल इसलिए चुना है कि क्योंकि इसे पार्टी के दिल्ली में हुए स्थापना अधिवेशन में झंडे के लिए चुना गया था, हमारी ओर देखकर मुस्कुराए और कहा कि आपका अनुरोध स्वीकार्य है। लेकिन मैंने यह भी देखा कि स्वतंत्र उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध चिह्नों में गुलाब भी था। फूलवाले दोनों चिह्न काफी मिलते-जुलते लगते थे। तब मैंने शकधर से अनुरोध किया कि क्या वे गुलाब को सूची से हटा सकते हैं, चूंकि मतदाता एक मतपत्र पर दो फूल देखकर दुविधा में पड़ जाएंगे। वे फिर मुस्काराएं और कहा कि अनुरोध स्वीकार है।’

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