उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता इन दिनों खुद को बेद्घर होने से बचाने की कवायद में जुटे हैं। दलितों और पिछड़ों के नाम पर राजनीति करने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती और खुद को समाजवादी कहने वाले मुलायम सिंह और उनके पुत्र अखिलेश यादव तमाम नैतिकता को परे कर सरकारी बंगलों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद खाली नहीं कर रहे हैं। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन आवंटित बंगलों को खाली कराने का निर्णय दिया था। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने आदर्श स्थापित करते हुए तुरंत ही अपना बंगला खाली कर दिया। इसी प्रकार राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने भी अपना बंगला खाली करने के लिए सहमति दे दी है। इसके विपरीत मुलायम सिंह, मायावती और अखिलेश यादव अपने-अपने सरकारी आवास खाली न करने के लिए तरह-तरह की बहानेबाजी कर रहे हैं। पिता और पुत्र तो खुद की जान को खतरा बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की शरण में जा पहुंचे हैं। बसपा प्रमुख दलित सम्मान के नाम पर बंगला बचाने की जुगत में लगी हैं। आरटीआई में प्राप्त जानकारी के अनुसार मायावती ने मुख्यमंत्री रहते इस बंगले में ११४ करोड़ खर्च किए थे। भला ऐसे में वे कैसे इस बंगले का मोह छोड़ सकती हैं। अब देखना यह होगा कि योगी आदित्यनाथ किस तरह की कार्यवाही कर इन बंगलों को खाली कराते हैं।

राहुल से दीदी की नाराजगी

कभी कांग्रेस की वफादार सिपाही रहीं ममता बनर्जी की पटरी पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी संग नहीं बैठ पा रही है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की करीबी रही ममता बनर्जी के संबंध सोनिया गांधाी संग अवश्य सौहार्दपूर्ण रहे हैं। कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में पहुंची ममता को यह बेहद नागवार गुजरा कि एसपीजी सुरक्षा के चलते उनके काफिले को काफी दूर ही रोक दिया गया। ममता को पैदल चलकर समारोह स्थल पहुंचना पड़ा। इससे कुपित ममता ने मंच में राहुल गांधी से औपचारिक बातचीत तक करना गंवारा नहीं किया। पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा ने जब दीदी को मनाने का प्रयास किया तो ममता उच्च स्वर में बोलती सुनी गईं कि अब विपक्षी गठबंधन का नया मोर्चा बनाना होगा। कांग्रेस की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि बड़े राजनीतिक दलों का वक्त अब समाप्त हो चला है। वे राज्यों में अपनी सरकारें तक नहीं बचा पा रहे हैं। जानकारों की मानें तो कम्युनिस्ट नेता डी राजा ने इसका जिक्र राहुल से किया तो कांगे्रस अध्यक्ष का नपा-तुला जवाब था कि वे पीएम बनने की कोई इच्छा नहीं रखते। लेकिन किसी को भी यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि बगैर कांग्रेस का समर्थन लिए कोई विपक्षी नेता पीएम बन सकता है। जाहिर है राहुल का इशारा ममता की तरफ था जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा इन दिनों खासी बलवती हैं।

फिर से चोला बदलने की तैयारी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की भाजपा संग पटरी बैठ नहीं रही। गैरभाजपा गठबंधन के सहारे पिछले विधानसभा चुनाव में भारी जीत दर्ज करा पुनः सीएम बने नीतीश कुमार यकायक ही पाला बदल भाजपा संग हो लिए। उनके इस निर्णय ने न केवल लालू यादव की पार्टी को सत्ता से बाहर किया, बल्कि विपक्षी एकता को भी छिन्न-भिन्न करने का काम किया। कांग्रेस अध्यक्ष ने तो व्यथित हो नीतीश कुमार को धोखेबाज तक कह डाला था। अब लेकिन खबर जोरों पर है कि सुशासन बाबू की भाजपा संग भी निभ नहीं रही है। लालू यादव के बेटे तेजप्रताप की शादी में शामिल हो नीतीश ने भाजपा को अपनी अप्रसन्नता से परिचित कराने का संदेश दिया। इसके बाद से ही पटना के राजनीतिक गलियारों में नीतीश कुमार के अगले कदम को लेकर चर्चाएं होने लगी हैं। अब नोटबंदी की आलोचना कर नीतीश बाबू ने भाजपा खेमे में अफरा-तफरी का माहौल पैदा कर दिया है। कर्नाटक में विपक्षी एकता के सामने पराजित होने के बाद अब बिहार में भाजपा नेतृत्व कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता। जानकारों की मानें तो पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व नीतीश कुमार को थामे रखने के लिए जल्द ही बिहार सरकार को बड़ा आर्थिक पैकेज दिला सकता है।

