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कभी गैर भाजपाई दलों की तरफ से प्रधानमंत्री का चेहरा बनने की कतार में नंबर वन का दर्जा रखने वाले नीतीश कुमार अब मात्र बिहार की राजनीति तक सिमट कर रह गए हैं। पिछले पंद्रह बरस से राज्य के मुख्यमंत्री पद पर आसीन नीतीश कुमार का जलवा दिनों दिन कमतर होता जा रहा है। उनकी पार्टी जद(यू) का जनाधार लगातार घट रहा है। गत् विधानसभा चुनाव में उन्हें अपने ही सहयोगी दल भाजपा की कूटनीति के चलते भारी नुकसान उठाना पड़ा और जद(यू) मात्र 43 सीटें पा कर राज्य में तीसरे नंबर पर जा पहुंची। दरअसल, एनडीए गठबंधन का हिस्सा रही लोक जनशक्ति पार्टी ने बगावत कर जद(यू) के खिलाफ हर सीट पर अपने प्रत्याशी उतार राजद को लाभ पहुंचाने का काम कर डाला। नीतीश समर्थकों का मानना है कि ऐसा लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ने भाजपा के इशारे पर किया। हालांकि भाजपा ने नंबर वन पार्टी होते हुए भी सरकार की कमान नीतीश बाबू को ही सौंपी है लेकिन उनके पर कतर डाले हैं। सरकार में अब भाजपा का दखल खासा बढ़ गया है। उनके दो नेताओं को उपमुख्यमंत्री बनाने पर मजबूर हुए नीतीश इस चलते खासे व्यथित चल रहे हैं। वे न तो अपने मन माफिक निर्णय ले पा रहे हैं, न ही केंद्र सरकार उन्हें अपेक्षित सहयोग कर रही है। नीतीश बाबू लंबे अर्से से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं ताकि उन्हें केंद्र सरकार से ज्यादा बजट मिल सके। लेकिन उनकी ही सरकार में उपमुख्यमंत्री रेणु देवी का मानना है कि ऐसे किसी दर्जे की बिहार को कोई जरूरत नहीं है। नीतीश की नाराजगी को बढ़ाने का काम अब नीति आयोग ने कर डाला है। आयोग ने देश भर में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जारी अपनी रिपोर्ट में बिहार को सबसे खराब राज्य बताया है। अभी नीतीश इस रिपोर्ट के चलते अपने 15 बरस के शासन पर उठ रहे सवालों का माकूल जवाब तलाश ही रहे थे कि आयोग ने अपनी गरीबी रिपोर्ट जारी कर उसमें भी बिहार को देश का सबसे बदहाल राज्य करार दे डाला। नीति आयोग की मानें तो बिहार में कुल आबादी का 52 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहा है। इतना ही मानो काफी न था कि आयोग ने बिहार की कानून-व्यवस्था को भी देश में सबसे बदतर करार बता डाला है। खबर गर्म है कि नीतीश कुमार इस सबके चलते खासे बेचैन हैं। वे अब एक बार फिर से भाजपा का साथ छोड़ विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनने की रणनीति बनाने में जुटे बताए जा रहे हैं।

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