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पिता के सम्मान की लड़ाई

इंडोनेशिया में होने वाले एशियन गेम्स इस वर्ष 18 अगस्त से शुरू हो रहे हैं। एशियाई खेलों की शुरुआत भारत में वर्ष 1951 से हुई, जिसमें भारत का प्रदर्शन बेहतरीन रहा था।भारत ने इस प्रतियोगिता में 15 गोल्ड मेडल के साथ कुल 51 मेडल जीते थे। एशियन गेम्स के इतिहास में यह भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। सचिन नाग पहले भारतीय एथलीट थे, जिन्होंने भारत के लिए एशियन गेम्स (1951) में पहला गोल्ड मेडल जीता था। वे तैराक थे।

सचिन नाग ने 8 मार्च 1951 को 100 मीटर फ्रीस्टाइल स्विमिंग इवेंट में 1 मिनट 4.7 सेकेंड का समय निकालते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया था। इसके अलावा उन्होंने 400 मीटर फ्रीस्टाइल रिले और 300 मीटर मेडली रिले में दो ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किए थे। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि सचिन नाग के बाद कोई भी भारतीय तैराक एशियन गेम्स में 100 मीटर फ्रीस्टाइल में गोल्ड मेडल नहीं जीत पाया है। वह 11 बार स्टेट चैंपियन और तीन बार ऑल इंडिया चैंपियन भी रहे। छोटे और लंबी दूरी के तैराक होने के अलावा, नाग एक सफल वाटर पोलो खिलाड़ी थे। 1948 (लंदन) और 1952 (हेलसिंकी) ओलंपिक में वह वॉटर पोलो टीम का हिस्सा भी रहे थे।


वर्ष 1951 के पहले एशियाई खेलों में सचिन नाग ने जब तैराकी में 100 मीटर फ्रीस्टाइल का स्वर्ण पदक जीता तो खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनके गले में स्वर्ण हार डाला था। एशियाई खेलों में किसी भारतीय तैराक को इसके बाद आज तक स्वर्ण पदक हासिल करने का गौरव हासिल नहीं हुआ। 68 सालों बाद नाग के इस स्वर्ण पदक की चमक अतीत के गर्त में खो गई है। इस सोने की चमक से सरकार भले ही बेखबर हो गई हो, लेकिन उनके बेटे अशोक नाग ने अपने पिता के खोए सम्मान की लड़ाई को जारी रखा है। नाग जब तक जीवित रहे उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। पिता की मृत्यु के बाद बेटा यह लड़ाई लड़ रहा है, पर उन्हें अब तक सफलता नहीं मिली है। इस बार बेटे के साथ इस लड़ाई में अर्जुन अवार्ड पैरा स्वीमर प्रशांत कर्माकर भी शामिल हो गए हैं। उन्होंने खुद ध्यानचंद अवार्ड के लिए सचिन नाग का नाम खेल मंत्रालय को प्रस्तावित किया है।

जब वर्ष 1951 में आजाद भारत ने पहली बार एशियन गेम्स का आयोजन किया और इस गेम्स की शुरुआत भी पहली बार ही हो रही थी। इन खेलों का आयोजन चार से 11 मार्च तक नई दिल्ली में हुआ था। इन खेलों में 491 खिलाड़ियों ने शिरकत की थी जिसमें जापान पहले, मेजबान भारत दूसरे और ईरान तीसरे स्थान पर रहा था। वैसे इन खेलों की शुरुआत 1950 में होनी थी लेकिन तैयारियों की कमी के चलते यह खेल 1951 में आयोजित हुए। एशियन गेम्स फेडरेशन 1949 में दिल्ली में स्थापित हुई और इसके बाद एलान किया गया कि दिल्ली पहले एशियन गेम्स की मेजबानी करेगा। एशियन गेम्स फेडरेशन के कई सदस्यों ने इन खेलों में मुक्केबाजी को शामिल करने की विनती की थी, लेकिन कई कारणों के चलते इसे शामिल नहीं किया गया।

