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समाज को समर्पित शिक्षिका

सड़क पर भीख मांगते बच्चों, मलिन बस्तियों में शिक्षा से वंचित बचपन को देखकर शिक्षिका संगीता को बड़ी तकलीफ होती है। वे ऐसे बच्चों के जीवन में रोशनी करने के लिए समर्पित हैं

झुग्गी-झोपड़ियों और मलिन बस्तियों में भी जीवन बसता है। यहां पल रहे बच्चों की आंखों में भी सपने होते हैं। आखिर वे पढ़ाई-लिखाई छोड़कर सड़कों पर भीख क्यों मांगे? उन्हें भी उजाला चाहिए। शिक्षिका संगीता कोठियाल फरासी जैसे बहुत कम लोग ऐसे होते हं जो इस दिशा में सोच पाते हैं।

मलिन बस्ती के बच्चों के बीच संगीता

आज के सम में हालात ऐसे हो चुके हैं कि व्यक्ति अपने बारे में ही सोचेन तक सीमित है। ऐसे में संगीता फरासी जैसी शिक्षिकाएं भी हैं जो समाज सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लेती है। संगीता पिछले चार साल से श्रीनगर गढ़वाल में रहती हैं। पहाड़ में महिलाओं का जीवन काफी विकट होता है। उस विकटता में भी इनके अंदर सेवा भाव कूट-कूटकर भरा हुआ है। अपनी प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही इन्होंने मन बना लिया था कि गरीब बच्चों के लिए कुछ करना है। जब वे शिक्षिका बनी और श्रीनगर गढ़वाल में उन्होंने देखा कि यहां छोटे-छोटे बच्चे कूड़ा बीन रहे हैं, कुछ कटोरा लेकर सड़कों पर भीख मांगते फिर रहे हैं तो उन्हें इसका भारी दुख हुआ। शिक्षिका संगीता फरासी का कहना है कि उन्हें शहर में भीख मांगते बच्चों को देखना बेहद तकलीफदेह लगता था। जब भी वह ऐसे बच्चों को भीख मांगते हुए देखती तो मन ही मन बेहद दुखी होती। संगीता ने इन बच्चों की भीख मांगने की आदत छुड़ाकर इन्हें मुख्यधारा में शामिल करने का संकल्प लिया। उन्होंने मलिन बस्ती में जाकर इन बच्चों के माता-पिता से मुलाकात की। इन बच्चों के माता- पिता से इन्हें भीख मांगने में लगवाने के बजाय स्कूल भेजने की बात की। लेकिन वे नहीं माने। जब शिक्षिका संगीता ने बच्चों को निःशुल्क शिक्षा, कॉपी किताब, स्कूल यूनिफार्म, खाद्य सामग्री आदि देने का वादा किया तो उनके परिजनों ने हामी भर दी। इस तरह संगीता ने कुल 10 बच्चों से सड़कों पर भीख मांगना छुड़वाकर उनका स्कूल में दाखिला करवाया। उनके ट्यूशन की व्यवस्था कराई। जिसका खर्च वह खुद वहन करती हैं। संगीता सरकारी नौकरी में हैं। ड्यूटी खत्म होने के बाद वे इन बच्चों को दो घंटे का समय देती हैं। इनको हुनरमन्द बनाने के लिए एक कर्मचारी को मासिक वेतन देती रही हैं। आज इनके पास ऐसे कई बच्चे है जिन्हें पढ़ाकर वे उनके जीवन में ज्ञान का भंडार भर रही हैं, वह भी बिना किसी सरकारी सहायता के। संगीता बच्चों को पढ़ाती हैं एवं हर प्रकार की सहायता देती हैं। उनके पेन, पेंसिल, कॉपी, किताब इत्यादि का खर्चा भी स्वयं ही उठाती हैं। अपने उद्देश्य के बारे में वे कहती हैं कि यदि हम इन बच्चों की सहायता नहीं करेंगे तो इनका जीवन अंधकारमय हो जाएगा। मेरे थोड़े से प्रयास से यदि इन बच्चों को जीवन में कामयाबी मिल जाए तो मेरा जीवन सार्थक हो जाएगा। इन्होंने इस वर्षा बच्चों को गढ़वाली- कुमाउंनी भाषा सिखाने का निर्णय भी लिया गया है।

शिक्षिका संगीता के सराहनीय कार्यों के लिए इन्हें सम्मानित भी किया जाता रहा है। निश्चय वैलफेयर सोसाइटी देहरादून, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर अखिल भारतीय गौ रक्षा महासंघ, उत्तराखण्ड, विश्व महिला दिवस पर मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट श्रीनगर गढ़वाल, हिमालय साहित्य एवं कला परिषद चैरिटेबल ट्रस्ट श्रीनगर गढ़वाल, बाल प्रतिभा सम्मान परिषद, एसएन एडवरटाइजर एण्ड कंपनी द्वारा इन्हें सम्मानित किया गया है। समाज के गरीब एवं उपेक्षित बच्चों के जीवन में उजाला करने के साथ ही शिक्षिका संगीता महिला सशक्तिकरण के लिए भी कार्य कर रही हैं। इनकी भावना एवं समर्पण को पूरा उत्तराखण्ड सलाम करता है।

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