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राजनीति के मैदान में खिलाड़ी

खेल जगत के बहुत से ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने अपनी लोकप्रियता के चलते सियासी मैदान में भी बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में तो इस वक्त प्रधानमंत्री ही एक पूर्व क्रिकेटर इमरान खान हैं। इमरान एक समय पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान हुआ करते थे। अपने देश भारत में भी खिलाड़ियों को सियासत आकर्षित करती रही है या राजनीतिक पार्टियां उनकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए उन्हें चुनाव में उतारती रही हैं। इस बार भी खेल जगत के लोकप्रिय चेहरों पर राजनीतिक पार्टियों ने दांव लगाया है। कई खिलाड़ी पहले से ही राजनीति में हैं, तो कुछ इस बार राजनीति में दांव आजमाएंगे। जिनमें दीपा मलिक, कृष्णा पूनिया, प्रसून बनर्जी, गौतम गंभीर आदि हैं। गंभीर से पहले भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान नवाब मंसूर अली खान पटौदी, नवजोत सिंह सिद्धू, मनोज प्रभाकर, विनोद कांबली, चेतन चौहान, मुहम्मद अजहरुद्दीन, कीर्ति आजाद, प्रवीण कुमार, लक्ष्मी रतन शुक्ला और मोहम्मद कैफ जैसे खिलाड़ी चुनावी मैदान में उतर चुके हैं। इसमें सिद्धू, चेतन, लक्ष्मी रतन शुक्ला, अजहर और कीर्ति ने सत्ता सुख भी भोगा है।

चेतन चौहान अमरोहा से सांसद रहे। आइए बात करते हैं सबसे पहले वर्ष 2011 विश्व कप विजेता भारतीय क्रिकेट टीम के ओपनर गौतम गंभीर की। इस बार के लोकसभा चुनाव में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली है। माना जा रहा है कि जल्द ही उन्हें नई दिल्ली लोकसभा सीट से बतौर प्रत्याशी मैदान में उतारा जा सकता है। पैरा ओलंपिक में इतिहास रचकर देश का नाम रोशन करने वाली दीपा मलिक ने 48 साल की उम्र में राजनीति की तरफ कदम बढ़ाया है। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले दीपा मलिक ने भाजपा का दामन थाम लिया है। 30 सितंबर 1970 को हरियाणा के सोनीपत स्थित भैंसवाल गांव में जन्मी दीपा मलिक का जीवन काफी संघर्षमय रहा है, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।भारतीय फुटबॉल टीम के स्टार खिलाड़ी रहे बाइचंग भूटिया और प्रसून बनर्जी ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस में शामिल होकर राजनीति की शुरुआत की है। दोनों ही फुटबॉल खिलाड़ी रहे हैं। इस बार दोनों ही टीएमसी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। बाइचुंग भूटिया दार्जिलिंग लोकसभा सीट से चुनाव मौदन में हैं, तो प्रसून बनर्जी हावड़ा लोककसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इस बार लोकसभा चुनाव में दो दिग्गज खिलाड़ियों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। एक तरफ राज्यवर्धन राठौर मोदी सरकार में खेल मंत्री हैं, तो दूसरी तरफ कृष्णा पूनिया हैं। ये दोनों ही अपने-अपने खेल के महारथी रहे हैं, एक ने निशानेबाजी में ओलंपिक पदक समेत कई रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं, तो दूसरी ने ओलंपिक के फाइनल में जगह बनाने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट बनने का गौरव हासिल किया है। भाजपा से केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री एवं खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर और राजस्थान की कांग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया जयपुर ग्रामीण सीट से मैदान में हैं। काफी जद्दोजहद के बाद कांग्रेस ने जयपुर ग्रामीण के जाट मतदाताओं को लुभाने के लिए कृष्णा पूनिया को मैदान में उतारा है। राज्यवर्धन के सामने कृष्णा के उतरने से जयपुर ग्रामीण सीट का मुकाबला न केवल राजनीतिक गलियारों के लिए, बल्कि खेल जगत के लोगों के लिए भी बेहद रोमांचक हो गया है।