एनएच-७४ का जिन्न
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गत्‌ वर्ष सत्ता संभालने के साथ ही राष्ट्रीय राजमार्ग ७४ के चौड़ीकरण में हुए खरबों के भूमि द्घोटाले की जांच सीबीआई से कराते समय यह नहीं सोचा होगा कि यह जांच उनके गले की हड्डी बन जाएगी। पहले तो केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी उनसे खफा हो गए। गडकरी के चलते मामले की सीबीआई जांच से राज्य सरकार को पीछे हटना पड़ा। अब राज्य सरकार द्वारा गठित एसआईटी की जांच भी राज्य सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बनती जा रही है। सूत्रों की मानें तो छोटे अफसरों और कुछेक बिचौलियों को जेल भिजवा वाहवाही लूटने वाली त्रिवेंद्र सरकार अब भारी धर्म संकट में फंस गई है। खबर है कि एसआईटी को तीन वरिष्ठ आईएएस अफसरों की इस भूमि द्घोटाले में सीधी संलिप्तता की बाबत पुख्ता सबूत हाथ लग चुके हैं। ये तीनों ही अफसर जनपद ऊधमसिंह नगर में तैनात रह चुके हैं। एनएच चौड़ीकरण का द्घोटाला इसी जिले का है। राज्य की ताकतवर आईएएस लॉबी अपने अफसरों को बचाने की पूरी कोशिश कर रही है तो दूसरी तरफ गिरफ्तार अफसरों ने खुलकर अपने वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया है। खबर यह भी है कि कुछेक बिचौलियों ने अपने आकाओं तक संदेश पहुंचा दिया है कि यदि उन्हें बलि का बकरा बनाया गया तो वे सब कुछ उगल देंगे। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली सरकार समझ नहीं पा रही है कि कैसे संकट से निकला जाए। इतना तय है कि पूर्व में हुए द्घोटालों की जांच समान ही यह जांच भी कुछ समय बाद ठंडे बस्ते में डाल दी जाएगी।

सियासी चकल्लस

हार की हैट्रिक
कैराना लोकसभा उपचुनाव पर सबकी नजरें टिकी थी। और वही हुआ जिसका अंदाजा था। नाक का सवाल माने जा रहे इस उपचुनाव में भाजपा को मात मिली है। यह विपक्ष की जीत से ज्यादा भाजपा की हार है। उत्तर प्रदेश के लोकसभा उपचुनावों में मिल रही पराजय की यह हैट्रिक है। अंक गणित के हिसाब से इस हार का भाजपा को कोई मामूली सा भी फर्क भले न पड़े। लेकिन यह एक संकेत और संदेश है। वह यह कि विपक्ष अगर एक हो जाए तो भाजपा जीत से दूर हो जाएगी। कैराना की हार तब है जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री समेत तमाम मंत्रियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कैराना के करीब बागपत में रैली कर चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की। कैराना से विपक्षी उम्मीदवार रालोद की तब्बसुम थी। जीत के शिल्पकार अमित शाह इस नतीजे से सकते में हैं। इसी आधार पर उनको २०१९ के लोकसभा चुनाव, खासकर उत्तर प्रदेश में रणनीति बनानी है। कई राजनीतिक जानकार इस बात को मानने लगे हैं कि ८० लोकसभा सीटों वाले इस प्रदेश में इस दफा भाजपा के लिए जीत की डगर कठिन है। और अगर उत्तर हाथ से निकल गया तो मोदी की फिर से वापसी खतरे में पड़ जाएगी। इस पर कैराना में विपक्ष की जीत ने जैसे मुहर लगा दी है। अब आलम यह है कि विपक्षी दल और भाजपा दोनों ही एक दूसरे की काट ढूंढ़ते हुए २०१९ की तैयारियों में जुट गए हैं।

                                                             माया-ममता का मूड
कर्नाटक प्रकरण के बाद विपक्षी एकता का राग जोर पकड़ने लगा है। इस बात पर लगभग सभी की आम राय है कि अगर २०१९ के लोकसभा चुनाव में मोदी के अश्वमेध के द्घोड़े को रोकना है तो विपक्ष को हर हाल में एक होना पड़ेगा। कर्नाटक में कुमार स्वामी के शपथ समारोह में इस बाबत भाजपा विरोधी दलों की एकजुटता भी दिखाई दी। इसके अलावा उनके पास कोई विकल्प भी नहीं। यह स्थिति कांग्रेस के लगातार कमजोर होने से आयी है। कैराना के लोकसभा उपचुनाव में भाजपा की हार और विपक्षी एकजुटता की जीत से भाजपा की लामबंदी तेज हो गयी है। लेकिन भाजपा विरोधी दलों को लामबंद करना बहुत कठिन है। सबसे मुश्किल है उनका सर्वमान्य नेता कौन है? एक को मनाओ तो दूसरा रूठ जाता है। अभी कुछ दिन पहले मायावती का बदला हुआ बयान आया कि वह लोकसभा चुनाव के पहले एक बार एकजुटता के लिए फिर से विचार करेंगी। इसका जनता के बीच नकरात्मक संदेश गया। असल में मायावती और ममता बनर्जी के मूड का स्थाई रहना बहुत मुश्किल है। कब किस बात पर उनका मूड़ बदल जाएगा, अंदाजा लगाना मुश्किल है। भाजपा विरोधियों को ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि आगामी लोकसभा चुनाव तक इन दोनों का मूड सही और स्थिर रहे।

