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भारतीय क्रिकेट के ‘महाराज’ के नाम से पहचाने जाने वाले युवराज ने उस वक्त क्रिकेट को अलविदा कह दिया जब टीम इंडिया इंग्लैंड में चल रहे वर्ल्ड कप में ऑस्ट्रेलिया को लीग मैच में मात देकर जश्न मना रही थी। खबर चौंकाने वाली थी। हो भी क्यों न, क्योंकि इस समय दुनिया में क्रिकेट का महाकुंभ चल रहा है। ऐसे में टीम इंडिया के लिए दो बार विजय की गौरवगाथा लिखने वाले योद्धा ने क्रिकेट से संन्यास ले लिया तो चर्चा होनी लाजमी है और इसके मायने क्रिकेट के जानकार जरूर निकालेंगे। आखिर क्यों युवराज सिंह ने वर्ल्ड कप के समय क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट से संन्यास ले लिया।

युवराज सिंह का क्रिकेट करियर काफी बेहतरीन और सशक्त रहा है। उन्होंने क्रिकेट के जेंटलमैन गेम को जिया और भरपूर लुत्फ उठाया। युवी ने अपने हुनर और लगन से क्रिकेट को शानदार रंग दिया। टेस्ट क्रिकेट में एशिया महाद्वीप की पिचों पर उनके बल्ले की लय देखकर गेंदबाज दांतों तले उंगली दबा लेते थे। लेकिन इसके उलट बात अगर लिमिटेड ओवर गेम की हो तो युवी इतनी तेजी से गियर बदलते थे कि रनों का अंबार लगा देते थे। ऐसा देखने को तब मिला जब 2007 में टी-20 वर्ल्डकप के दौरान युवी और फ्लिंटॉफ में विवाद हुआ और इसका खामियाजा इंग्लैंड के तेज गेंदबाज स्टुअर्ट ब्रॉड को भुगतना पड़ा। युवराज सिंह ब्रॉड की छह गेंदों पर छह छक्के लगाकर सिक्सर किंग बन गए और टीम इंडिया ने दमदार प्रदर्शन करते हुए पहले ही टी-20 वर्ल्ड कप पर कब्जा जमा लिया। हालांकि उस टीम में वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी जैसे धुआंधार खिलाड़ी थे लेकिन अगर किसी की सबसे ज्यादा चर्चा हुई तो वो थे युवराज सिंह।

दरअसल, इस कीर्तिमान से सात साल पहले यानी वर्ष 2000 में युवराज सिंह ने इंटरनेशनल क्रिकेट में पदार्पण किया। इसके तीन साल बाद उन्होंने अपने होम ग्राउंड चंडीगढ़ के मोहाली में न्यूजीलैंड के खिलाफ अपने टेस्ट क्रिकेट का आगाज किया। हालांकि युवराज ने टेस्ट में अपना पहला शतक 2004 में पाकिस्तान के खिलाफ लाहौर में लगाया। वैसे बाएं हाथ के युवी टेस्ट में महज तीन शतक ही लगा पाए, लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात ये रही कि ये तीनों ही शतक युवराज ने पाकिस्तान के खिलाफ जड़े। युवी ने कुल 40 टेस्ट मैच खेले और 33.92 की औसत से 1900 रन बनाए और जिसमें सर्वाधिक स्कोर 169 रन रहा। टेस्ट में उन्होंने 9 विकेट भी लिए। लेकिन युवी का जलवा वनडे में दिखा। वनडे में युवराज के बल्ले ने जमकर रन उगले और उन्होंने कई यादगार पारियां खेलीं। इतना ही नहीं युवराज के उत्कøष्ट प्रदर्शन की बदौलत टीम इंडिया 2011 में विश्व चैम्पियन बनी और युवी ने यादगार भूमिका निभाई।

युवराज ने 2011 के विश्वकप में 9 मैच में 90.50 के एवरेज से 362 रन बनाए और 15 विकेट भी झटके। ऐसे शानदार प्रदर्शन के लिए 2011 वर्ल्ड कप में युवराज को प्लेयर ऑफ द सीरीज भी चुना गया। सबसे खास बात ये है कि इसी वर्ल्ड कप के बाद युवराज को कैंसर के बारे में पता चला। उन्हें ‘मीडियास्टिनल सेमिनोमा’ नाम का दुर्लभ कैंसर हुआ था। दिल्ली के मैक्स केयर सेंटर के डॉक्टर नितेश रोहतगी ने युवराज को कैंसर से लड़ने में मदद की।

