वर्तमान एनडीए शासन, विशेषकर मोदी-शाह की कार्यशैली से त्रस्त विपक्षी दलों में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को मिली चुनावी सफलता ने संजीवनी देने का काम किया था। विपक्षी एकता के बड़े दावे और जबरदस्त प्रयासों का दौर शुरू हुआ। राजनीतिक विशेषज्ञ मोदी की करारी हार का दावा तक करने लगे थे। हालात लेकिन अब उलट हैं। कांग्रेस नेतृत्व ना तो विपक्षी एकता के प्रति गंभीर प्रयास करता नजर आ रहा है, ना ही उसे भाजपा विरोधी वोटों के बिखरने का डर सता रहा है। सपा-बसपा, आप, त्रिणमूल कांग्रेस समेत सभी बड़े विपक्षी दलों की शिकायत है कि कांग्रेस लोकसभा सीटों पर अधिक दावेदारी पर अड़ी है। दूसरी तरफ भाजपा नेतृत्व हर छोटे-बड़े सहयोगी दल के समक्ष झुक कर गठबंधन को फाइनल करने में जुटा है। बिहार में एनडीए दलों के बीच फाइनल बातचीत हो चुकी है तो कांग्रेस के साथ जा चुके जीतनराम मांझी अब फिर भाजपा में जाने पर विचार कर रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना की तमाम धमकियों को नजरअंदाज कर भाजपा ने उसके संग गठबंधन डील कर डाला है तो कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी है। कर्नाटक में तो हालात सबसे ज्यादा खराब हैं जहां सहयोगी दल जनता दल(एस) संग कांग्रेस की बिल्कुल नहीं बन रही। ऐसे में चुनाव नजदीक आने के साथ-साथ अब राजनीति विश्लेषकों का आंकलन एक बार फिर एनडीए सरकार के गठन की तरफ इशारा करने लगा है।

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