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एशियाड में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन

एशियन गेम्स की रंगारंग क्लोजिंग भारत के लिए एक तरह से ऐतिहासिक साबित हुई। जकार्ता में हुए इन गेम्स में भारत ने कुल 69 मैडल हासिल करने के साथ सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी किया। भारत ने 15 गोल्ड 24 सिल्वर और 30 ब्रॉन्ज मैडल हासिल किए। भारत के गोल्ड और सिल्वर मैडलों की संख्या बढ़ी है। इससे पहले भारत ने 1951 में हुई एशियन गेम्स में 15 गोल्ड जीते थे। बहरहाल, गेम्स की क्लोजिंग सैरेमनी में भारतीय दल की अगुवाई वुमैंस हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल ने की। भारी बारिश के बावजूद भी सैरेमनी जारी रही।

भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल ने 18वें एशियाई खेलों के रंगारंग समापन समारोह में तिरंगा लेकर भारतीय दल का नेतृत्व किया और बॉलीवुड के गानों से इस समारोह में जकार्ता थिरक उठा। भारतीय महिला हॉकी टीम ने इन खेलों में 20 वर्ष के अंतराल के बाद रजत पदक हासिल किया और भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) ने इस टीम की कप्तान रानी को समापन समारोह में तिरंगा लेकर भारतीय दल का नेतृत्व करने का गौरव प्रदान किया।

समापन समारोह में आसमान से भी कुछ बूंदें बरसीं। शेख अहमद ने इस भव्य आयोजन के लिए सभी का शुक्रिया अदा करते हुए कहा, आज बादल भी आंसू बहा रहे हैं क्योंकि उन्हें भी इस खूबसूरत सफर के अंत का दुख है। शेख अहमद ने खासतौर पर उन 13 हजार वॉलंटियर्स को विशेष रूप से शुक्रिया कहा जिन्होंने इन खेलों को सफल बनाने के लिए दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने इन खेलों की सर्वश्रेष्ठ एथलीट चुनी गईं जापान की युवा तैराक रिकाको इकी को भी बधाई दी जिन्होंने छह स्वर्ण और दो रजत सहित कुल आठ पदक जीते।

बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान के ‘कोई मिल गया’ और ‘तुम पास आए’ जैसे गानों को सिद्धार्थ ने गाकर समा ही बांध दिया और जब ए आर रहमान का ‘जय हो’ का गाना गूंजा तो पूरा स्टेडियम भारतमय हो उठा। गायक जीजी, बैंस और सैम सिंमाजतुक ने अपने परफार्मेंस से संदेश दिया कि एकसाथ रहकर हम बहुत आगे जा सकते हैं। समारोह के बाद आसमान भव्य आतिशबाजी से जगमगा उठा और सभी एथलीटों ने बेहद भावुक माहौल में एक दूसरे को अलविदा कहा। एशियाई खेलों का सफर अब 19वें खेलों के लिए चार साल बाद 2022 में चीन पहुंचेगा।

भारत में खेलों एवं खिलाड़ियों की कमी नहीं है, लेकिन इस बात की कमी जरूर है कि यहां सिर्फ एक ही खेल यानी क्रिकेट को ज्यादा महत्व दिया जाता है जिसके कारण कई नामी एथलीट गु्मनाम हो जाते हैं और कई खेल नजरअंदाज। गलती सिस्टम की है ही, लेकिन लोगों में क्रिकेट के अलावा किसी और खेल के प्रति लगाव ना होना चिंता का विषय बना हुआ है। एशियाई खेलों में खिलाड़ियों ने पिछले 67 वर्षों से अबकी बार अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया। 2010 में हुए एशियाई खेलों में 14 गोल्ड, 17 सिल्वर और 34 ब्रॉन्ज के साथ कुल 65 पदक जीते थे, लेकिन इस बार खिलाड़ियों ने भारत की झोली में 15 गोल्ड, 24 सिल्वर, 30 ब्रॉन्ज के साथ कुल 69 मेडल डालकर अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। युवा खिलाड़ियों ने कड़ी मेहनत और बुरे वक्त से निकलर मेडल जीते, पर बावजूद इनके उन्हें वो सम्मान नहीं मिलता जो एक भारतीय क्रिकेटर को सीरीज जीतने के बाद मिलता है या फिर यह कहें कि मात्र 1 मैच जीतने पर।

