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उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की राजनीति अब हाशिए पर पहुंच चुकी है। कभी दलितों की एकमात्र नेता बन उभरी मायावती पिछले ग्यारह सालों से विपक्ष में हैं। उनके करीबी नेताओं और परिजनों पर केंद्रीय जांच एजेंसियों का शिकंजा कभी भी उनके लिए बड़ी मुसीबत का कारण बन सकता है। ऐसे में लंबे अर्से से कहा जाने लगा था कि मायावती की राजनीति अब इन एजेंसियों के डर को दिखा भाजपा संचालित करती है। नौ अक्टूबर को स्व ़ काशीराम की पुण्यतिथि पर आयोजित बहुजन समाज की एक विशाल रैली में स्वयं मायावती ने इसकी पुष्टि कर डाली। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि 2022 में बसपा की सरकार राज्य में बनेगी तो भी योगी सरकार द्वारा मथुरा, काशी और अयोध्या में चल रहे हिंदू धर्म से जुड़े कार्यों को नहीं रोका जाएगा। गौरतलब है कि योगी सरकार धार्मिक महत्व के शहरों में कई ऐसे निर्माण कार्य करा रही है जिन्हें विपक्षी दल उसके हिंदुत्व के एजेंडे का हिस्सा करार देते हैं। मथुरा नगर निगम क्षेत्र में शराब और मांस की बिक्री पर रोक ने मुस्लिम और दलित के रोजगार पर असर डाला है। इसके बावजूद मायावती का इन कामों को जारी रखने की बात कहना दो बातें स्पष्ट कर देता है। पहला मुस्लिम वोट बैंक से अब बसपा का फोकस हट चुका है तो दूसरा अब उसका टारगेट एक बार फिर से ब्राह्मण वोट बैंक है। लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में खासी चर्चा है कि यदि भाजपा को 2022 के चुनावों में बहुमत नहीं मिलता है तो उसके साथ मायावती गठबंधन कर सत्ता का हिस्सा बनने में जरा सी देर नहीं लगाएंगी।

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