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मोदी मंत्रिमंडल में नितिन गड़करी ही एकमात्र ऐसे मंत्री बताए जाते हैं जिनके मंत्रालय में पीएमओ का दखल नहीं के बराबर रहता है। जिस रात प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का ऐलान किया था, उसके ठीक पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई गई थी। कहा जाता है कि तब गडकरी अकेले ऐसे मंत्री थे जिन्होंने प्रधानमंत्री के इस निर्णय पर अपनी असहमति दर्ज कराने का साहस किया था। गड़करी का मंत्रालय भी इस सरकार के सबसे तेज काम करने वाले मंत्रालयों में गिना जाता है। पिछले दिनों पीएम ने दो महत्वपूर्ण सड़क परिवहन परियोजनाओं का उद्द्घाटन किया। ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे समय से पहले ही तैयार करने का श्रेय मंत्रालय के लोग गड़करी की कार्यशैली को देते हैं। इसी प्रकार दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेस-वे का पहला चरण भी समय रहते पूरा कर लिया गया। इन परियोजनाओं में शुरुआती देरी के चलते गडकरी ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के मुखिया राद्घव चन्द्रा की विदाई कर दी थी। नतीजा नए चेयरमैन के नेतृत्व में काम तेजी से हुआ। इतना ही नहीं जब ईस्टर्न एक्सप्रेस-वे के पूरा होने के बावजूद शुरू ना होने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से जवाब तलब किया तो प्राधिकरण ने पीएम से उद्द्घाटन का समय ना मिल पाने की बात कह डाली। सच यह था कि एक एक्सप्रेस में एक रेल ओवरब्रिज पर कुछ काम शेष रह गया था। गड़करी इससे इतना नाराज हुए कि तत्काल प्राधिकरण की कार्यवाहक मुखिया को भी हटा दिया गया। बहरहाल पिछले दिनों जब पीएम ने इन दो परियोजनाओं का शुभारंभ किया तो वाहवाही लूटने वाले वे अकेले ना थे। पीएम एक खुली छत वाली गाड़ी में सवार हो इस एक्सप्रेस-वे में जब उतरे तो उनके बगल में चल रही एक अन्य खुली गाड़ी में गडकरी भी सवार थे। पीएम की भांति उन्होंने भी चारों तरफ खड़े नागरिकों का हाथ लहराकर अभिवादन किया। जानकारों का कहना है ऐसा पहली बार हुआ कि पीएम मोदी के कार्यक्रम में किसी मंत्री को इतनी तवज्जो मिली हो। इसे कहते हैं जलवा गड़करी का।

यूपी भाजपा में गहराता असंतोष 
अभूतपूर्व जनादेश के साथ सत्ता में काबिज हुई योगी आदित्यानाथ सरकार की चमक एक बरस बीतते-बीतते फीकी पड़ने लगी है। चाहे गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में हुई बच्चों की अस्वाभाविक मौतों का मामला हो या फिर प्रदेश की खस्ताहाल सड़कों को दुरुस्त करने का सरकारी दावा या फिर प्रदेश के आठ सौ ब्लॉकों में सस्ती जैनेरिक दवाइयों को उपलब्ध कराने का वादा, योगी सरकार धरातल पर कुछ खास कर पाने में विफल रही है। पार्टी कार्यकर्ताओं का जोश भी पहले फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उपचुनावों में मिली हार के बाद से ही पस्त पड़ने लगा था जो अब कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा उपचुनाव हारने के बाद से योगी आदित्यानाथ के खिलाफ विरोधी स्वर में बदलने लगा है। पार्टी के एक विधायक ने तो मुख्यमंत्री पर तंज कसते हुए अपने फेसबुक एकाउंट में एक कविता ही लिख मारी। जानकारों का मानना है कि योगी को भारी दबाव में सरकार चलानी पड़ रही है जिसके चलते वे अपेक्षित नतीजे नहीं दे पा रहे हैं। एक तरफ उन पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संद्घ का बजरिए प्रदेश संगठन महामंत्री सुनील बंसल, प्रेशर बना रहता है तो दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या से उनकी पटरी नहीं बैठ पा रही है। खबर यह भी है कि पार्टी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र पाण्डेय से भी योगी के रिश्ते बहुत मधुर नहीं हैं। ऐसे में दिल्ली के सत्ता गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि २०१९ के आम चुनावों से पहले भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उत्तर प्रदेश के संदर्भ में कोई बड़ा राजनीतिक कदम उठा सकता है। इस बीच यह चर्चा भी है कि योगी के अनुरोध पर संगठन महामंत्री बंसल की उत्तर प्रदेश से विदाई तय हो चुकी है।

                                                                                                                                               हम नहीं सुधरेंगे
पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा के हाथों करारी शिकस्त खाने के बावजूद कांग्रेस के बड़े नेताओं ने न सुधरने की ठान रखी है। हरेक नेता ‘अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग’ की तर्ज पर काम करता नजर आ रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पिछले दिनों देहरादून, हल्द्वानी और दिल्ली में पहाड़ के प्रसिद्ध फल ‘काफल’ के नाम पर एक मुहिम की शुरुआत की तो उन पर कटाक्ष करने वालों में सबसे आगे कांग्रेसी ही रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने रावत पर व्यंग कसते हुए कह डाला कि रावत अनुभवी नेता हैं, उन्हें शायद लगता होगा कि काफल पार्टी करने से कांग्रेस को मजबूती मिलेगी तो उनका स्वागत है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने भी काफल पार्टी को लेकर रावत पर तंज कस डाला है। दूसरी तरफ उपाध्याय ने गत्‌ ३० मई को वन अधिकार दिवस कार्यक्रम मनाया लेकिन उसमें ना तो पूर्व पीएम, ना ही नेता प्रतिपक्ष और वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष शामिल हुए। जाहिर है कांग्रेस के बड़े नेताओं की आपसी कलह का बड़ा असर आम कांग्रेसी कार्यकर्ता पर पड़ रहा है। खबर है कि एक युवा कांग्रेसी विधायक के नेतृत्व में उत्तराखण्ड कांग्रेस के नौजवान नेताओं की शीद्घ्र ही पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात होने जा रही है। खबर यह भी है कि इस मुलाकात की गाज वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष पर गिर सकती है।

