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भाजपा में तार्किक बात करने वालों की कमी है: सुब्रमण्यम स्वामी

भाजपा में तार्किक बात करने वालों की कमी है: सुब्रमण्यम स्वामी

भारतीय राजनीति में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी एक ऐसा चेहरा हैं जो अपनी बेवाक बयानी के लिए जाने जाते हैं। विदेशों से उच्च शिक्षा प्राप्त डॉ. स्वामी की पहचान राजनेता के साथ ही एक अच्छे अर्थशास्त्री, शिक्षाविद् और अधिवक्ता की भी है। देश के वाणिज्य, विधि एवं न्याय मंत्री के अलावा अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग के अध्यक्ष भी रहे। विवादित मुद्दों पर अपनी सरकार के लिए संकटमोचक की भूमिका में रहे, तो कई बार उनके बोल सरकार के लिए उलझन पैदा करने वाले भी साबित हुए। जिन विवादित मुद्दों से राजनेता कतराते हैं उन पर डॉ. स्वामी खुलकर बोलते रहे हैं। उनसे कुमार गुंजन की विशेष बातचीत के मुख्य अंश :

 

शाहीन बाग में हो रहे आंदोलन को आप कैसे देखते हैं?
यह साफ है, सभी देशद्रोही हैं। इनका सारा पैसा बाहर से आ रहा है। यह झूठ बोलते हैं। इसी नाटक को दिखाकर के विदेशों से फंडिंग ली जा रही है। यह एक तरह से साजिश है, ताकि हमारी सरकार को विदेशों में बदनाम किया जा सके। मैं तो इसको एक तरीके की अंतरराष्ट्रीय साजिश मानता हूं, जो भारत के खिलाफ है। इनके धरने का कोई मतलब नहीं है। जो यहां के हैं, जब उनकी नागरिकता नहीं जा रही है तो धरना किसके लिए। नागरिकता तो घुसपैठियों की तय की जाएगी। क्या यह सभी घुसपैठिए हैं। अगर नहीं तो डरना किस बात के लिए। मेरा तो सरकार से कहना है कि इन सभी को तुगलकाबाद में एक डिटेंशन कैंप खोल करके वहां डाल दिया जाए। लेकिन हमारी सरकार उसके लिए तैयार नहीं है।

सीएए कितना संवैधानिक है, क्योंकि विपक्ष कह रहा है कि यह कोर्ट में नहीं टिकेगा?
पहले विपक्ष यह बताए कि किस आधार पर यह कोर्ट में नहीं टिकेगा। उनका कहना है कि यह संविधान का उल्लंघन है। मैं कह रहा हूं, ऐसा नहीं है। इस बारे में संसद में जब पार्टी ने मुझे अपनी बात रखने के लिए कहा तो मैंने वहां अपना तर्क रखा है। संसद में मैंने पूरे देश को बताया कि कैसे यह असंवैधानिक नहीं है। किसी ने भी इस बात के विरोध में नहीं बोला। उनका कहना है कि इस कानून से संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होता है। इस अनुच्छेद के अंतर्गत यह कहा गया है कि विधि के सामने सब बराबर हैं। अब इसमें उनका तर्क है कि हिंदुओं को नागरिकता देने की श्रेणी में रखा गया है जबकि मुसलमानों को नहीं। मैं कहता हूं, मैं ब्राह्मण हूं लेकिन शेड्यूल कास्ट को रिजर्वेशन संविधान देता है, पर मुझे नहीं देता। अगर समानता की बात है तो रिजर्वेशन मुझे भी मिलना चाहिए। मैं भी इस देश का नागरिक हूं। या फिर उसका भी आरक्षण छीन लेना चाहिए। परंतु ऐसा नहीं होता, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई जजमेंट्स इस पर दिए हैं। जिसमें उन्होंने कहा है कि एक ‘इक्वलिटी फॉर इक्वल’। दो ब्राह्मणों के बीच में अगर लड़ाई हो तो हम अनुच्छेद 14 लगा सकते हैं। लेकिन जो पीड़ित रहे हैं, दबे हैं, उनके लिए आप कुछ व्यवस्था करते हो तो इसकी अनुमति है। इस आधार पर नागरिकता भी है। जो अल्पसंख्यक मुस्लिम राष्ट्रों में पीड़ित हैं, शोषित हैं, अगर उनको नागरिकता दी जाती है तो यह बिल्कुल ही संविधान सम्मत है। मैंने यही तर्क संसद में भी दिया और सबको चुप करा दिया। लोगों को भी बात समझ में आई। भाजपा में ऐसे लोग कम हैं, जो इस तरह से जनता के बीच जाकर उनको समझा सकें।

कई राज्यों ने अपने यहां प्रस्ताव पास कर इस नागरिकता कानून को खत्म करने की मांग की है। यह कितना वैधानिक है?
हमें सबसे पहले यह देखना होगा कि राज्यों द्वारा पेश किए गए बिल में क्या है। क्या यह प्रस्ताव नागरिकता कानून को असंवैधानिक बता रहा है या नागरिकता देने की मनाही कर रहा है? जबकि संवैधानिक रूप से वह दोनों नहीं कर सकता। अगर यह बातें उस प्रस्ताव में नहीं हैं तो उस प्रस्ताव का क्या मतलब है? ऐसी स्थिति में वह प्रस्ताव कूड़ा है। उसे फाड़ कर फेंक देना चाहिए। यह एक राजनीतिक नाटक है। अपने को सेकुलर दिखाने का। नागरिकता कानून राज्य के अंतर्गत आता ही नहीं है तो कोई राज्य कैसे तय करेगा कि वह नागरिकता पर क्या करे और क्या ना करे। यह फैसला पूरी तरह से केंद्र का है। पूरी तरह से केंद्र के अधिकार क्षेत्र में है। इसे संसद के दोनों सदनों में पास करा कर कानून की शक्ल दे दी है। अब इसे रोकना किसी के वश में नहीं है।

