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अपने चाल और चरित्र पर नाज करने वाली, देश को ‘भय, भूख और भ्रष्टाचार’ से निजात दिलाने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी हर प्रकार के दागियों की शरणस्थली बन चुकी है। जैसे-जैसे पार्टी का विस्तार होता गया, भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों के महारथी इसमें शामिल होते चले गए हैं। ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल और असम हैं जहां शारदा चिट फंड घोटाले के आरोपी शुभेंदु अधिकारी, दिनेश त्रिवेदी समेत कइयों ने ईडी, सीबीआई आदि के भय से निजात पाने के लिए तृणमूल का दामन झटक भाजपा में शरण ले ली।

असम में भाजपा की जड़ें जमाने वाले पूर्व कांग्रेसी नेता हेमंत विश्वास सरमा ने भी ठीक इसी प्रकार शारदा चिट फंड एवं लुइस बर्जक स्कैम में नाम आने के बाद भगवा होने में ही अपनी भलाई समझी। पूर्वोत्तर के सातों राज्यों में भाजपा की जड़ें सरमा ने ही फैलाई। इसका इनाम भी उन्हें बंपर मिला है। निवर्तमान मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनेवाल के स्थान पर उन्हें भाजपा आलाकमान ने राज्य की गद्दी सौंप दी है। भाजपा सूत्रों की मानें तो आलाकमान के इस फैसले से खांटी भाजपाइयों में खासा असंतोष पनप रहा है। विशेषकर सर्वानंद सोनेवाल की पैरवी कर रहे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को हेमंत विश्वास सरमा की ताजपोशी कतई नहीं सुहा रही है। सूत्रों की मानें तो संघ ने हर संभव प्रयास किया कि सोनेवाल ही दोबारा सीएम बनाए जाएं, लेकिन केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह इसके लिए कतई राजी नहीं हुए। शाह ने स्पष्ट तौर पर हेमंत विश्वास सरमा की पैरवी की। जाहिर है संघ की दाल नहीं गली, चली अमित शाह की ही।

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