थराली में वापसी
उत्तराखण्ड के थराली विधानसभा उपचुनाव के नतीजे आ गए। यह सीट भाजपा की थी। इसे उसने बचा लिया है। कैसे बची है, यह भाजपा का दिल ही जानता है। उसके मुख्यमंत्री तो वहां गए ही मंत्री-विधायक तक ने वहां कैंप किया, तब जाकर वह इसको बचा पाई। मनोवैज्ञानिक तौर भाजपा को जरूर लाभ मिलेगा। वैसे भी प्रदेश की जनता की मानसिकता है कि वह उपचुनावों में सत्ताशीन पार्टी के उममीदवार की क्षेत्र के विकास की उम्मीद में जीता देते हैं। मगनलाल की पत्नी मुन्नी देवी की जीत को भी इसी नजर से देखा जा रहा है। दूसरी तरफ कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश पार्टी आज प्रीतम सिंह ने भी जोर तो लगाया। मगर उनकी किस्मत खराब थी। उनको नाकामी है हाथ लगी।

जो सुर्खियां न बनीं

नकल मुक्त परीक्षा
दिल्ली के एक शख्स ने १४ साल से नकल के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। इसके तहत वे सरकारी और निजी स्कूलों के बच्चों के लिए खुद परीक्षा भी आयोजित कराते हैं। इसमें अव्वल बच्चों को अपने पैसे से कंप्यूटर, लैपटॉप और साइकिल जैसे इनाम देते हैं। इस शख्स का नाम सतीश देशवाल है। वे पेशे से कारोबारी हैं। अपने आठ दोस्तों के साथ शुरू किए इस अभियान में आज उसके साथ करीब ८८०० लोग जुड़ चुके हैं। २०१८ में आयोजित परीक्षा में दिल्ली देहात और सोनीपत जिले के ७५० गांवों के ८७ हजार बच्चों ने हिस्सा लिया था। इसमें २८०० बच्चे इनाम के लिए चुने गए। सतीश देशवाल हरियाणा सोनीपत के खेडी दमकन गांव के रहने वाले हैं। बचपन में ही कारोबार के लिए गांव छोड़कर दिल्ली आ गए। साल २००० में सतीश अपने गांव पहुंचे तो पता चला कि उनके गांव का स्कूल पूरे जिले में नकल के लिए बदनाम है। बस यही बात सतीश के दिल पर लग गई। फिर सतीश और उनके दोस्तों ने एक समिति बनाई। २००४ में सतीश और उनके २० दोस्तों ने प्रतियोगी परीक्षा का आयोजन किया। इस आयोजन में ६५० बच्चों ने हिस्सा लिया। इसमें पहले २० बच्चों को कंप्यूटर और साइकिल इनाम में दिए। परीक्षा के इंतजाम के लिए १८०० लोगों की टीम पूरे साल काम करती है। पेपर तैयार करने से लेकर जांच के लिए स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों को शामिल किया है। पेपर की छपाई कहां होगी, यह केवल सतीश को पता होता है। पेपर सेंटर तक पहुंचाने का काम उसी दिन सतीश की कोर टीम करती है। पेपर ओएमआर शीट पर होता है। उसकी जांच के लिए एक सॉफ्टवेयर डेवलप किया गया है।

बरगद का बगीचा
अभी तक आपने आम, लीची, सेब आदि फलों के बगीचे के बारे में सुना और देखा होगा। बरगद का बगीचा न देखा होगा और सुना होगा। मध्य प्रदेश इंदौर के समीप बड़गोंदा स्थित वन विभाग के अनुसंधान एवं विस्तार केंद्र में देश का पहला बरगद का बगीचा तैयार किया जाएगा। बरगद की ३० तरह की प्रजातियां होती हैं। जिसे यहां दो हेक्टेयर में लगाई जाएंगी। आगामी बारिश के दौरान ही पौधे लगा दिए जाएंगे। इस बगीचे के तैयार होने से पक्षियों को एक नया बसेरा मिल जाएगा। अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ पीसी दुबे के मुताबिक जैव विविधता के लिहाज से यह पार्क बहुत फायदेमंद साबित होगा। बरगद भूमिगत जल को संरक्षण देता है। इससे ऑक्सीजन का एक नया पॉकेट तैयार हो जाएगा। बरगद की कई प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। भगवान बुद्ध के बोधी वृक्ष को भी यहां लगाया जा रहा है। एक पेड़ की उम्र एक हजार साल के लगभग होती है। बड़गोंदा में ही बांस का पार्क भी बनाया जा रहा है। पूर्वोत्तर राज्यों के बांस से लेकर स्थानीय प्रजाति और बेंगलुरु से हाइब्रिड भी यहां लगाया गया है।

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