मैं कहता हूं, मैं ब्राह्माण हूं लेकिन शेड्यूल कास्ट को रिजर्वेशन संविधान देता है, पर मुझे नहीं देता। अगर समानता की बात है तो रिजर्वेशन मुझे भी मिलना चाहिए। मैं भी इस देश का नागरिक हूं। या फिर उसका भी आरक्षण छीन लेना चाहिए। परंतु ऐसा नहीं होता, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई जजमेंट्स इस पर दिए हैं। जिसमें उन्होंने कहा है कि एक ‘इक्वलिटी फॉर इक्वल’। दो ब्राह्माणों के बीच में अगर लड़ाई हो तो हम अनुच्छेद 14 लगा सकते हैं। परंतु जो पीड़ित रहे हैं, दबे हैं, उनके लिए आप कुछ व्यवस्था करते हो तो इसकी अनुमति है। इस आधार पर नागरिकता भी है। जो अल्पसंख्यक मुस्लिम राष्ट्रों में पीड़ित हैं, शोषित हैं, अगर उनको नागरिकता दी जाती है तो यह बिल्कुल ही संविधान सम्मत है। मैंने यही तर्क संसद में भी दिया और सबको चुप करा दिया। लोगों को भी बात समझ में आई। परंतु भाजपा में ऐसे लोग कम हैं, जो इस तरह से जनता के बीच जाकर उनको समझा सकें

मौजूदा सरकार मुस्लिम विरोट्टा है, क्या यह आरोप सही है?
इसका जवाब तो पार्टी प्रवक्ता देंगे, लेकिन मैं इतना कह सकता हूं कि हम संविधान को मानने वाले लोग हैं। हमने सभी महिलाओं को बराबर का दर्जा दिया। तीन तलाक खत्म किया। क्या इसे मुस्लिम विरोधी कहते हैं? हमारी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के हक में काम किया। उन्हें तीन तलाक जैसे दलदल से निकाला। क्या यह मुस्लिम विरोधी है? अगर मुस्लिम पुरुष चार शादी करें उन्हें जब मन करें छोड़ दें, क्या यह गलत नहीं है? अगर हम इसे गलत मानते हैं तो क्या हम मुस्लिम विरोधी हैं? यह सब एक तरह से विपक्ष द्वारा फैलाया गया भ्रम है। साजिश है ताकि यह वोट बैंक के नाम पर मुस्लिमों को अपने पाले में रख सकें।

राजनीति में विचारट्टारा ज्यादा मायने रखती है या विकास। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा विकास के बजाय चुनावी राजनीति ज्यादा करती है?
यह आरोप गलत है। विपक्ष है ही कहां? कुछ लोग बचे हुए हैं। उनकी बातों को क्यों सुना जाए? मैं तो यह सब मानता ही नहीं। यह सब बेकार की बात है। चुनाव में विचारधारा महत्व रखती है। चुनाव सेंटीमेंट पर जीते जाते हैं, यह सही है। लेकिन विकास भी अहम मुद्दा हो सकता है। अब हमने अनुच्छेद 370 हटाया, क्या यह चुनावी है। हमने तीन तलाक खत्म किया, यह क्या चुनावी है? परंतु उनका क्या है, वह लोग कुछ भी कह सकते हैं।

जामिया, जेएनयू एएमयू जैसे विश्वविद्यालयों में आए दिन आंदोलन हो रहे हैं। उसे आप कैसे देखते हैं?
मेरा इस पर स्पष्ट विचार है। इन सभी विश्वविद्यालयों को एक सरकारी आदेश पर दो साल के लिए बंद कर देना चाहिए। इन सभी विश्वविद्यालयों में देश विरोधी काम हो रहे हैं। इनकी फंडिंग से लेकर विचारधारा तक सभी का संचालन इन्हीं जगहों से होता है। इसमें पूरी तरह से ताला लगा देना चाहिए। इसमें जो अच्छे लड़के-लड़कियां हैं, उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय में भेज देना चाहिए। ताकि वह अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें। यह एक तरह से इमरजेंसी भर्ती होगी। फिर अराजक तत्वों को चिन्हित कर एक-एक को छांटकर अलग कर देना चाहिए।

यह तो तानाशाही होगी?
अपने बिगड़े बच्चों को सुधारने के लिए क्या मां-बाप कुछ नहीं करते। हां, बचपन में हमें भी मां-बाप तानाशाह ही लगते थे। लेकिन बड़े होने पर या समझदारी होने पर हमें उनकी बातों का महत्व समझ में आता है।

लेकिन जेएनयू जैसे संस्थान के ही सार्वाधिक छात्र सिविल सर्विसेज जैसी सर्वोच्च परीक्षा पास कर देश की सेवा कर रहे हैं?
आप इन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले वहां के बच्चों का रिकॉर्ड खंगाल लें। सभी पढ़ने वाले छात्र मिलेंगे। एक का भी टुकड़े-टुकड़े गैंग के भीड़ में शामिल होने का रिकॉर्ड नहीं मिलेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में राम मंदिर ट्रस्ट की घोषणा कर दी। इस पर पूरा देश खुश है। लेकिन टाइमिंग को लेकर सवाल भी उठ रहा है। आप क्या कहेंगे?
इस पर मैं सिर्फ यह कहूंगा कि आप आज जिसे विपक्ष कहते हैं, उनकी दुर्गति का कारण ही यही है।

कुमार गुंजन

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