कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के सुर और तेवर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ जाते दिखने लगे हैं। प्रदेश की राजनीति में देवगौड़ा के धुर विरोधी सिद्धारमैया पूर्व प्रधानमंत्री के पुत्र का कांग्रेस समर्थन से सीएम बनना पचा नहीं पा रहे हैं। कुमार स्वामी भले ही कांग्रेस के समर्थन से सीएम बने हैं, वे किसी भी सूरत में सिद्धारमैया के दबाव में ना आने के संकेत दे चुके हैं। किसानों के ऋण माफ करने को लेकर दोनों ही नेताओं में गंभीर मतभेद जगजाहिर हैं। कांग्रेस की सलाह को दरकिनार कर कुमार स्वामी ने विधानसभा की पटल पर सैंतालिस हजार करोड़ की ऋण माफी का ऐलान कर डाला है। पिछले दिनों उन्होंने हुबली में आयोजित एक जनसभा में आंसू बहाते हुए कह डाला कि वे विषपान करने को मजबूर किए जा रहे हैं। उनका इशारा कांग्रेस की तरफ था। चतुर राजनीतिज्ञ कुमारस्वामी ने बाद में भले ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी संग दिल्ली में भेंट कर मामले को संभाल लिया लेकिन सिद्धारमैया के क्रोध को शांत नहीं कर सके हैं। जानकारों का मानना है कि कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धारमैया को कांग्रेस वर्किंग कमेटी का सदस्य तो बना डाला है लेकिन पूर्व सीएम के इरादे नेक नहीं हैं। वे शीघ्र ही अहिंसा जनयात्रा के जरिए दलित-पिछड़े और आदिवासियों को जोड़ने की मुहिम शुरू करने जा रहे हैं। उनके करीबियों का मानना है कि इस जनयात्रा के बाद वे अलग क्षेत्रीय दल बनाने की घोषणा कर सकते हैं।

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