उस वर्ल्ड कप के दौरान युवराज कैंसर से पीड़ित थे। डॉक्टर ने उन्हें मैच ना खेलने की सलाह दी थी लेकिन वे न सिर्फ फील्ड में उतरे, बल्कि भारत की जीत के हीरो भी रहे। युवराज ने उस मैच में 57 रन की पारी भी खेली थी। युवी ने कप जीतने के बाद कहा कि वर्ल्ड कप जीतना मेरे लिए सपने सरीखा था। मैंने अपने पिता का सपना पूरा किया। संन्यास लेते समय युवराज उस पल को याद करके भावुक हो गए। युवराज ने कहा ‘मैं बचपन से ही अपने पिता के नक्शेकदम पर चला और देश के लिए खेलने के उनके सपने का पीछा किया।’ क्रिकेट को अलविदा कहने के अपने इस फैसले पर मैं 2 साल से अपनी मां और पत्नी से बात कर रहा था और अब जब मैं संन्यास ले रहा हूं तो मेरे पिता को इस फैसले पर कोई परेशानी नहीं है।

टेस्ट, वनडे और टी-ट्वेंटी में ग्यारह हजार से ज्यादा रन बनाने वाले युवराज सिंह ने जीवन में कभी हार नहीं मानी। कैंसर का इलाज करवाने के बाद एक बार फिर क्रिकेट में लौटे। लेकिन बल्ले से कुछ खास ना कर पाने की वजह से टीम से बाहर कर दिए गए। 2011 वर्ल्ड कप के हीरो युवराज सिंह की चार साल पहले 2015 में आईपीएल नीलामी में 16 करोड़ की बोली लगी थी, जबकि 2018 में उन्हें किंग्स इलेवन पंजाब ने 2 करोड़ रुपए में खरीदा था और युवराज किंग्स इलेवन पंजाब के लिए 8 मैचों में महज 65 रन बना सके थे। प्रदर्शन में गिरावट की वजह से इस साल आईपीएल में युवराज को मुंबई इंडियन ने एक करोड़ के बेस प्राइस में खरीदा था लेकिन यहां भी युवी कुछ खास नहीं कर पाए। इस वजह से वर्ल्ड कप टीम में उनका चयन नहीं किया गया।

ऐसे में 304 एकदिवसीय मैच में 14 शतक की मदद से 8701 रन बनाने वाले युवी अपने प्रदर्शन से ज्यादा खुश नहीं दिख रहे थे। बहरहाल दो विश्व कप विजेता टीम के योद्धा ने आखिर में क्रिकेट से अलविदा कहना बेहतर समझा। इतना ही नहीं युवराज ने 58 टी-ट्वेंटी भी खेले। जिसमें 28.02 के औसत से 1177 रन बनाए। उन्होंने करीब 17 साल के इंटरनेशनल क्रिकेट में देश का नाम रोशन किया और अपने आप को भी पहचान दी। ऐसे में जब दुनिया में सबकी नजर वर्ल्ड कप के महाकुंभ पर टिकी है तो देश का ये फाइटर विराट कोहली की टीम को देश के लिए कप जीत कर लाते हुए देखना चाहता है और इसी उम्मीद में उसने क्रिकेट को अलविदा कहा है।

युवराज ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया- 2011 का वर्ल्ड कप जीतना, मैन ऑफ द सीरीज बनना और चार मैन ऑफ द मैच अवार्ड मिलना सपने की तरह था। इसके बाद मुझे कैंसर हो गया। यह आसमान से जमीन पर आने जैसा था। यह सब कुछ तेजी से हुआ और यह तब हुआ जब मैं अपने करियर के पीक पर था। उस वक्त मेरा परिवार, मेरे फैन्स मेरे साथ थे। मेरे परिवार ने मेरी हिम्मत बढ़ाई। कैंसर से जंग जीतने में मदद करने के लिए मैं डॉक्टर रोहतगी और अमेरिका के डॉक्टर लॉरेंस का शुक्रिया अदा करता हूं। कैंसर की लड़ाई जीतने बाद मुझे दूसरी चीजों पर फोकस करने का मौका मिला। मैंने कैंसर पीड़ितों की मदद के लिए यू वी कैन नाम से एक फाउंडेशन शुरू किया।

 

युवराज के नाम 17 अंतरराष्ट्रीय शतक

युवराज ने 40 टेस्ट की 62 पारियों में 33.92 के औसत से 1900 रन बनाए हैं। इसमें 3 शतक और 11 अर्धशतक भी हैं। उन्होंने 304 वनडे की 278 पारियों में 36.55 के औसत से 8701 रन बनाए। युवराज ने वनडे इंटरनेशनल में 14 शतक और 52 अर्धशतक लगाए। उन्होंने 58 टी-20 इंटरनेशनल भी खेले। इसमें 28.02 के औसत से 1177 रन बनाए। सिक्सर किंग ने टेस्ट में 9, वनडे में 111 और टी-20 इंटरनेशनल में 28 विकेट भी लिए हैं।

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