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दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने एक्टिविस्ट रहते हरेक राजनेता को जमकर कोसा था। उनकी नजर में सभी राजनीतिज्ञ महाभ्रष्ट थे। राजनीतिक दल के गठन बाद भी केजरीवाल राजनेताओं पर वार करने से बाज नहीं आए। उन्होंने कांग्रेस, सपा-बसपा, भाजपा समेत किसी को नहीं छोड़ा। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी और दिल्ली के उपराज्यपाल के खिलाफ धरने और अनशन पर बैठने वाले आप नेताओं को विपक्षी दलों से शुरुआत में खास समर्थन मिलता नहीं दिखा। कांग्रेस ने तो इसे केजरीवाल का ड्रामा करार दे दिया। दिल्ली के उपराज्यपाल से केजरीवाल की लगातार अपील भी बेअसर रही। मनीष सिसोदिया और सतेंद्र जैन के आमरण-अनशन का भी कोई खास असर होता नजर नहीं आया। फिर यकायक ही पस्त पड़ती ‘आप’ के भीतर जान फूंकने का काम पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने कर दिखाया। चार गैर भाजपाई मुख्यमंत्रियों के केजरीवाल के समर्थन में कूद पड़ने के पीछे ममता का ही हाथ बताया जा रहा है। इसके बाद राज्यसभा सांसद संजय सिंह के नेतृत्व में प्रधानमंत्री के निवास तक का जबर्दस्त प्रदर्शन आयोजित हुआ। हालांकि विपक्षी दलों के बड़े नेता इस प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए लेकिन माकपा महासचिव सीताराम येचुरी की उपस्थिति को कांग्रेस पर आम आदमी पार्टी को महागठबंधन का हिस्सा बनाने के लिए दबाव की राजनीति का हिस्सा माना जा रहा है। आप सूत्रों की मानें तो केजरीवाल एलजी हाउस में चल रहे अपने धरने को व्यापक जनसमर्थन न मिलते देख मायूस होने लगे थे। ममता बनर्जी ने उनकी इस मायूसी को दूर करने का काम किया। सूत्रों की मानें तो २०१९ में कांग्रेस से अलग एक गठबंधन बनाने की दिशा में यह ममता की दूरगामी रणनीति का हिस्सा है जिसमें उन्होंने कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल के मुख्यमंत्रियों को शामिल कर कांगे्रस को सकते में डालने का काम किया है।

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