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मिल्खा सिंह का जाना एक युग का अंत

पूर्व ओलंपियन पद्मश्री मिल्खा सिंह का कोरोना संक्रमित होने के करीब एक महीने बाद 18 जून को निधन हो गया। फ्लाइंग सिख के नाम से दुनिया भर मे मशहूर मिल्खा सिंह पिछले महीने 19 मई को कोरोना संक्रमित पाए गए थे। बीते तीन जून को हालत बिगड़ने पर उन्हें पीजीआई में भर्ती कराया गया था। बीते 16 जून को उनकी कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आई थी, लेकिन संक्रमण के कारण वह बेहद कमजोर हो गए थे।18 जून को  अचानक उनकी तबीयत खराब हो गई। उनका ऑक्सीजन स्तर नीचे गिरने लगा। पीजीआई के डॉक्टरों की सीनियर टीम उन पर नजर बनाए हुए थी, लेकिन उनकी हालत बिगड़ गई और रात 11.40 बजे उनके अंतिम सांस लेने के साथ ही भारतीय खेल में एक युग का अंत हो गया है। इस दुखद सूचना से देश और दुनिया के खेल प्रेमियों में शोक की लहर है ।

 महान धावक मिल्खा सिंह के निधन की खबर से सोशल मीडिया पर भी  शोक की लहर दौड़ गई। निधन के कुछ ही मिनट बाद मिल्खा सिंह को याद करने वालों व उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों की सुनामी आ गई। कुछ ही मिनट में मिल्खा सिंह ट्रेंड करने लगे। लाखों लोगों ने एक साथ ट्वीट किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह समेत कई केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, खिलाड़ी, अभिनेता से लेकर हर वर्ग के लोगों ने मिल्खा सिंह को श्रद्धाजंलि दी।

केंद्रीय खेल मंत्री किरन रिजिजू ने ट्विटर पर मिल्खा सिंह का एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि वादा करते हैं कि वह मिल्खा सिंह की आखिरी इच्छा को पूरा करेंगे। वीडियो में मिल्खा सिंह ये कहते हुए दिख रहे हैं कि उनकी आखिरी इच्छा है कि जैसे उन्होंने एथलेटिक्स में देश के लिए गोल्ड जीता, वैसे ही कोई देश का नौजवान देश के लिए रोम ओलंपिक में गोल्ड जीते और भारत का झंडा लहराए। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और भारतीय फुटबाल टीम ने भी मिल्खा सिंह के निधन पर शोक जताया। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने लिखा कि उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। उनकी जिंदगी अगली कई पीढ़ियों को प्रेरणा देगी।

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि मिल्खा सिंह का जाना एक युग का अंत है। ये पंजाब के लिए बड़ी हानि है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि मिल्खा सिंह हमेशा हमारे लिए प्रेरक बने रहेंगे। पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने लिखा कि मिल्खा सिंह भले इस दुनिया से चले गए हैं लेकिन वह हमेशा हमारे दिल में रहेंगे।

वैसे तो मिल्खा सिंह ने अपने जीवन में सब कुछ हासिल किया था, लेकिन उनका एक सपना अधूरा रह गया और वह इस अधूरे सपने के साथ जिंदगी को अलविदा कह गए। मिल्खा सिंह अक्सर कहते थे कि रोम ओलंपिक जाने से पहले उन्होंने दुनिया भर में कम से कम 80 दौड़ों में हिस्सा लिया था, इनमें उन्होंने 77 दौड़ें जीतीं थी, जो एक रिकार्ड बन गया था।

मिल्खा सिंह कहते थे, ”सारी दुनिया ये उम्मीदें लगा रही थी कि रोम ओलंपिक में 400 मीटर की दौड़ मिल्खा ही जीतेगा। मैं अपनी गलती की वजह से मेडल नहीं जीत सका। मैं इतने सालों से इंतजार कर रहा हूं कि कोई दूसरा भारतीय वो कारनामा कर दिखाए, जिसे करते-करते मैं चूक गया था, लेकिन कोई एथलीट ओलंपिक में मेडल नहीं जीत पाया।”

