प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही सबसे ज्यादा विदेश भ्रमण करने वाले पीएम का खिताब हासिल कर चुके हों, एनडीए सरकार के साढ़े चार साल पूरे होते-होते एक बात स्पष्ट होती जा रही है कि भारत की विदेश नीति कहीं न कहीं भारी संकट का सामना कर रही है। पाकिस्तान संग भारत की अदावत दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक कारणों के चलते है लेकिन अन्य पड़ोसी मुल्कों संग भी इस बीच हमारे संबंध कमजोर हुए हैं। मालद्वीव, नेपाल और बांग्लादेश का इन साढ़े चार सालों के दौरान चीन की तरफ झुकाव बढ़ा है। इन सभी देशों में चीन ने बड़ा पूंजी निवेश कर अपनी पकड़ मजबूत की है। मालद्वीव में तो चीन ने अपना फौजी ठिकाना तक बना डाला है। पिछले दिनों श्रीलंका में हुए राजनीतिक घटनाक्रम ने भी भारत की विदेश नीति पर प्रश्न चिन्ह लगाने का काम कर डाला। भारत संग दोस्ती के हिमायती प्रधानमंत्री को हटा महेंद्र राजपक्षे का पीएम बनना स्पष्ट संकेत है कि अब वहां भी चीन का दबदबा बढ़ेगा। श्रीलंका के राष्ट्रपति पहले ही भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ पर अपनी हत्या के षड्यंत्र रचने की आशंका जता चुके हैं। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आने का न्यौता ठुकरा इन चर्चाओं को गर्म कर दिया है कि जितना हो-हल्ला सरकारी तंत्र पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच गर्मजोशी वाले संबंधों का मचाता है, वैसा दरअसल है नहीं। दिल्ली के सत्ता गलियारों में बड़ी चर्चा है कि 2018 भाजपा के लिए शुभ नहीं है और 2019 में भी ग्रहगोचर पार्टी के विपरीत हैं।

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