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खुद सड़क बनाने को विवश ग्रामीण

उत्तराखण्ड में वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डबल इंजन की सरकार बनाने का आह्नान किया था। इस पर जनता ने विकास की उम्मीद में कांग्रेस को बेदखल कर भारतीय जनता पार्टी को सत्ता दे दी। भाजपा को सत्ता में लाने वाली जनता ने नयी सरकार से न जाने कितनी उम्मीदें संजोकर रखी थी, पर उनकी उम्मीदों और सब्र का बांध अब टूट चुका है। अब जनता को अपने चुने हुए नेताओं पर भरोसा नहीं रहा। यही कारण है कि जिस सड़क का काम पिछले 20 सालों से पूरा नहीं हो सका उसको पूरा करने की अब गांव वालों ने ठान ली है। ये स्थिति है ग्राम सभा सेंदूल से लेकर ग्राम सभा पट्ठड़ गांव पट्टी केमर बिकास खण्ड भिलंगना टिहरी गढवाल की, जिसमें तकरीबन 15-20 गांव आते हैं। जहां नेता वोट मांगने घोड़े पर बैठकर आते हैं और सड़क निर्माण और विकास का वादा करके चले जाते हैं। लेकिन जीतने के बाद स्थिति ज्यों के त्यों बनीं हुई है। इन ग्रामीणों की आवाज न तो सत्ता के गलियारे तक पहुंच पाई है और न ही मीडिया के कानों तक। इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं हैं। इन्हें सिर्फ वोट बैंक तक सीमित रखा गया है। एक तरफ जहां देश में बुलेट ट्रेन की बात चल रही है, वहीं उत्तराखण्ड में सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार दूर-दूर तक कहीं नहीं नजर नहीं आता। अब उम्मीद करें तो करें किससे यही कारण है कि अब ग्रामीण सरकार के भरोसे न बैठ कर स्वयं ही सड़क निर्माण का कार्य कर रहे हैं ताकि अपने गावों को विकास से जोड़ सकें।

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