देश में ऐसा माहौल बन चुका है कि सरकार भी क्रिकेट के प्रति गंभीर है, लेकिन अन्य खेलों में मेडल लाने वाले खिलाड़ियों के प्रति गंभीर नहीं। ताजा उदाहरण आप क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी के रूप में ही ले लीजिए। धोनी कुछ दिन पहले एक विज्ञापन की शूटिंग के लिए ‘देवभूमि’ हिमाचल में गए। उनकी सुरक्षा के लिए राज्य सरकार ने उन्हें 5 दिनों के लिए राज्य अतिथि की तरह सुविधाएं उपलब्ध कराईं। वहीं जब महिला कुश्ती की गोल्ड विजेता विनेश फोगाट स्वदेश लौटीं तो उन्हें सरकार या प्रशासन की ओर से कोई सम्मान नहीं मिला। विनेश के परिवार ने भी इस पर हैरानी जताई कि जिस लड़की ने गोल्ड जीतकर देश का नाम रोशन किया उसके आने पर वो सम्मान नहीं मिला जिसकी वो हकदार थी। विनेश पहली महिला हैं, जिन्होंने एशियाई खेलों में कुश्ती की प्रतियोगिता में भारत के लिए गोल्ड जीता है।

अब क्रिकेटरों को मिलने वाले सम्मान पर थोड़ा विचार करें तो विदेश में कहीं भी टूर्नामेंट हो, अगर टीम जीतकर आती है तो क्रिकेटरों समेत पूरे स्टाफ का एयरपोर्ट, बस स्टैंड या फिर रेलवे स्टेशन जहां भी मिलें वहीं पर पूरा सम्मान किया जाता है। यहां तक कि उनके गले में फूलों की माला डालकर राज तिलक की प्रथा तक भी निभाई जाती है। इस पर सरकार को ध्यान रखना जरूरी है कि वह सिर्फ क्रिकेट को ही खेल का प्रधान ना बनाएं, बल्कि अन्य खेलों और खिलाड़ियों में भी अपनी रुचि दिखाएं जहां के खिलाड़ी छोटे कस्बों और गरीबी से निकलकर अपनी किस्मत आजमाते हैं।

क्रिकेट और अन्य खेलों के खिलाड़ियों की कमाई का अंतर यह है कि अगर एक क्रिकेटर 1 सीरीज खेल लेता है तो वह आराम से लग्जरी कार खरीदने के योग्य हो जाता है, लेकिन अन्य खेलों के खिलाड़ियों को जीत पर मिलता है सिर्फ छोटा सा सहारा। यानी कि 4 साल की कड़ी मेहनत के बाद सरकार से दो शब्द तारीफ या फिर मात्र 10 लाख। हेप्टाथलान स्पर्धा में स्वप्ना बर्मन ने पश्चिम बंगाल के लिए गोल्ड मेडल जीता। उनके इस कारनामे के बाद पूरा देश खुशी से झूम उठा, लेकिन स्वप्ना को अपने राज्य से वो नहीं मिल सका जिसकी उसे उम्मीद थी। छोटे से गांव और गरीबी से निकली स्वप्ना के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सिर्फ 10 लाख की घोषणा की। लेकिन शायद राज्य सरकार यह भूल गई कि 10 लाख की रकम स्वप्ना के सपने पूरे नहीं कर सकते। यहां तक कि वो अपने उस टूटे-फूटे घर की मरम्मत भी नहीं कर सकती, जहां रहकर वह अपना जीवन बीता रही है।

सच तो यह है कि सोना, चांदी लाने वाले खिलाड़ियों की तुलना क्रिकेट से हो ही नहीं सकती। ऐसा नहीं है कि ये खिलाड़ी क्रिकेटर नहीं बनना चाहते, लेकिन महंगी किट और निवेश के कारण इन्हें अपना लक्ष्य बदलना पड़ा। जो फर्क आज गांवों और शहरों के बीच है, वो फर्क क्रिकेट और अन्य खेलों के बीच भी है। क्रिकेट मेट्रो सिटी की तरह है वहीं बाकी खेल गांवों की तरह जहां ना बिजली, ना पानी और ना सड़क है।

एशियाई खेलों में भारत ने भले अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। अगर सरकार इन खिलाड़ियों पर ही शुरू में ही ध्यान देती और सबकी नजर क्रिकेट से हटकर इन खिलाड़ियों पर पड़ती तो हो सकता था कि परिणाम और भी बेहतर मिलते। मैडल टैली में भारत 8वें स्थान पर रहा, जबकि कजाखिस्तान 9वें नंबर पर, लेकिन आप यह जानकर हैरान होंगे कि कजाखिस्तान ने भारत से ज्यादा 76 मेडल जीते हैं। हैरानी इसलिए, क्योंकि कजाखिस्तान की आबादी 1.78 करोड़ है तो भारत की 135 करोड़, फिर हम इतने पीछे क्यों? कजाखिस्तिन आखिर कैसे 15 गोल्ड लेकर भारत की बराबरी कर गया? कहीं इसका कारण देश में एथलीटों को प्रोत्साहन का ना मिलना तो नहीं। सरकार और खेल संस्थाओं को खिलाड़ियों की मदद और उन्हें आगे लाने की जरूरत है जो बिना जूते पहने रेस ट्रैक पर दौड़ते हैं।

