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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीते सात सालों में कई मर्तबा भाजपा सांसदों संग अपनी एक नाराजगी जाहिर करते रहे हैं। उनकी नाराजगी का कारण है संसद सत्र के दौरान पार्टी सांसदों का सदन से गायब रहना। शीतकालीन सत्र की शुरुआत से पहले पार्टी सांसदों संग अपने संवाद में सदन की कार्यवाही से गायब रहने वाले सांसदों को कड़ी चेतावनी तक दे डाली थी। सांसदों पर लेकिन इस चेतावनी का खास असर पड़ा नहीं तो इसका बड़ा कारण स्वयं पीएम का संसद की कार्यवाही के प्रति उदासीन रहना है। शीतकालीन सत्र के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री की सदन से लगातार अनुपस्थिति पर प्रश्न उठाया। बकौल राहुल तीन सप्ताह में केवल एक दिन कुछ समय के लिए पीएम संसद में मौजूद रहे बाकी समय उन्होंने संसद आना महत्वपूर्ण नहीं समझा। दरअसल जब संसद सत्र चल रहा था तब पीएम उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड और गोवा में जनसभाएं करते घूम रहे थे। उन्होंने गोवा मुक्ति दिवस के कार्यक्रम में भाग लिया, बनारस में काशी विश्वनाथ काॅरिडोर का उद्घाटन किया, उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश में जनसभाएं की। इस सबके चलते वे सदन में शीतकालीन सत्र के पहले दिन 29 नवंबर को ही नजर आए। भाजपा सूत्रों की माने तो प्रधानमंत्री का खुद सदन से लगातार गैरहाजिर रहना और सांसदों को सदन में बैठने की राय देना इतना विरोधाभाषी है कि पार्टी सांसद प्रधानमंत्री की राय को एक कान से सुन दूसरे कान से निकाल सत्र के दौरान केवल विहिप जारी होने पर ही बैठते हैं। जाहिर है सांसदों से ऐसा करने की प्रेरणा प्रधानमंत्री मोदी से ही मिलती है।

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