पहली बार आयोजित इन खेलों में आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हिस्सा लिया था। स्टेडियम में भी लगभग 40000 दर्शक मौजूद थे। एशियन गेम्स फेडरेशन के अध्यक्ष एचआरएच यादवेंद्र सिंह और राजेंद्र प्रसाद के भाषण के साथ इन खेलों का आगाज हुआ। अपने भाषण में राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि पहले एशियन गेम्स सभी देशों के साथ अच्छे तालमेल और हमारी दोस्ती को दिखाते हैं।

सचिन नाग का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 5 जुलाई 1920 को एक बंगाली परिवार में हुआ था। वह ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करने वाले पहले भारतीय तैराक थे। नेशनल क्वालिफायर के दौरान उन्होंने रिकॉर्ड बनाया था।सचिन नाग की जीवनी के अनुसार, पानी के साथ उनका रिश्ता बड़े ही नाटकीय परिस्थितियों में जुड़ा। दरअसल, 10 साल की आयु में सचिन का एक बार पुलिस पीछा कर रही थी। इस दौरान वह खुद को पुलिस से बचाने के लिए गंगा नदी में नावों के बीच कूद गए और पानी के भीतर ही तैरना शुरू कर दिया।

संयोग से उसी समय गंगा में 10 किमी की तैराकी की प्रतियोगिता चल रही थी। खुद को छिपाने के लिए वह तैराकों के समूह में शामिल हो गए और सभी को चौंकाते हुए प्रतियोगिता में तीसरा स्थान हासिल किया। यही से उनके तैराकी करियर की शुरुआत हुई। इस घटना के अगले छह वर्षों (1930-36) तक नाग ने गंगा में आयोजित कई तैराकी प्रतियोगिताओं में भाग लिया। इन प्रतियोगिताओं में वो ज्यादातर शीर्ष दो में रहे। तैराकी से संन्यास लेने के बाद, नाग ने बंगाल के कई प्रसिद्ध तैराकों को ट्रेनिंग भी दी, जिनमें आरती साहा और नफीसा अली शामिल हैं। साल 1984 में उन्होंने तैराकी पर बेस्ड बंगाली फिल्म कोनी में भी अभिनय किया। सचिन नाग ने साल 1987 में 67 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया था।

सचिन नाग ने पहले दिल्ली एशियाई खेलों में 100 मीटर फ्रीस्टाइल का गोल्ड जीतने के अलावा दो कांस्य पदक भी जीते। इसके अलावा 1948, 1952 के ओलंपिक में वाटरपोलो टीम के सदस्य रहे। 48 के लंदन ओलंपिक में चिली के खिलाफ मिली एकमात्र 7-4 से जीत में नाग के चार गोल थे। और अब उनका बीटा अशोक नाग का कहना है कि अगले वर्ष उनके पिता की जन्म तिथि है। उन्हें सम्मानित करने का इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता है।

मुझे किसी तरह का कोई पैसा नहीं चाहिए, लेकिन पिता ने जो देश के लिए किया उसका हक तो उन्हें मिलना ही चाहिए। यही कारण है कि उन्होंने अब ध्यानचंद अवार्ड के लिए आवेदन किया है। इससे पहले वह पिता के लिए 2012 में अर्जुन अवार्ड के लिए आवेदन कर चुके हैं, लेकिन उन्हें अवार्ड नहीं दिया गया।

2014 में डाइविंग में एशियाई खेलों में स्वर्ण जीतने वाले केपी ठाकर को ध्यानचंद अवार्ड दिया गया, लेकिन उनके पिता को भुलाकर रखा गया। अशोक नाग यह भी साफ कर देते हैं कि जब तक वह जीवित हैं तब तक पिता के सम्मान के लिए संघर्ष करते रहेंगे। एक न एक दिन तो उनके पिता के लिए सरकार की आंखें जरूर खुलेंगी।

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