मिल्खा सिंह कहते थे कि अगर रोम ओलंपिक में वह मेडल जीत जाते तो आज देश में जमैका की तरह हर घर से एथलीट्स निकलते। वह रोम में मेडल जीतने से नहीं चूके, बल्कि इस देश को रोल मॉडल और सपने देने से चूक गए थे। पीटी ऊषा और श्रीराम सिंह जैसे एथलीट भी मेडल जीतने से चूक गए, जिनसे देश को खासी उम्मीदें थी। अगर हम मेडल जीत गए होते तो एथलेटिक्स गेम्स के प्रति भी युवाओं में वही आकर्षण होता जो ध्यानचंद के समय हॉकी का और वर्ष 1983 में क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने के बाद क्रिकेट का था। मिल्खा सिंह कहते थे,  मैं इतने सालों से इंतजार कर रहा, लेकिन मेरा इंतजार खत्म नहीं हुआ।

मिल्खा सिंह अक्सर हर मंच से यह शिकायत करते थे कि क्रिकेट सिर्फ 10 से 14 देश खेलते हैं, बावजूद इसके उसे मीडिया की तरफ से ज्यादा कवरेज दी जाती है, लेकिन एथलेटिक्स गेम्स 200 से ज्यादा देश खेलते हैं उस लिहाज से एथलेटिक्स गेम्स को तव्जो नहीं दी दिया जाता है, इसलिए एथलेटिक्स में महत्व को हमें समझना होगा। मिल्खा सिंह को टोक्यो ओलंपिक में एथलीट हिमादास से खासी उम्मीदें थी। इस बाबत उन्होंने उन्हें तैयारी के टिप्स भी दिए थे।

मिल्खा सिंह का जन्म 20 नवंबर, 1929 को पाकिस्तान में हुआ। उनका गांव अविभाजित भारत के मुजफ्फरगढ़ जिले में पड़ता था, जो अब पश्चिमी पाकिस्तान में आता है। उनके गांव का नाम गोविंदपुरा था। उन्होंने राजपूत राठोर परिवार में जन्म लिया था। उनके कुल 12 भाई-बहन थे। मिल्खा सिंह के परिवार ने विभाजन की त्रासदी का दर्द झेला। उस दौरान उनके माता-पिता के साथ आठ भाई-बहन मारे दिए गए थे। परिवार में सिर्फ चार लोग ही जिंदा बचे थे, जिनमें से एक आगे चलकर विश्व के महान धावकों में से एक बने, जिन्हें अब फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह के नाम जाना जाता है।

भारत आने के बाद मिल्खा सिंह साल 1951 में वे भारतीय सेना में शामिल हो गए। सेना में शामिल होना ही उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट था, जहां से एक महान खिलाड़ी का उदय हुआ। इसी दौरान उन्हें खेलों में हिस्सा लेने का मौका मिला। मिल्खा सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया था कि आर्मी ज्वाइन करने के 15 ही दिन बाद एक दौड़ का आयोजन किया गया था, जिससे एथलेटिक्स ट्रेनिंग के लिए 10 जवान चुने जाने थे। उन्होंने बताया कि जब मैंने रेस शुरू की तो मेरे पेट में दर्द होने लगा, जिसके चलते मुझे रुकना पड़ा, इसके बाद मैंने फिर अपनी दौड़ शुरू कर दी। उन्होंने बताया कि आधा मील चला ही होऊंगा कि फिर दर्द होने लगा। रुकता, फिर चलने लगता, फिर रुकता, फिर चलता। इस तरह वो दोड़ पूरी की, फिर भी मैं उन करीब 500 लोगों में से 6वें स्थान पर आने में कामयाब हुआ। इस तरह भारतीय सेना में स्पोर्ट्स के लिए उनका दरवाजा खुला। इसके बाद तो जो कुछ हुआ वह इतिहास बन गया।

