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पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह इन दिनों खासे बेचैन हो चले हैं। वे दरअसल इस सच को पचा ही नहीं पा रहे हैं कि कांग्रेस आलाकमान उन्हें सीएम पद से हटा एक दलित सिख को राजपाट सौंपने का ‘दुस्साहस’ कर सकती थी। ऐसा लेकिन हुआ। नाराज अमरिंदर ने पार्टी छोड़ अपनी पार्टी गठित कर डाली। इस पर भी उनकी बेचैनी कम नहीं हुई तो वे भाजपा के बगलगीर हो गए। उनका अब एक मात्र लक्ष्य कांग्रेस को नुकसान पहुंचाना भर रह गया है। भाजपा का पंजाब में कोई नाम लेता है नहीं इस चलते उसने तुरंत कैप्टन की पार्टी संग तालमेल करने की घोषणा कर डाली। इससे उत्साहित कैप्टन ने भाजपा पर पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। अब तक वे दसियों मर्तबा राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर चुके हैं। दशकों से राजनीति में सक्रिय कैप्टन प्रतिशोध की ज्वाला में ऐसा झुलस रहे हैं कि मामूली घटनाओं को लेकर भी चन्नी सरकार के खिलाफ विषवमन कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करते घूमने लगते हैं। कुछ अर्सा पहले लुधियाना में बम विस्फोट हुआ तो तुरंत कैप्टन ने राष्ट्रपति शासन की मांग कर डाली। केंद्र सरकार ने सीमा सुरक्षा बल का अधिकार क्षेत्र बढ़ाया तो चन्नी ने इसका पुरजोर विरोध किया। इसी विरोध को मुद्दा बना कैप्टन राष्ट्रपति शासन की रट लगाने लगे। अब प्रधानमंत्री की पंजाब यात्रा के दौरान सुरक्षा चूक को लेकर वे अपनी इस मांग को खासे उत्साह से उठा रहे हैं। पंजाब की राजनीति के जानकारों का दावा है कि कैप्टन का लक्ष्य प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगवा कर खुद राजभवन के सहारे राज करना है। संकट यह कि भाजपा उनकी मांग को गंभीरता से लेती नजर नहीं आ रही है। लगता है पंजाब चुनाव के साथ ही अमरिंदर सिंह की राजनीतिक यात्रा में पूर्ण विराम लग जाएगा।

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