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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा किसी भी कीमत पर बिहार चुनाव जीतना चाहते हैं। इसके लिए वे कमर कस कर प्रयास कर रहे हैं। नड्डा का राजनीतिक भविष्य दरअसल, सवालिया निशानों के घेरे में है। अमित शाह के गृहमंत्री बनने के बाद जून, 2019 में उन्हें पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था। तब चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। महाराष्ट्र में भाजपा की सीटें तो कम हुई ही हुई, बरसों की साथी शिवसेना ने अलविदा कह एनसीपी-कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना डाली। हरियाणा में भाजपा सरकार तो बनी लेकिन दुष्यंत चौटाला के सहारे। झारखंड में पार्टी को भारी हार का सामना करना पड़ा। दिल्ली में पार्टी को मात्र आठ सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। नड्डा ने ठीक दिल्ली चुनाव के समय पूर्णकालिक अध्यक्ष बतौर अपनी पार्टी की शुरुआत की थी। केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन जबर्दस्त रहा, इतना कि सभी राजनीतिक पंडितों के आकलन धूल-धूसरित हो गए। अब सबकी नजरें बिहार पर टिकी हैं। नड्डा ने इन चुनावों की कमान पूरी तरह भूपेंद्र यादव को सौंप रखी है। स्वयं वे भी अपना सारा फोकस बिहार पर बनाए हुए हैं। यदि भाजपा जदयू से ज्यादा सीटें लाने में सफल रहती है तो नड्डा भारी राहत महसूस करेंगे। अन्यथा पार्टी भीतर उनके विरोधी। गृहमंत्री अमित शाह इन चुनावों में सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसे में हार या जीत, दोनों का सेहरा नड्डा के सिर बंधना तय है। जानकारों का दावा है कि अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद नड्डा का चुनावी कौशल और सांप्रदायिक क्षमता अमित शाह के मुकाबले कहीं ठहरती नजर नहीं आ रही है। ऐसे में अपनी लीडरशिप स्थापित करने के लिए नड्डा हर कीमत में बिहार चुनाव में सफल होने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। यदि ऐसा करने में वे सफल हुए तो उनकी गद्दी मजबूत होगी, नहीं हुए तो उनके विरोधी ताकतवर होकर उभरेंगे।

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