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भाजपा में शामिल होने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया के तेवर पूरी तरह बदल गए हैं। कांग्रेस में रहते खुद को सिंधिया राजवंश का वारिस होने के चलते महाराज कहलाना पसंद करने वाले ज्योतिरादित्य अब यह बताते घूम रहे हैं कि उनके पूर्वज सतारा जिले के एक गांव के सरपंच हुआ करते थे। इस नाते वे जमीन से जुड़े परिवार से आते हैं। बेचारे सिंधिया करें भी तो क्या करें। भाजपा में उनकी पूछ हो नहीं रही। हालात इतने विकट हैं कि प्रदेश में होने जा रहे उपचुनावों में चुनाव प्रचार सामग्री में उनकी तस्वीर तक नहीं लगाई गई है। ऐसा तब जबकि चुनाव महाराज के गढ़ में कांग्रेसी विधायकों के इस्तीफे के चलते खाली हुई सीटों पर हो रहे हैं। उपचुनावों के लिए जारी घोषणा-पत्र तक से सिंधिया गायब हैं। इतना ‘अपमान’ ही काफी नहीं था कि स्वयं उनकी जुबान धोखा दे रही है। उपचुनाव के प्रचार के दौरान महाराज जनता से अपील कर रहे हैं कि ‘हाथ’ के निशान पर बटन दबा भाजपा को विजयी बनाएं। वर्षों से पड़ी आदत के चलते उनकी जुबान ‘कमल’ के निशान को भूल ‘हाथ’ के निशान पर बटन दबाने की बात कह देती है। विपक्षी दल तो महाराज की इस स्थिति से खासे प्रसन्न हैं ही, भाजपा में उनकी एंट्री से खफा पार्टी के कुछ दिग्गज भी सिंधिया की टांग खिंचाई से पीछे नहीं हट रहे हैं। यदि उपचुनाव के नतीजे भाजपा के अनुकूल नहीं आते तो महाराज का पार्टी भीतर सरपंच बने रहना भी कठिन हो जाएगा।

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