सियासी चकल्लस

चेहरे पर चकचक
बिहार में राजनीतिक सरगर्मी लगातार बनी हुई है। आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर सबसे ज्यादा हलचल इसी प्रदेश में देखने को मिल रही है। वहां कई स्तरों पर राजनीतिक तलवारबाजी चल रही है। इस तलवार बाजी में नीतीश और लालू पुत्र तेजस्वी यादव के अलावा प्रदेश के कई बड़े नेता शामिल हैं। इधर कुछ दिनों से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मूड मोदी विरोधी हुआ सा लगता है। इसी हफ्ते उन्होंने नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना कूषि फसल बीमा योजना के बदले अपनी स्कीम लॉन्च करने की द्घोषणा कर दी। बिहार कैबिनेट से इसको मंजूरी भी मिल गई है। संयोग कि कूषि मंत्री भी भाजपा के ही हैं। मोदी ने दो साल पहले प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना को बड़े पैमाने पर लॉन्च किया था। इधर जदयू आक्रामक भी हुई है जिसे निश्चित तौर पर नीतीश ने ही शह दी होगी। खुद नीतीश का अंदाज भी आक्रमक हुआ है। जदयू की युवा ईकाई की बैठक में उन्होंने कहा कि कुछ लोग मुझे एलिमिनेट करना चाहते हैं, लेकिन उनका मंसूबा कभी पूरा नहीं होगा। तेजस्वी यादव की ओर इशारा करते हुए कहा कि मुझ पर अभद्र तरीके से हमले हो रहे हैं। जदयू की तरफ से यह बयान भी आया है कि आगामी लोकसभा चुनाव में बिहार में नीतीश ही चेहरा होंगे। यह बात भाजपा को नागवार गुजरने वाली है। नीतीश का चेहरा का मतलब उनको ज्यादा सीटें देनी होंगी। रामविलास पासवान से भी नीतीश की नजदीकियां भाजपा को परेशान करने वाली हैं। खबर है कि जल्द ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, नीतीश से मिलने वाली है।

बसपा का ‘बल’
इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बाद बसपा पर ही लोगों की निगाहें केंद्रित हैं। कर्नाटक में जो नई सरकार गठित हुई है उसमें एक मंत्री बसपा का भी है। यह पहली बार है कि उत्तर प्रदेश के अलावा दूसरे प्रदेश में बसपा का कोई मंत्री बना है। बसपा प्रमुख मायावती के हौसले बुलंद हैं। कांग्रेस उसके साथ पांच राज्यों में चुनावी गठबंधन करने जा रही है। जाहिर है इसका फायदा मिलेगा। कई राज्यों में दलित वोट की बदौलत बसपा की स्थिति बेहतर हो सकती है। उत्तर प्रदेश से बाहर कांग्रेस से गठबंधन के बाद कुछ सीटें निकालने में भी कामयाब हो सकती है। उत्तर प्रदेश में वह ८० में से ४० सीटें अपने लिए मांग रही है। मायावती के समर्थक दबी जुबान से यह भी विपक्षी गठबंधन को संदेश दे रहे हैं कि मायावती को ही मोदी के बरक्स विपक्षी गठबंधन में प्रधानमंत्री का चेहरा बनाया जाए। इस बाबत संभावित गठबंधन में खामोशी है। लेकिन इतना तो तय है कि मनमाफिक सीट मिलने पर मायावती की मांग को नियंत्रित करना काफी मुश्किल होगा।

भाजपा का मंतव्य
आदमी अपने द्घर की सफाई करे यह तो समझ में आता है, लेकिन वह दूसरे के द्घर जाकर सफाई करने लगे तो हैरानी होती है। कुछ इसी तरह से हैरान किया है, उत्तराखण्ड भाजपा ने। यह सर्वविदित है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छता अभियान को अहमियत दी है। लेकिन इसको क्या कहा जाए कि उत्तराखण्ड भाजपा के अध्यक्ष अजय भट्ट और मंत्री धन सिंह रावत के नेतृत्व में राजीव गांधी की प्रतिमा को धो-पोंछकर साफ किया गया। बताया जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की यह प्रतिमा देहरादून-मसूरी रोड पर स्थित है। भाजपा की यह करास्तनी कांग्रेस को समझ में नहीं आयी। उसने खीझ कर कहा भी-सफाई करनी है तो दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा की करें। हमारे राजीव गांधी की प्रतिमा की साफ-सफाई की ज्यादा जरूरत पड़ गई। कांग्रेस तो छोड़िए आम जनता को भी यह समझ में नहीं अ रहा है कि भाजपा नेताओं ने क्योंकर राजीव गांधी की प्रतिमा की सफाई की। कहीं उसका आशय देश-प्रदेश से कांग्रेस को बाहर कर देना तो नहीं। बहरहाल भाजपा का मंतव्य किसी को समझ में नहीं आ रहा है।

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