भले ही सुप्रीम कोर्ट के सहारे कर्नाटक में कांग्रेस-भाजपा को सत्ता पाने से रोकने में सफल हो गई। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में लगातार हार दर्ज करा रही पार्टी के भीतर अब पार्टी अध्यक्ष की कार्यशैली को लेकर असंतोष बढ़ने लगा है। गुजरात चुनावों में हार के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन दमदार रहने और राहुल गांधी के धुंआधार प्रचार के चलते उनकी पप्पू वाली छवि बदलने लगी थी। कर्नाटक के लेकिन शुरुआती अनुमानों में भाजपा से आगे दिख रही पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। सूत्रों की मानें तो राहुल गांधी कर्नाटक चुनावों में जीत को लेकर खासे आश्वस्त थे। उनकी योजना कांग्रेस कार्य समिति में कर्नाटक ने नतीजों बाद बड़ा बदलाव करने की थी। यह कयास लगाए जा रहे थे कि कई पुराने कांग्रेसियों को राहुल रिटायर कर पार्टी की कमान युवा हाथों में सौंप देंगे। अब लेकिन ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। राहुल की कोर टीम में शामिल युवा नेताओं की परफॉरमेंस कर्नाटक में बेहद खराब रहना इसका मुख्य कारण है। कांग्रेस की सोशल मीडिया प्रमुख दिव्या स्पंदना के गृह क्षेत्र मान्डया में कांग्रेस सभी सात सीटों पर पराजित हुई है। इसी प्रकार कर्नाटक के प्रभारी सचिव मधु यश गौड़ा भी इन चुनावों में कुछ खास नहीं कर पाए। ऐसे में उन पुराने कांग्रेसियों को बड़ी राहत है जिनको संगठन के दायित्यों से बाहर किया जाना तय माना जा रहा था। खबर है कि अब राहुल की टीम में इन पुराने चावलों का दबदबा बना रहेगा] जैसा  सोनिया गांधी के अध्यक्ष काल में था।

शुरूआत से ही संकट

कांग्रेस और जनता दल  सेक्युलर ने कर्नाटक में गठबंधन सरकार तो बना ली  लेकिन दोनों दलों के बीच अविश्वास की गहरी खाई के चलते इस सरकार के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह शपथ ग्रहण के साथ ही लगने लगे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा को इस बात का मलाल अब तक है कि कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी ने १९९७ में बेवजह उनकी सरकार गिरा दी थी। सिद्धारमैया संग भी देवगौड़ा और कुमारस्वामी के रिश्ते बेहद तल्ख रहे हैं। इन विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस और जनता दल ¼सेक्युलर½ के बीच भारी वाक्‌युद्ध रहा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो उन्हें जद ¼la?k½ तक कह डाला था। ऐसे में कुमारस्वामी की सीएम बनने की चाह और कांग्रेस के भाजपा को हर कीमत पर रोकने की मंशा ने भले ही दोनों दलों को करीब ला दिया] आने वाले समय में सत्ता को लेकर दोनों के मध्य तनातनी बढ़नी तय है। इसके संकेत मंत्रिमंडल गठन से पूर्व ही मिलने लगे हैं। कांग्रेस ने अपनी संख्या बल के चलते बीस मंत्री और दो डिप्टी सीएम के पद का दावा किया। वह एक दलित तो दूसरा लिंगायत समाज का उपमुख्यमंत्री बनाना चाहती है। कुमारस्वामी दो उपमुख्यमंत्री पद के लिए तैयार नहीं हुए। यही कारण है कि उन्होंने मंत्रिमंडल गठन से पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से सीधे संपर्क कर डाला। राज्य कांग्रेस के नेताओं को यह बात नागवार गुजरी है। लेकिन भाजपा के भय ने फिलहाल उनका मुंह बंद कर रखा है। अविश्वास के ऐसे माहौल में कर्नाटक में सरकार का अस्थिर बने रहना तय नजर आ रहा है।

मीडिया से दूरी बरकरार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र की सत्ता संभालने के बाद से ही मीडिया से दूरी बना ली। इसका पहला संकेत प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के दौरान इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया का सरकारी तौर पर पीएम के संग यात्राओं में बंदिश के तौर पर सामने आया। पीएम के डेलिगेशन में केवल सरकारी मीडिया और समाचार एजेंसी एएनआई ही अब शामिल होती है। पिछले दिनों रेलमंत्री पीयूष गोयल ने अवश्य पत्रकारों के एक समूह को उत्तर पूर्व के राज्यों में भेजा। इसके तुरंत बाद दमदार केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने भी कुछ ऐसा ही करने का प्रयास किया। उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क साध कुछ पत्रकारों को लद्दाख में प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान साथ भेजने का आग्रह किया। गडकरी चाहते थे कि लद्दाख में १९ मई को जब पीएम पहुंचे तो वहां यह पत्रकार मौजूद हों। लेकिन पीएम ऑफिस ने इससे स्पष्ट इंकार कर डाला। सूत्रों की मानें तो पीएमओ ने गडकरी को सूचित किया कि केवल सरकारी मीडिया ही प्रधानमंत्री के सरकारी कार्यक्रम का हिस्सा होगा। इससे स्पष्ट हो गया कि पीएम मोदी की मीडिया संग दूरी अभी तक बनी हुई है।

