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‘किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकता है गठिया’

‘किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकता है गठिया’

गठिया सुनने में सामान्य रोग लगता है, लेकिन सच्चाई यह नहीं है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि गठिया दरअसल रोगों का समुच्चय है। कई रोगों का वाहक है। इसके इलाज को लेकर आज भी हमारे समाज में तमाम तरह के भ्रम हैं। जानकारी के अभाव में लोग सही समय पर इलाज नहीं करा पाते हैं जिसके कारण उन्हें अपंगता का शिकार होना पड़ता है। नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स में एक विभाग है रूमेटोलॉजी। 1960 के दशक से गठिया के इलाज में एम्स के चिकित्सक जुटे हुए हैं। चिकित्सकों की मेहनत का प्रतिफल यह है कि 2015 से यहां पर व्यवस्थित रूप से रूमेटोलॉजी विभाग कार्य कर रहा है। जल्द ही सुपर स्पेशियलिटी का पाठ्यक्रम भी शुरू होने वाला है। आंकड़ों की बात करें तो वर्तमान में रूमेटोलॉजिस्ट यानी गठिया रोग विशेषज्ञ देशभर में 500 से ज्यादा नहीं हैं। लेकिन गठिया के रोगियों की संख्या दिन दोगुनी-रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। ऐसे में इस रोग से बचाव एवं सही इलाज के संबंध में एम्स के रूमेटोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. उमा कुमार से कुमार गुंजन की विशेष बातचीत

 

डॉ क्टर साहब ये बताइए कि गठिया रोग क्या है?
गठिया रोग की वह अवस्था है, जिसमें व्यक्ति के जोड़ों में दर्द, सूजन, लालिमा एवं चलने-फिरने में बाधा उत्पन्न होती है। गठिया लगभग 200 से अधिक प्रकार का हो सकता है।

आम लोगों का मानना है कि गठिया सिर्फ बुजुर्गों को होता है? इसमें कितनी सच्चाई है?
ऐसा नहीं है। यह रोग किसी भी आयु के व्यक्ति (नवजात से लेकर वृद्ध) तक हो सकता है। लेकिन कुछ गठिया ऐसा होता है जो किसी निर्दिष्ट आयु के लोगों को ही ग्रसित करता है। जैसे ओस्टियोऑर्थिराइटिस गठिया बुजुर्गों को तो एनकाइलोजिंग स्पोन्डिलाइटिस युवकों में अधिक पाया जाता है। कुछ गठिया, जैसे जुवेनाइल इडियोपेथिक ऑर्थराइटिस और रियूमेटिक फीवर आदि बच्चों में पाए जाते हैं।

ऐसा भी माना जाता है कि यह रोग स्त्रियों को ज्यादा होता है। क्या यह सही है?
तथ्यों की बात की जाए तो ऑटोइम्यून ऑर्थराइटिस स्त्रियों में प्रजनन काल की आयु में पुरुषों से अधिक पाया जाता है। रिमूमेटोएड ऑर्थराइटिस स्त्रियों में तीन गुणा अधिक पाया जाता है।

एम्स के रूमेटोलॉजीस्ट विभाग में क्या-क्या सुविधाएं हैं?
सबसे पहले तो यहां पर हमलोग इलाज का खर्च नहीं लेते हैं। दवा का खर्च आता है। जांच का खर्च भी बाजार से एक चौथाई ही होता है। हमारे विभाग में अभी 27 लोग कार्यरत हैं, जिनमें रेजिडेंट चिकित्सक, जूनियर रेजिडेंट, ऑकुपेशनल थेरेपिस्ट, लैब टेक्नीसियन आदि सम्मिलित हैं। 60 के दशक में एम्स में रूमेटोलॉजी शुरू हुई। 2009 में चार विशेषज्ञ में से 3 कॉरपोरेट अस्पतालों में चले गए। तब से मेरे पास इस विभाग की जिम्मेदारी है। तब एक रेजीडेंट एवं एक लैब टेक्नीशियन थे। तब से इस विभाग को मजबूत करने के लिए हम लगातार प्रयासरत हैं। 2012 में 6 बिस्तर वाला रूमेटोलॉजी डे केयर शुरू हुआ। इसमें मरीजों को जोड़ों में इंजेक्शन लगाना, बायोप्सी करने से लेकर अल्ट्रासाउंड तक की व्यवस्था की गई। एक दिन में 30-40 मरीजों का इलाज यहां हो रहा है। 2015 से एक प्रोपर विभाग के रूप में हम काम कर रहे हैं।

एम्स से इतर रूमेटोलॉजी विभाग किन-किन अस्पतालों में हैं और अभी तक देश भर में कितने रूमेटोलॉजिस्ट होंगे?
पीजीआई चंडीगढ़, केजीएमसी लखनऊ, निम्स हैदराबाद, सीएमसी बेल्लोर एवं जीपमेर पांडिचेरी में विगत पांच वर्षों में रूमेटोलॉजी विभाग बने हैं। जहां तक विशेषज्ञ चिकित्सकों की संख्या का प्रश्न है तो अभी यह पूरे भारत में 500 से ज्यादा नहीं है। एम्स भी सुपर स्पेशियालिटी पाठ्यक्रम जल्द शुरू करने जा रहा है। इसको लेकर हमलोग तैयारी कर रहे हैं।