एक भारतीय क्रिकेटर को 1 टी20 मैच खेलने का 3 लाख, वनडे खेलने का 7 और टेस्ट खेलने का 15 लाख मिलता है और ए ग्रेड में सालाना 7 करोड़ दिया जाता है। वहीं नेशनल गेम हॉकी में खिलाड़ियों को सालाना 15 लाख मिलते हैं। मतलब यह हुआ कि एक क्रिकेटर अगर चार साल तक लगातार क्रिकेट खेल ले तो वह करोड़ों पैसा कमाकर आराम की जिंदगी जी सकता है। वहीं दूसरी तरफ एथलीट हैं, जिन्हें चार-चार साल तक कड़ी मेहनत करने के बावजूद भी वो हासिल नहीं हो पाता जिसकी उन्हें उम्मीदें होती है। हालांकि हरियाणा सरकार जरूर खिलाड़ियों को मेडल जीतने पर करोड़ों रुपए देती है, लेकिन कई राज्य ऐसे हैं जहां खिलाड़ी तो हैं पर उन्हें सरकार से मदद नहीं मिल पाती। इसके उदाहरण हैं भारतीय एथलीट तेजिंदर पाल सिंह तूर। पंजाब के रहने वाले तूर ने भाला फेंक में गोल्ड मेडल जीता। यह पंजाब के लिए एक गौरव की बात थी पर यहां की सरकार के लिए तूर द्वारा गोल्ड जीतना कोई बड़ी बात नहीं। लिहाजा तूर ने अब राज्य सरकार से उम्मीदें ही छोड़ दी हैं।

भारत में क्रिकेट का क्रेज इतना बढ़ चुका है कि इसके बड़ी-बड़ी कंपनियां नामी क्रिकेटरों के साथ करोड़ों का कांट्रैक्ट और विज्ञापन करती हैं। यही कारण है कि विज्ञापन में क्रिकेट बाकी खेलों पर भारी पड़ता है। साल 2017 में क्रिकेटर्स को विज्ञापन के जरिए 323 करोड़ की कमाई हुई। वहीं अन्य खेलों के एथलीट को कुल 73 करोड़ की कमाई हुई। इन आंकड़ों से साफ नजर आता है कि हमारे देश में क्रिकेट को ही ज्यादा तवज्जो दी जाती है, न कि अन्य खेलों को। कुछ राज्य ऐसे भी हैं जो अपने खिलाड़ियों को मेडल लाने पर सरकारी नौकरी के साथ करोड़ों रुपए देने का ऐलान करते हैं तो वहीं 10 ऐसे राज्य भी हैं जहां नौकरी की कोई गारंटी नहीं। ये 10 राज्य हैं- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, नगालैंड, गोवा, त्रिपुरा, बंगाल और मणिपुर। वहीं हरियाणा सरकार गोल्ड जीतने पर 3 करोड़ और क्लास वन की नौकरी, सिल्वर जीतने पर 1.5 करोड़ और क्लास-2 की नौकरी, कांस्य जीतने पर 75 लाख और क्लास-3 की नौकरी देती है।

असम, गोल्ड पर 50 लाख, सिल्वर पर 30 लाख और कांस्य पर 20 लाख एवं सभी को क्लास-2 की नौकरी देता है। गुजरात, गोल्ड पर 2 करोड़, सिल्वर पर 1 करोड़ और कांस्य पर 50 लाख रुपए। गोल्ड को क्लास-1 और बाकी को क्लास-2 की नौकरी।

महाराष्ट्र सरकार गोल्ड-10 लाख, स्वर्ण-7.5 लाख और कांस्य-5 लाख। नौकरी सबको योग्यता के मुताबिक देती है।

उत्तर प्रदेश में सभी को क्लास-2 और कर्नाटक में सभी को क्लास-1 की नौकरी दी जाती है। इसके अलावा राज्य सरकार की ओर से पदक विजेताओं को नकद राशि देने की घोषणा भी की जाती है।

एशियन गेम्स में इस बार कुछ नई कहानियां निकल कर सामने आई हैं। गरीबी, उम्र एवं निराशाओं को पार कर हौसलों के उड़ान की कहानियां। जिनका इतिहास बचपन से दर्द भरा रहा। उन खिलाड़ियों की जिंदगी से जुड़ी दर्दभरी बातों के बारे में, जिन्होंने बुरे वक्त से निकलकर आज दुनियाभर में अपनी पहचान बना ली है।

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