खतरे में त्रिवेंद्र की कुर्सी
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की परफारमेंस को लेकर लगातार सवाल उठते रहते हैं। उनकी अखड़ मिजाजी के किस्से भी खासे चर्चा में हैं। अपने मंत्रिमंडलीय सदस्यों संग त्रिवेंद्र के रिश्ते खासे तल्ख हैं। पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज] शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे और परिवहन मंत्री यशपाल आर्य की सीएम से खास निभ नहीं रही है तो वित्त मंत्री प्रकाश पंत अपनी कार्यशैली और मधुर व्यवहार के चलते सीएम से कहीं ज्यादा लोकप्रिय साबित हो रहे हैं। जाहिर है उनकी लोकप्रियता मुख्यमंत्री को सुहा नहीं रही है। इस बीच राज्य सरकार की लचर कार्यशैली और नौकरशाहों के एक वर्ग विशेष का सीएम पर प्रभाव के चलते सीएम लगातार बैकफुट पर जाते नजर आ रहे हैं। दिल्ली दरबार में इन दिनों खासी खुसर-फुसर राज्य सरकार की शराब नीति को लेकर भी है। चर्चा जोरों पर है कि सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के कुछ करीबी परिजन इन दिनों शराब लॉबी संग मिलकर चांदी काट रहे हैं। पार्टी आलाकमान जल्द ही उत्तराखण्ड की बाबत कोई बड़ा फैसला इन हालत के चलते ले सकता है।

सुखड़ी नदी में पानी ही पानी
मध्य प्रदेश के इंदौर शहर को पिछले दिनों देश का सबसे साफ शहर द्घोषित किया गया। इसी शहर से करीब २५ किलोमीटर दूर महू तहसील में सुखड़ी नदी बहती है। यह नदी १२ किलोमीटर लंबी है। इसका सुखड़ी नाम पड़ना बड़ा दिलचस्प है। क्योंकि यह नदी सिर्फ बारिश में ही बहती थी। इसके बाद

सूखी रहती थी। दस साल पहले केंद्र के वाटरशेड प्रोजेक्ट के तहत तत्कालीन कलेक्टर और वर्तमान संभागायुक्त राद्घवेंद्र सिंह ने नागरथ चैरिटेबल ट्रस्ट और गांव वालों के साथ नदियों को पुनर्जीवित करने का अभियान चलाया। इस अभियान के बाद सुखड़ी नदी में अब हमेशा पानी रहता है। ४० डिग्री से ज्यादा गर्मी में भी यह नदी बहती है। यहां अब नया प्रोजेक्ट शुरू किया जा रहा है। जिसके तहत नदी किनारे बांस लगाए जाएंगे। नदी को पुनर्जीवित करने के लिए पहाड़ी क्षेत्र का पानी गड्ढ़ों और बोल्डर से रोका गया। इस नदी के किनारे ११ गांव बसे हैं। सुखड़ी नदी पर १ करोड़ ९४ लाख और चोरल के लिए १० करोड़ खर्च हुए हैं। सबसे पहले पहाड़ी एरिया की मिट्टी का क्षरण रोका गया। इसके लिए दस हजार से ज्यादा बोल्डर से स्ट्रक्चर बनाए गए] जिससे पानी तेजी से नीचे नहीं आए। एक लाख से ज्यादा गड्ढ़े बनाए गए। ताकि पहाड़ी पर पानी पहले गड्ढ़ों में भर जाए और रिसकर फिर नदी में आए। नदियों पर जगह-जगह स्टॉपडेम बनाए गए। चोरल नदी में १५ और सुखड़ी में सात स्टॉपडेम बनाए।

पार्क वाली मैम
दिल्ली एनसीआर में रहने वाली प्रियंका शर्मा मात्र २३ साल की है। इस छोटे से उम्र में राह चलते उसने ऐसा किया जो हर किसी के लिए उदाहरण बन गई। कॉलेज जाते समय प्रियंका को ८ साल का एक बच्चा कूड़ा बीनते दिखा। शहरों में यह तस्वीर आम बात है। आते-जाते सभी लोग ऐसी तस्वीरों को देखते भी हैं। मगर इससे सोचने को विवश कुछ ही होते हैं। प्रियंका इन कुछ में से ही हैं। उसने कूड़ा बीनते बच्चे को देखकर उसके लिए स्कूल खोलने की ठानी। प्रियंका ने ऐसे बच्चों को गाजियाबाद के इंदिरापुरम पार्क में स्कूल लगाना शुरू कर दिया। ८ बच्चों से शुरू हुए उसके स्कूल में अब ६० बच्चे पढ़ते हैं। उसने अपने स्कूल के १७ बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में कराया है। कई और बच्चों के परिजनों को भी इसके लिए तैयार किया है। जो परिजन अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार नहीं हुए] उसके लिए प्रियंका ने पार्क में ४ द्घंटे क्लास है। उसने अपने परिजनों से ५ हजार रुपए लेकर बच्चों के बैठने के लिए दरी] वाईट बोर्ड आदि सामान खरीदे। बच्चे बढ़ने पर अब उनके मित्र जरूरत के सामान उपलब्ध करते हैं। प्रियंका कहती हैं] ‘देश में हर बच्चे को पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका मिलना ही चाहिए।