गठिया के रोगी या तो ऑर्थोपेडिक सर्जन के पास पहुंचते हैं या न्यूरो विशेषज्ञ के पास, जबकि आप कह रही हैं कि गठिया का विशेषज्ञ रूमेटोलॉजिस्ट होता है। ऐसे में एक आम आदमी इसमें विभेद कैसे करेगा?
जोड़ों का रोग जो दवाइयों से ठीक होते हैं वह रूमेटोलॉजिस्ट का कार्यक्षेत्र है। जब यह जोड़ अत्यधिक रूप से विकृत हो जाते हैं और उन्हें बदलने (ज्वांट रिप्लेस्मेंट) की जरूरत पड़ती है या हड्डी टूट जाती है तब ऑर्थोपेडिक सर्जन की सलाह की जरूरत पड़ती है।

क्या गठिया से पीड़ित महिला गर्भधारण करने एवं स्वस्थ संतान को जन्म देने में सक्षम है?
हां, स्त्रियां जिनमें गठिया रोग पाया गया है वह गर्भधारण करने एवं स्वस्थ संतान को जन्म देने में सक्षम हैं। चूंकि गठिया की कुछ दवाइयों का दुष्परिणाम उनके गर्भस्थ शिशु पर पड़ सकता है अतः उन्हें गर्भ धारण के पूर्व अपने रूमेटोलॉजिस्ट से सलाह कर लेनी चाहिए, ताकि वह दवाइयां बदल सके।

क्या गठिया को पूर्णतः ठीक किया जा सकता है?
गठिया का इलाज संभव है। इसको उपयुक्त औषधियों, संतुलित आहार एवं शारीरिक व्यायाम द्वारा पूर्णतः नियंत्रित किया जा सकता है। कुछ गठिया रोग जैसे वायरल ऑर्थराइटिस, ट्यूबरकुलर ऑर्थराइटिस आदि ऐसे रोग हैं जिनको पूर्णतः ठीक किया जा सकता है।

गठिया रोग विशेषज्ञ होने के नाते आप किन-किन व्यायामों को करने की अनुशंसा करेंगी?
मैं मुख्यतः तीन व्यायामों की अनुशंसा अपने मरीजों को करती हूं। पहला वह जिससे आपकी गतिशीलता एवं जोड़ों की सामान्य स्थिति बनी रहे उनमें जड़ता न उत्पन्न हो। दूसरा मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करने वाले व्यायाम। तीसरा ऐरोविक व्यायाम जिससे हृदय में सही रक्त का संचालन हो और वजन भी नियंत्रित रहे। गठिया के रोगियों में वजन का नियंत्रण बहुत जरूरी है।

गठिया के रोगियों को खान-पान में किस तरह का परहेज करना चाहिए?
अमूमन खान-पान में किसी परहेज की सलाह तो हमलोग नहीं देते हैं। परंतु गाउट (ऑर्थराइटिस का एक प्रकार जिसमें जोड़ों में बहुत दर्द एवं स्वेलिंग हो जाती है) रोगी को सी-फूड एवं मद्यपान से परहेज करना चाहिए। धूम्रपान गठिया रोगी के लिए पूर्णतः वर्जित है।

क्या गठिया रोगी रक्तदान कर सकते हैं?
कोई भी रोगी जिसे ऑटोइम्यून रोग हो उसे रक्तदान नहीं करना चाहिए। यदि रोग पूरी तरह ठीक हो गया हो एवं सभी औषधियां एक माह पहले बंद हो गई हों तो वह रक्तदान कर सकता है।

क्या गठिया वंशानुगत रोग है?
नहीं। ऐसा नहीं है। माता-पिता रोगग्रस्त होने पर बच्चों को होने की संभावना नहीं होती है। इसलिए ऐसे बच्चों को डरने की जरूरत नहीं है। जब तक गठिया के लक्षण न दिखें, जांच की जरूरत नहीं है।

क्या ज्यादा तनावग्रस्त रहने से जोड़ों का दर्द और थकान बढ़ जाता है?
हां, तनाव से जोड़ों का दर्द और थकान अधिक महसूस होता है।

मधुमेह रोगियों में ब्लड-सुगर को नियंत्रित करना क्यों महत्वपूर्ण है?
ब्लड सुगर को नियंत्रित नहीं किया गया तो इनमें मधुमेही ऑथार्राइटिस विकसित हो सकता है, जिसके कारण जोड़ों में गतिशीलता प्रभावित होती है और जोड़ों में दर्द शुरू हो जाता है।

जोड़ों का बचाव कैसे किया जा सकता है?
चलने-फिरने, बैठने-उठने, वजन उठाने इत्यादि का सही तरीका अपनाने से जोड़ों को ज्यादा दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। उदाहरण के लिए नीचे से समान उठाने के लिए अपने कूल्हों और घुटनों का इस्तेमाल करें न कि कमर का उपयोग।

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