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गृहमंत्री तक पहुंची आईपीएल को बैन करने की मांग 

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई ) के चीनी कंपनी से संबंध न तोड़ने के फैसले पर  क्रिकेट प्रेमियों में काफी नाराजगी है। लद्दाख में सीमा विवाद के बाद क्रिकेट प्रेमी नहीं चाहते कि चीनी कंपनियां किसी मैच की प्रायोजक रहे। यही वजह है कि

चीनी कंपनी ‘वीवो’को अपना प्रायोजक बरकरार रखने के बीसीसीआई के फैसले का जबर्दस्त विरोध हो रहा है। अखिल भारतीय व्यापारी संघ ने बीसीसीआई  के इस फैसले के खिलाफ गृहमंत्री अमित शाह और विदेश मंत्री एस जयशंकर को खत लिखा है।  व्यापारी संघ ने आईपीएल को तुरंत बैन करने की मांग की है।

भारत सरकार ने 2 अगस्त  को ही आईपीएल यूएई में आयोजित करने की इजाजत दी है। आईपीएल का आयोजन 19 सितंबर से होगा और इसका फाइनल 10 नवंबर को खेला  जाना तय हुआ है। सभी मुकाबले दुबई इंटरनेशनल स्टेडियम में ही होंगे।

सीएआईटी (CAIT) के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने अमित शाह और जयशंकर को खत लिखा, ‘भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के हालिया फैसले के बारे में हम आपको अवगत कराना चाहते हैं कि  बीसीसीआई ने चीनी कंपनी वीवो को दुबई में आयोजित होने वाले आईपीएल के प्रायोजक के तौर पर बरकरार रखा है.’ उन्होंने आगे लिखा, ‘ऐसे समय में जब चीन भारत की सीमाओं पर हमारे देश की भावनाओं से खेल रहा है और पीएम मोदी के नेतृत्व में देश आत्म निर्भर भारत का पालन कर रहा है। ऐसे वक्त में  बीसीसीआई का ये फैसला सरकार की व्यापक नीति के खिलाफ है।
बीसीसीआई के वीवो (VIVO) को बतौर प्रायोजक बरकरार रखने के फैसले के खिलाफ सोमवार को स्वदेशी जागरण मंच ने भी आवाज उठाई है।  संघ से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक अश्विनी महाजन ने कहा, ‘आईपीएल एक बिजनेस है और जो इसे चला रहे हैं उन्हें देश की भावनाओं का ख्याल नहीं है। सारी दुनिया चीन का बहिष्कार कर रही है और आईपीएल उन भावनाओं को ठेस पहुंचा रहा है। उनको समझना  चाहिए कि देश से ऊपर कोई नहीं है, क्रिकेट भी नहीं। ‘

बीसीसीआई और वीवो का करार साल 2022 तक है। अगर बीसीसीआई वीवो से अपना रिश्ता तोड़ता है तो उसे काफी नुकसान हो सकता है। हाल ही में बीसीसीआई कोषाध्यक्ष  अरुण धूमल ने कहा था कि आईपीएल जैसे भारतीय टूर्नामेंटों के चीनी कंपनियों द्वारा प्रायोजन से देश को ही फायदा हो रहा है। सूत्रों  के मुताबिक बीसीसीआई को वीवो से सालाना 440 करोड़ रुपये मिलते हैं जिसके साथ पांच साल का करार है जो  2022 में खत्म होगा।

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