तेजस्वी की तेजी
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद कानूनी झंझट में फंसे हुए हैं। उनके चुनाव लड़ने पर अदालत ने रोक लगा दी है क्योंकि वह सजायफ्ता हैं। लेकिन उनके बेटे तेजस्वी यादव ने जबरदस्त ढंग से मोर्चा संभाल लिया है। वे तथ्यपूर्ण और बिना लाउड हुए प्रभावशाली ढंग से अपनी बातें रखते हैं। कर्नाटक प्रकरण के समय बिहार में बड़े दल के नेता होने के चलते उन्होंने भाजपा पर दबाव बनाया। बियोंड द पार्टी कई जो दूसरे दल के समर्थक हैं] वह भी तेजस्वी यादव की तारीफ करते हैं। वे बिहार के युवा नेता के रूप में बहुत तेजी के साथ लोकप्रिय हो रहे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए तेजस्वी यादव की बढ़ती लोकप्रियता खतरा नहीं भी तो चुनौती जरूर है। वैसे भी नीतीश कुमार इन दिनों थोड़े बदले मूड में लगते हैं। अभी हाल ही में उन्होंने भाजपा से गठबंधन के बाद पहली बार भाजपा सरकार के खिलाफ मुंह खोला है। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कई पत्र भी लिखने वाले हैं।

उपचुनाव में चुनौती
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के पहले हर चुनाव भाजपा और विपक्षी दलों के लिए चुनौतीपूर्ण और दिल की धड़कनें बढ़ा देने वाला है। अब किसी भी चुनाव को कोई हल्के में नहीं ले रहा है। वे सब कुछ झोंक रहे हैं। कुछ ही दिनों में दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने जा रहा है। दोनों ही जगह भाजपा चुनावी मैदान में है। उसे विपक्षी दलों से कड़ी टक्कर मिल रही है। कैराना विधानसभा सीट भाजपा के लिए नाक का सवाल बनी हुई है। उसे डर है कि कहीं यहां गोरखुपर-फूलपुर वाली कहानी न दोहराई जाए। उन दोनों सीटों पर सपा-बसपा एक साथ थे और दोनों ही सीटों पर भाजपा को शिकस्त मिली थी। कैराना सीट भाजपा सांसद हुकुम सिंह के निधन से खाली हुई है। इस सीट से अब उनकी बेटी मृगांका सिंह भाजपा की उम्मीदवार है। यहां से विपक्षी गठबंधन ने हुस्न तबस्सुम को उम्मीदवार बनाया है जो रालोद की टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं। इनको कांग्रेस सपा और बसपा ने अपना समर्थन दिया है। यह सीट भाजपा के लिए जीतना बेहद चुनौतीपूर्ण है। खबर है कि विपक्षी उम्मीदवार को ‘आम आदमी पार्टी^ने भी अपने समर्थन का ऐलान किया है। मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ ने खुद कमान संभाल ली है और वे लगातार भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के संपर्क में है। २७ मई को बागपत में होने वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली को भी इस उपचुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।

थराली की थाह

उत्तराखण्ड में भले ही भाजपा की प्रचंड बहुमत वाली सरकार है। लेकिन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत थराली विधानसभा उपचुनाव पर विशेष रूप से नजर रखे हुए हैं। यह सीट भाजपा विधायक मगनलाल के निधन से खाली हुई थी। अब यहां से उनकी विधवा मुन्नी देवी भाजपा की प्रत्याशी हैं। चमोली जिले में स्थित यह सीट अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षित है। यह क्षेत्र २००८ के विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई। यहां से कांग्रेस के उम्मीदवार प्रोफेसर जीतराम हैं। कुछ दिन पहले तक खबर थी कि यहां से पिछली बार के भाजपा के बागी प्रत्याशी गुड्डू लाल फिर से बागी हो सकते हैं। गुड्डू लाल को बाद में भाजपा में शामिल कर लिया था। गुड्डू लाल की पार्टी के बड़े नेताओं ने मना लिया है। इससे भाजपा ने राहत की सांस ली है। लेकिन उसकी सारी उम्मीद मुन्नी देवी को मिलने वाले सहानुभूति वोटों पर टिकी हुई है। अगर क्षेत्र की जनता भावुक नहीं हुई तो भाजपा को यह सीट गंवानी भी पड़ सकती है।

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