क्रिकेटर से राजनेता बने चेतन चौहान ने भाजपा प्रत्याशी के तौर पर उत्तर प्रदेश के अमरोहा से 1991 और 1998 में लोकसभा चुनाव जीता था। उन्हें तीन बार 1996, 1999 और 2004 में हार का भी सामना करना पड़ा था। चेतन इस समय उत्तर प्रदेश सरकार में युवा और खेल मंत्री हैं। कीर्ति आजाद बिहार के दरभंगा लोकसभा सीट से भाजपा के सांसद रहे। उन्होंने नई दिल्ली की गोल मार्किट सीट से विधानसभा चुनाव लड़कर अपनी राजनीति की शुरूआत थी। वे विधायक का चुनाव जीत गए थे। यह भी कहा जा रहा है कि बिहार के दरभंगा लोकसभा क्षेत्र से उनके चुनाव लड़ने पर बात नहीं बनी। इस बार कांग्रेस के टिकट पर झारखंड की धनबाद लोकसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। हालांकि कांग्रेस की ओर से भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन ने 2009 में काग्रेस में शामिल होकर राजनीति की शुरुआत की। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। इस बार उन्होंने सिकंदराबाद सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। फिलहाल अजहर तेलंगना कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष का पद सभाल रहे हैं। मुरादाबाद से कांग्रेस ने इस बार अजहर को टिकट न देकर शायर इमरान प्रतापगढ़ी को टिकट दिया है। पंजाब के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू पिछले करीब 20 दिनों से सारे काम छोड़कर चुपचाप बैठे हुए हैं। आजकल उनका कांग्रेस में किसी नेता से कोई संपर्क भी नहीं है। सिद्धू की कांग्रेस से नाराजगी की अब उनके पास एक और वजह है। सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर को उनकी पसंद की चंडीगढ़ सीट से टिकट देने से कांग्रेस ने मना कर दिया है। इस सीट से कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता पवन बंसल को उम्मीदवार बनाया है। पहले चर्चा थी कि नवजोत कौर को अमृतसर सीट से टिकट दिया जा सकता है, जहां से अमरिंदर सिंह ने साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के अरुण जेटली को हराया था। अरुण जेटली को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद नवजोत सिंह सिद्धू ने भारतीय जनता पार्टी छोड़ दी थी और 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस का हाथ थाम लिया था। मोगा में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की रैली में उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित नहीं करने से वे नाराज हैं।

कैफ ने 2014 में कांग्रेस का दामन थामा और उत्तर प्रदेश के फूलपुर से चुनाव लड़ा, लेकिन उनको हार का सामना करना पड़ा।तेज गेंदबाज चेतन शर्मा को ज्यादातर क्रिकेट प्रेमियों द्वारा शारजाह में अपनी अंतिम गेंद पर छक्का पड़वाने के लिए याद किया जाता है। उन्होंने संन्यास के बाद 2009 में बसपा के टिकट पर फरीदाबाद से लोकसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें बाउंड्री के बाहर कर दिया। पश्चिम बंगाल की एथलीट ज्योतिर्मयी सिकदर भी 2004 में सीपीआई (एम) की तरफ से पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ीं और उनको जीत मिली। लेकिन 2009 में भी उसी सीट से लोकसभा चुनाव से उनको हार मिली। ज्योतिर्मयी डिस्टेड रनर थी। उन्होंने 1998 के बैंकॉक एशियन गेम्स में 800 और 1500 मीटर में स्वर्ण पदक हासिल किया था। निशानेबाज जसपाल राणा ने भी 2009 में भाजपा के टिकट पर उत्तराखण्ड के टिहरी गढ़वाल से चुनाव लड़ा था और हार गए। राणा 2012 में कांग्रेस में शामिल हो गए। जसपाल राणा ने एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक हासिल किया है।


विनोद कांबली लोक भारती पार्टी में शामिल हुए और उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। उन्होंने लोक भारती पार्टी के उम्मीदवार के रूप में मुंबई के विक्रोली से 2009 का विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। इसके बाद उन्होंने राजनीति से दूरी बना ली।प्रवीण कुमार भी राजनीति में हाथ आजमा चुके हैं। प्रवीण ने 2016 में सपा की सदस्यता ली लेकिन चुनाव नहीं लड़ा। हालांकि बाद में उन्होंने इसको अटकल बताया।पूर्व राष्ट्रीय तैराकी चैम्पियन और अभिनेत्री नफीसा अली 2004 में कांग्रेस और 2009 में सपा की उम्मीदवार रहीं, लेकिन दोनों बार हार गई। पूर्व भारतीय कप्तान मंसूर अली खान पटौदी ने 1971 में राव बीरेंद्र सिंह के नेतृत्व वाली विशाल हरियाणा पार्टी के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। इसके बाद 1991 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर भोपाल से आम चुनाव लड़ा, लेकिन वहां भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा।मनोज प्रभाकर ने 1998 में नई दिल्ली लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ा और हार गए।

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