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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ स्वयं को भारतीय संस्कृति का संवाहक और हिंदुत्व का एकमेव ब्रांड एबेंसडर मानता आया है। केंद्र में पहली बार जब भाजपा सत्ता में आई थी तब बहुत सुनने को मिलता था कि तत्कालीन अटल बिहारी सरकार की आर्थिक नीतियों से संघ असहज है। उस दौर में जब अटल सरकार ने विदेशी पूंजी निवेश को बढ़ावा देने, सरकारी कंपनियों को बेचने तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीय बाजार में एंट्री दिलाने के लिए योजनाएं बनानी शुरू की, नीतियों को बदला जाने लगा, तब संघ से जुड़े कई मजदूर संगठनों, एस गुरुमूर्ति सरीखे अर्थशास्त्रियों ने जमकर हो-हल्ला काटा था। संघ की नाराजगी के पीछे अटल सरकार द्वारा संघ के मूल मंत्र ‘स्वदेशी’ को त्यागना रहा था। अब लेकिन जब भाजपा केंद्र एवं अधिकांश राज्यों में पूरे दम-खम के साथ सत्तारूढ़ है, संघ की स्वदेशी नीति की कहीं चर्चा तक नहीं सुनने को मिलती है। प्रधानमंत्री के जुमलों में अवश्य ‘मेक इन इंडिया-मेड इन इंडिया’ मौजूद है, बाजार में विदेशी ब्रांड छाए हुए हैं। ऐसे में अब संघ भी खुद में बदलाव लाता नजर आने लगा है। गत् माह 20 मार्च को संघ ने अपनी नई कोर टीम का गठन किया तो इसमें ऐसे चेहरे ज्यादा नजर आए जो पुरानी परिपाटी से इतर अंग्रेजींदा हैं एवं नई तकनीकों के जानकार भी। संघ के नए सहकार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले और सुनील अंबेडकर अंग्रेजी के अच्छे जानकार होने के साथ-साथ बदलते समय की नब्ज भांपने वाले प्रचारकों में गिने जाते हैं। सुनील अंबेडकर तो बकायदा अंग्रेजी में एक किताब ‘आरएसएसः रोडमैप फाॅर दि ट्वेंटी फस्र्ट सेन्चुरी’, 2019 में लिख चुके हैं। सूत्रों का दावा है कि आने वाले समय में संघ की कार्यशैली में बड़ा बदलाव होना तय है।

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