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कहानी Deepika की, जो बनी तीरंदाजी में नंबर वन खिलाड़ी

Deepika

वो तीरंदाजी की दुनिया में नम्बर एक पर है। लेकिन दीपिका कुमारी(Deepika Kumari) का जीवन जीना इतना आसान नहीं है। 14 साल की उम्र में पहली बार धनुष-बाण उठाने वाली दीपिका का तीरंदाजी की दुनिया में प्रवेश भी संयोग की तरह हुआ था। उन्होंने अपनी शुरुआत बांस के बने धनुष बाण से की।

बीबीसी से एक बातचीत में दीपिका कहती हैं कि, “वह तीरंदाज़ी के प्रति इतनी दीवानी हैं क्योंकि उन्होंने इस खेल को नहीं बल्कि इस खेल ने उन्हें चुना है।”

तीरंदाजी की दुनिया में अपने प्रवेश की कहानी बताते हुए दीपिका कहती हैं, “साल 2007 में जब हम नानी के घर गए तो वहां पर मेरी ममेरी बहन ने बताया कि उनके वहां पर अर्जुन आर्चरी एकेडमी है।जब उसने ये बोला कि वहां पर सब कुछ फ्री है. किट भी मिलती है, खाना भी मिलता है।तो मैंने कहा कि चलो अच्छी बात है, घर का एक बोझ कम हो जाएगा ।क्यूंकि उस समय आर्थिक संकट बहुत गहरा था।”
जब दीपिका ने अपनी ख़्वाहिश पिता के सामने रखी तो वह निराश हो गयीं। दीपिका कहती हैं, “राँची एक बहुत ही छोटी और रूढ़िवादी जगह है। मैंने जब पिता को बताया कि मुझे आर्चरी सीखने जाना है तो उन्होंने मना कर दिया।”

भारतीय तीरंदाज़ दीपिका कुमारी(Deepika Kumari) रविवार को पेरिस में आयोजित तीरंदाजी विश्वकप (स्टेज़ 3) में तीन गोल्ड मेडल जीतकर वर्ल्ड रैंकिंग में पहले पायदान पर पहुंच गई हैं।

दीपिका(DEEPIKA KUMARI) ने महिलाओं की व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा के फाइनल राउंड में रूसी खिलाड़ी एलेना ओसिपोवा को 6-0 से हराकर तीसरा गोल्ड मेडल अपने नाम किया। इससे पहले उन्होंने मिक्स्ड राउंड और महिला टीम रिकर्व स्पर्धा में भी गोल्ड मेडल हासिल किया। दीपिका ने मात्र पाँच घंटे में ये तीनों गोल्ड मेडल हासिल किए हैं।

दीपिका (Deepika Kumari) इससे पहले मात्र 18 साल की उम्र में वर्ल्ड नंबर वन खिलाड़ी बन चुकी हैं। अब तक विश्व कप प्रतियोगिताओं में 9 गोल्ड मेडल, 12 सिल्वर मेडल और सात ब्रॉन्ज मेडल जीतने वालीं दीपिका की नज़र अब ओलंपिक मेडल पर है।

दीपिका अगले महीने टोक्यो ओलंपिक में भाग लेने के लिए जापान जा रही है। भारत की ओर से जा रही तीरंदाजी टीम में वह अकेली महिला हैं।

झारखंड के बेहद ग़रीब परिवार में जन्म लेने वाली 27 वर्षीय दीपिका (Deepika) ने पिछले 14 सालों में एक लंबा सफर तय किया है।
तीरंदाजी सीखने के लिए अपने घर से निकलते हुए दीपिका के मन में एक संतोष इस बात का था कि उनके जाने से परिवार पर एक बोझ कम हो जाएगा।लेकिन आज दीपिका ने अपने दम पर परिवार का आर्थिक और सामाजिक दर्जा ऊंचा किया है।

दीपिका के पिता शिव नारायण महतो एक ऑटो-रिक्शा ड्राइवर के रूप में काम किया करते थे। उनकी माँ गीता महतो एक मेडिकल कॉलेज में ग्रुप डी कर्मचारी के रूप में काम करती हैं।

ओलंपिक महासंघ ने एक शॉर्ट फिल्म बनाई है जिसमें दीपिका और उनके परिवार ने दीपिका के सफर से जुड़ी चुनौतियों का ज़िक्र किया है।

दीपिका के पिता शिव नारायण बताते हैं, “जब दीपिका का जन्म हुआ तब हमारी आर्थिक हालत बहुत ख़राब थी. हम बहुत ग़रीब ,हमारी पत्नी 500 रुपये महीना तनख़्वाह पर काम करती थी।और मैं एक छोटी सी दुकान चलाता था।”

दीपिका(Deepika) ने शुरुआत में ज़िला स्तरीय प्रतियोगिताओं से लेकर कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। कुछ प्रतियोगिताओं में इनाम राशि 100, 250 और 500 रुपये तक होती थी. लेकिन ये भी दीपिका के लिए काफ़ी महत्व रखती थीं।

इसी दौरान 2008 में जूनियर वर्ल्ड चेंपियनशिप के ट्रायल के दौरान दीपिका की मुलाक़ात उनके वर्तमान कोच धर्मेंद्र तिवारी से हुई जो कि टाटा आर्चरी एकेडमी में कोच थे।

दीपिका कहती हैं, “धर्मेंद्र सर ने मुझे सलेक्ट किया और मुझे खरसावां से टाटा आर्चरी एकेडमी लेकर आए. मुझे वो जगह इतनी पसंद आई कि मैंने वहां घुसते ही एक दुआ माँगी कि भगवान में ज़िंदगी भर यहीं रहूं और मेरी दुआ पूरी भी हुई।”

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