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सिने अभिनेता के बतौर शत्रुघ्न ने बॉलीवुड में अपनी खास पहचान स्थापित की। पटना से मुंबई अपने सपनों को साकार करने पहुंचे सिन्हा ने खलनायक के तौर पर सिने जगत में इंट्री ली। बाद में वे खलनायकी छोड़ हीरो का रोल निभाने लगे। उनके प्रशंसकों का मानना है कि यदि सिन्हा विलेन ही बने रहते तो ज्यादा सफल होते। बहरहाल इन दिनों हिंदी सिनेमा का यह नायक भाजपा के लिए खलनायक बनता जा रहा है। अटल बिहारी  सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके शत्रुघ्न को भाजपा के वर्तमान नेतृत्व ने हाशिए पर रखा है। अपनी इसी उपेक्षा से खिन्न शत्रुघ्न ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर ले लिया है। वे लगातार पार्टी और केंद्र सरकार की तीखी आलोचना करने लगे हैं। यशवंत सिन्हा की भांति हालांकि उन्होंने भाजपा को अलविदा नहीं कहा है] लेकिन वे अभी से २०१९ के आम चुनाव में अपना टिकट विपक्षी खेमे से जुगाड़ करने में जुटे बताए जा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस ने तो उन्हें पश्चिम बंगाल से चुनाव लड़ने का ऑफर भी दे गया है। सिन्हा लेकिन पटना साहिब से ही चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं। जानकारों का मानना है कि वे अगले आमचुनाव में लालू यादव के राष्ट्रीय जनतादल के प्रत्याशी हो सकते हैं। इस बीच खबर यह भी है कि सिन्हा के बिगड़े बोलों से परेशान भाजपा आलाकमान उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही का मन बना रहा है।

ममता-राव की नूराकुश्ती

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तेलगांना के सीएम के चंद्रशेखर राव में इन दिनों प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर होड़ चल रही है। दोनों ही मुख्यमंत्री २०१९ में प्रस्तावित आम चुनावों से पूर्व विपक्षी महागठबंधन बनाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं। इन दोनों नेताओं का मानना है कि अगले आम चुनाव में एनडीए को सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलेंगी और विपक्ष का महागठबंधन सरकार बनाने में सफल होगा। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए से इतर ये दोनों नेता विपक्षी दलों का नया गठबंधन बनाने की जुगत में हैं ताकि वे खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार द्घोषित कर सकें। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का प्रधानमंत्री पद को लेकर दिया गया बयान] इन्हीं दो नेताओं की महत्वाकांक्षा को थामने के चलते है। सोशल मीडिया में टीम ममता ने तो बकायदा ममता फॉर पीएम कम्पैन शुरू भी कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि यदि ममता को चेहरा बना विपक्ष चुनाव लड़ता है तो उसे महिला] ब्राह्मण और कांग्रेस से नाराज वोटरों का समर्थन मिल सकता है।

कांग्रेस-सपा में बढ़ती दूरी
पिछले विधानसभा चुनावों में एक&दूसरे के करीब आए राहुल गांधी और अखिलेश यादव में भले ही निजी मित्रता अब भी कायम हो] समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को उसके हाल में छोड़ने का मन पक्का कर लिया है। पिछले दिनों अखिलेश यादव ने हैदराबाद में तेलंगाना के सीएम के ़चंद्रशेखर राव संग मुलाकात कर यूपीए से अलग एक नया विपक्षी मोर्चा बनाए जाने की अटकलों को बल देने का काम किया। इतना ही नहीं राहुल गांधी के पीएम बनने के बयान से भी अखिलेश ने किनारा करते हुए चुनाव बाद पीएम पद पर फैसला होने की बात कह डाली। सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की औकात दो लोकसभा सीटें जीतने की है कह सपा&कांग्रेस की मित्रता के पैरोकारों को सकते में डालने का काम कर दिया है। दरअसल सपा जानती है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में पूरी तरह अपना जनाधार गंवा चुकी है। उसके पास ना तो दलित वोट बैंक बचा है] ना ही मुस्लिम] ब्राह्मण और ठाकुर मतदाता उसके साथ है। ऐसे में भाजपा के विजय रथ को थामने के लिए सपा और बसपा का एक होना जरूरी है] चाहे इसके चलते कांग्रेस से पल्ला ही क्यों ना झाड़ना पड़े। अब यदि कैराना सीट पर सपा उम्मीदवार की जीत होती है तो निश्चित ही सपा&बसपा गठबंधन में अन्य भाजपा विरोधी दल भी बगैर शर्त शामिल हो जाएंगे। ऐसे में कांग्रेस को या तो अपने दम पर मैदान में उतरना पड़ेगा या फिर इन दो क्षत्रपों के रहमोकरम में कुछेक सीटों से संतोष करना होगा। 

नौकरशाही पर निर्भर त्रिवेंद्र
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अपने सहयोगी मंत्रियों से ज्यादा तबज्जो नौकरशाहों को देते आए हैं। सीएम की इन अफसरों पर बढ़ती निर्भरता से ना केवल उनके मंत्री बल्कि संगठन के बड़े नेता भी खासे नाराज बताए जा रहे हैं। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता की मानें तो मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र कहीं ना कहीं हीन भावना से ग्रसित हैं जिसके चलते वे जाने&अनजाने वरिष्ठ मंत्रियों की उपेक्षा करते रहते हैं। पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज हों या फिर शिक्षा मंत्री अरविंद पाण्डेय] सभी को सीएम से शिकायतें बढ़ती जा रही हैं। कांग्रेस से आए हरक सिंह रावत खुलकर अपना आक्रोश व्यक्त कर चुके हैं तो दूसरे बड़े नेता यशपाल आर्य सरकार और पार्टी में अपनी उपेक्षा से बेहद खिन्न बताए जा रहे हैं। इस बीच मुख्यमंत्री पद के दावेदार एक वरिष्ठ मंत्री से जुड़ा प्रसंग नौकरशाही और राजनेताओं के बीच खासी चर्चा का विषय बना हुआ है। सूत्रों की मानें तो इन वरिष्ठ मंत्री को किसी विषय पर सीएम से महत्वपूर्ण वार्ता करनी थी। जब वे सीएम के पास पहुंचे तो वहां एक नौकरशाह भी मौजूद थी। मंत्री महादेय ने सीएम से एकांत में वार्ता का अनुरोध किया। सीएम ने उन्हें निसंकोच अपनी बात रखने की बात कह डाली। चूंकि मंत्रीवर एकांत में बार्ता चाहते थे तो उन्होंने पुनः अपना आग्रह दोहराया। लेकिन ना तो उक्त ब्यूरोक्रेट ने स्वयं उठना उचित समझा] ना ही सीएम ने उन्हें बाहर जाने को कहा। अपनी उपेक्षा से तिलमिलाए ये वरिष्ठ मंत्री बिना अपनी बात कहे] वापस लौट गए। जानकारों की मानें तो वहां मौजूद नौकरशाह वहीं हैं जिन्हें पिछले दिनों राज्य की आईएएस एसोशिएशन के प्रमोटी आईएएस अफसरों ने अपनी उपेक्षा के लिए जिम्मेदार माना था।

 

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