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नौकरशाही लोकतंत्र के तीन स्तंभों में से एक है। अपेक्षा की जाती है कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायकी स्वतंत्र रूप से नियम अनुसार अपने दायित्वों का निर्वहन करेंगे। हकीकत में इसका ठीक उलट है। विशेषकर कार्यपालिका यानी नौकरशाह और विधायिका यानी राजनेताओं का गठजोड़ इस कदर गहरा हो चला है कि राज्य हित को दरकिनार कर सभी अपने हितों को सहेजने में जुटे हैं। एनएच 74 का घोटाला इसका एक उदाहरण मात्र है। पिछले दिनों उत्तराखण्ड के शहर हल्द्वानी में एक अनूठा वाक्या सुनने में आया है। जनपद के एक महत्वपूर्ण पद पर बैठे वरिष्ठ नौकरशाह ने हल्द्वानी के एक बेहद चर्चित न्यूज पोर्टल के संयोजक को वट्सअप में दो संदेश भेजे जो राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी की जय-जयकार लिए थे। ये अफसर चाहते थे कि पोर्टल पर इसे लगा दिया जाए ताकि सांसद महोदय प्रसन्न हो जाएं। पोर्टल के एडिटर ने ऐसा करने से तो मना किया ही साथ ही उक्त अधिकारी को सलाह भी दे डाली कि राजनीतिक लोगों के पक्ष में उतरना उनके पद की गरिमा के विपरीत है। हैरतनाक यह कि उक्त अफसर एडिटर की ना के बाद भी उनसे अनुरोध करते रहे कि सांसद बलूनी के पक्ष में वे समाचार चला दें।

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