मिल्खा सिंह 1958 में देश के पहले इंडिविजुअल एथलेटिक्स बने, जिन्होंने कॉमनवेल्थ खेलों में गोल्ड मेडल जीता। साल 2010 तक यह सम्मान पाने वाले वे अकेले भारतीय थे। साल 1958 और साल 1958 में आयोजित एशियन खेलों में भी वे गोल्ड मेडल जीते। इसी दौरान सरकार ने खेलों में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म श्री अवॉर्ड से नवाजा। मिल्खा सिंह ने लगातार तीन ओलंपिक खेलों में देश का नेतृत्व किया। यह तीन ओलंपिक थे साल 1956 में मेलबर्न में आयोजित हुआ समर ओलंपिक, फिर साल 1960 में रोम में आयोजित हुआ समर ओलंपिक और साल 1964 में टोक्यो में आयोजित हुआ समर ओलंपिक।

सेना में भर्ती होने के 4 साल बाद 1956 में वे पटियाला में हुए नेशनल गेम्स जीते। इससे उन्हें ओलंपिक के लिए ट्रायल देने का मौका मिला। लेकिन ओलंपिक के लिए ट्रायल देने से पहले ही उन्हें एक भयंकर और दर्दनाक अनुभव से गुजरना पड़ा था। मिल्खा सिंह के जो प्रतिद्वंदी थे वे नहीं चाहते थे कि मिल्खा सिंह उस रेस में हिस्सा लें। इसलिए एक दिन पहले ही उनके प्रतिद्वंदियों ने उन पर हमला बोला। उनके सर और पैरों में चोट आई। अगली सुबह उनके शरीर पर जगह-जगह निशान दिखे और बुखार भी आया हुआ। वे डॉक्टर के पास गए तो डॉक्टर ने उनसे कहा कि वे रनिंग में हिस्सा ना लें।

मिल्खा ने एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता में चार बार स्वर्ण पदक जीता है और 1958 के राष्ट्रमंडल खेलों में भी स्वर्ण पदक जीता था। हालांकिक, 91 वर्षीय को 1960 के रोम ओलंपिक के 400 मीटर फाइनल में उनकी एपिक रेस के लिए याद किया जाता है । मिल्खा सिंह के परिवार में तीन बेटियां डॉ. मोना सिंह, अलीजा ग्रोवर, सोनिया सांवल्का और बेटा जीव मिल्खा सिंह हैं। गोल्फर जीव, जो 14 बार के अंतरराष्ट्रीय विजेता हैं, वे भी अपने पिता की तरह पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित हैं।

पांच दिन पहले पत्नी की हुई थी  मौत 

मिल्खा सिंह के साथ उनकी पत्नी निर्मल कौर भी कोरोना संक्रमित हो गईं थीं। हालत गंभीर होने पर उन्हें मोहाली के निजी अस्पताल में दाखिल कराया गया था। उनकी भी हालत कई दिनों तक स्थिर बनी हुई थी, लेकिन बीते 13 जून की शाम को उनका निधन हो गया। मिल्खा सिंह और उनकी पत्नी के बीच काफी जुड़ाव था।

पत्नी की मौत के बाद परिजनों को लगने लगा था कि वे ज्यादा दिन तक जी नहीं पाएंगे, इसलिए पत्नी के निधन की खबर मिल्खा सिंह से छिपाकर रखी गई थी। परिजनों ने बताया कि दो दिन से मिल्खा सिंह पत्नी निम्मी से बात करने की जिद कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा था कि उनके सपने में निम्मी आ रही हैं और वे इस दुनिया से चलीं गईं हैं। बता दें कि निर्मल कौर भारतीय वॉलीबाल टीम की पूर्व कप्तान थीं। साथ ही वह चंडीगढ़ के खेल निदेशक के पद पर भी रही थीं।

बता दें  कि मिल्खा सिंह के जीवन पर आठ साल पहले बॉलीवुड हिंदी फिल्म भाग मिल्खा भाग बनी थी। इसका निर्देशन राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने किया, जबकि लेखन प्रसून जोशी का था। मिल्खा सिंह की भूमिका में फरहान अख्तर नजर आए थे। अप्रैल 2014 में 61वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में इस फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ मनोरंजक फिल्म का पुरस्कार मिला। इसके अतिरिक्त इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ कोरियोग्राफी के लिए भी पुरस्कृत किया गया था।

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