Positive news

पानी लौटाने की मुहिम

उत्तराखण्ड के परंपरागत जल स्रोतों की अनदेखी भविष्य में काफी महंगी पड़ सकती है। अब तक 500 जल स्रोत सूख चुके हैं। ऐसे में डॉ. पीताम्बर अवस्थी ने इन्हें बचाए रखने की अनूठी मुहिम शुरू की है। वे नई पीढ़ी को इसके लिए उत्साहित कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने ‘उत्तराखण्ड के परंपरागत जल स्रोत नामक एक किताब लिखी है। जनजागरूकता के लिए वे इसे लोगों को निःशुल्क बांट रहे हैं

 

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ में प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण के तौर-तरीकों के साथ ही इस मुहिम में जुटे लोगों की पहचान करने व जल संरक्षण को मिशन मोड में लाने के बाद अब उन लोगों को उम्मीद जगी है जो वर्षों से प्राकृतिक जल संरक्षण के अभियानों में जुटे हैं। इधर पूर्वोत्तर राज्य मेघालय के जलनीति बनाने वाले पहले राज्य का तमगा हासिल करने के बाद से यह उम्मीद भी जगी है कि वाटर टैंक के नाम से मशहूर उत्तराखण्ड भी अपने जल स्रोतों के संरक्षण के लिए कोई नीति तय करेगा। प्रदेश में जलनीति न होने एवं प्राकøतिक जल स्रोतों के संरक्षण की उपेक्षा के चलते आज पूरे प्रदेश में जल संकट गहरा रहा है।

ऐसा नहीं है कि प्रदेश में प्राकृतिक जल संरक्षण के अभियान में जुटे लोगों की कोई कमी है। सैकड़ों लोग इस काम में जुटे हुए हैं। इनमें से एक नाम है, डॉ. पीताम्बर अवस्थी। वे लंबे समय से प्रदेश के नौलों, धरों के संरक्षण की मुहिम में जुटे हुए हैं। इसके लिए उन्होंने एक किताब ‘उत्तराखण्ड के परम्परागत जल स्रोत’ नाम से प्रकाशित की है। जिसमें प्रदेश भर के नौलों, धरों, चाल, खाल का वर्णन किया गया है। इस किताब को निःशुल्क जन समुदाय के बीच भी वितरित किया जा रहा है ताकि वह प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण के महत्व को समझ सकें और इस काम में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें। प्रधानमंत्री के मन की बात के बाद से वह उत्साहित हैं और कहते हैं कि प्रदेश में पानी लौटाने की जो मुहिम चल रही है वह अब बड़े अभियान का रूप ले सकती है। आज पूरे प्रदेश में जिस तरह से जल संकट गहरा गया है उसके लिए हर संवेदनशील नागरिक को अपने स्तर पर भी पहल करना जरूरी है सिर्फ सरकारों के सहारे प्राकृतिक जल संरक्षणों का रास्ता नहीं तलाशा जा सकता, इसके लिए जनभागीदारी जरुरी है। डा. अवस्थी कहते हैं कि आज के दौर में पानी की हर बूंद मूल्यवान है लेकिन यह मूल्यवान वस्तु तभी आपके पास रह सकती है जब आप पानी के स्रोतों का संरक्षण कर उसे बचाएंगे। नई पीढ़ी के लिए पानी को सुरक्षित रखना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जिस तरह पुरानी पीढ़ी ने इसे अपनी नई पीढ़ी को विरासत में सौंपा था, वह भी इस परंपरा का निर्वहन कर इसे अगली पीढ़ी को बेहतर स्थिति में सौंपे। यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि जीवन पानी के बगैर संभव नहीं हैं।

डॉ अवस्थी केंद्रीय जल आयोग एवं नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए जल संकट की भयावहता की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि जल आयोग की रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 1991 में जहां प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 2209 घन मीटर थी वह अब 1500 घन मीटर के आस-पास रह गई है। वर्ष 2025 तक यह 1340 तथा वर्ष 2050 में 1139 घन मीटर रह जाने का अनुमान है। पानी की इस कमी की मुख्य वजह परंपरागत जलस्रोतों की अनदेखी का परिणाम रहा है। अकेले उत्तराखण्ड में 17032 बस्तियां ऐसी हैं, जहां लोग बूंद-बूंद पानी को संघर्ष कर रहे हैं। 500 से अध्कि जल स्रोतों का पानी सूख चुका है। वहीं नीति आयोग के दिशा-निर्देशन पर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के एक अध्ययन के अनुसार पूरे हिमालयी क्षेत्रा में 30 प्रतिशत जलस्रोत सूख चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार 50 लाख से अधिक जलस्रोतों पर सूखने का संकट मंडरा रहा है। विड़बंना देखिए विश्व के करीब चार प्रतिशत जल स्रोत वाले देश को जल अतिरेक वाला देश होना था, वह जलाभाव वाला देश बन गया है। आजादी के बाद से न तो जल संरक्षण के उपायों और न ही बरर्बाद होते पानी को रोकने के उपायों पर ईमानदारी से प्रयास किए गए। सवाल सिर्फ पानी की कमी का ही नहीं, बल्कि उसके लगातार दूषित होने का भी है। अधिकांश जल स्रोत यानी नदियां और उनके मुहाने, छोटे-बड़े तालाब, नौले, धरे लगातार प्रदूषित होते जा रहे हैं। इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है कि टेम्स नदी जिसे वहां के लोग सामान्य नदी मानते हैं, उन्होंने उसकी उपयोगिता को समझते हुए उसे निर्मल व साफ रखा है, तो वहीं गंगा नदी जिसे मां का दर्जा प्राप्त है, वह इतनी गंदी हो चुकी है कि अपनी निर्मलता को ही खो चुकी है। एक दौर में गंगा के जल को इतना पवित्र माना जाता था कि लोग इसमें डुबकी लगा अपने पापों से मुक्ति पाने की कामना करते, तो वहीं कुछ जल घरों में ला इसका छिड़काव करते। लेकिन आज इसी गंगा का पानी सड़ांध मारने लगा है। आखिर इतनी वैभवशाली नदी की दुर्दशा का जिम्मेदार किसे माना जाए?

‘उत्तराखण्ड के परम्परागत जलस्रोत’ विषय पर लिखी पुस्तक में डॉ अवस्थी जल के सांस्कृतिक व लोक परंपरा में जल के महत्व के साथ ही जल किस तरह से लोक पर्वों से जुड़ा रहा है, जैसे अहम सवालों को भी उठाते हैं तो वहीं आमजन के जलपानाधिकार जैसे विषयों पर भी प्रकाश डालते हैं। पानी की वर्तमान स्थिति की वास्तविक तस्वीर के साथ ही इनके बचाव के उपायों को भी पुस्तक में समाहित किया गया है। लोक नदी गंगा की दुर्दशा के कारणों के साथ ही गिरते भू-जल स्तर, वर्षा जल सहेजने के उपायों पर भी चर्चा की गई है। किताब की प्रस्तावना में वह लिखते हैं कि जल प्रकृति का निःशुल्क उपहार है। धरा पर प्राणियों की उत्पत्ति इसके अस्तित्व से ही संभव हुई है। हमारे पूर्वजों ने जल की महत्ता को समझकर इसे जीवन नाम दिया। जल तथा जल उद्गम स्थली को श्रद्धा और पूजनीय स्वरूप प्रदान किया। जलाशय को प्रदूषित करने को पाप की संज्ञा दी गई तो निर्माण व पवित्रता बनाए रखने को पुण्य का कार्य माना है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने निर्मित एवं विकसित जल प्रबंध की परंपराओं को उनके स्थानीय परिस्थितिजन्य ज्ञान, परिवेश एवं उपलब्ध संसाधनों के अनुरूप उनके धार्मिक व सांस्कृतिक स्वरूप से जोड़ा है। उनमें उनकी भौगोलिक परिस्थिति को समझते हुए दूरदर्शिता अंतर्निहित है। इसी दूरदर्शिता व परम्परा के पालन के कारण उनकी जल व्यवस्था वर्षों से क्षेत्रवासियों को संतृप्त करती आई है। उनके द्वारा जल सबंधी व्यवस्थाओं के निर्माण और विकास में व्यावहारिक परिस्थितियां, जो कि स्थानीय परिवेश एवं पर्यावरण के अनुकूल थीं, को पूर्णरुपेण ध्यान में रखा गया तथा उसे जन जीवन के अंतर्मन में गहराई तक प्रविष्ट कराने के लिए लोक मान्यताओं को विकसित किया गया तथा इसको धर्म, अध्यात्म और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा गया। ये व्यवस्थाएं आज भी उपयोगी तो हैं ही साथ ही स्वदेशी परिस्थिति के अनुकूल तकनीक व परम्परागत जल प्रबंधन की तारतम्यता को भी प्रदर्शित करती हैं। यही वजह है कि हमारे पूर्वजों ने जल को दैवीय स्वरूप प्रदान किया।

डॉ अवस्थी ने अपनी पुस्तक में जिलेवार नौलों, धरों, तालाबों का वर्णन किया हुआ है। इसमें बताया गया है कि पहले कितने प्राकृतिक जलस्रोत अस्तित्व में थे अब कितने रह गये हैं। विलुप्त होने की क्या वजहें रही हैं। इसके साथ ही वह बताते हैं कि किस तरह से प्राकृतिक जल स्रोतों का अस्तित्व बचाया जा सकता है। गांव- गांव घूमकर वह न सिर्फ प्राकृतिक जलस्रोतों की जानकारी ले रहे हैं, बल्कि लोगों को जल संकट की भयावहता के साथ प्राकृतिक जलस्रोतों को क्यों बचाया जाना चाहिए इसके लिए जागरुकता अभियान चला रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि पानी बचाने की उनकी यह मुहिम जन सहभागिता का रुप धारण करेगी।

You may also like