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देवभूमि के शक्तिपीठ

प्रदेश में महाशक्ति की अराधना महापर्व नवरात्रा शुरू हो चुके हैं। इसके साथ ही जगह-जगह दुर्गा महोत्सव व रामलीला का आयोजन भी हो रहा है। नवरात्रा के इन नौ दिनों में कन्याओं की पूजा के साथ ही माता की अराधना भी पूरे मनोयोग से हो रही है। जो यह संदेश देता है कि मातृशक्ति से बड़ी अन्य कोई शक्ति नहीं है। प्रदेश में माता के प्रमुख मंदिरों की भरमार है। यह स्थल धार्मिक आस्था के साथ ही पर्यटन के भी बड़े केंद्र रहे हैं। वर्ष भर यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। इस बार आपको ले चलते हैं प्रदेश के कुछ प्रमुख देवी मंदिरों की ओर

 

हॉट कालिका मंदिर, गंगोलीहाट : जनपद पिथौरागढ़ में स्थित इस मंदिर को दिव्य चमत्कारों वाला माना जाता है। माना जाता है कि महाकाली के चरणों में अराधना करने वालों के रोग, शोक, दरिद्रता एवं विपदाएं दूर हो जाती हैं। पूर्णागिरी मंदिर, टनकपुर : जनपद चंपावत में स्थित यह सिद्धपीठों में से एक है। टनकपुर से लगभग 21 किमी. दूर स्थित इस मंदिर में दर्शनों के लिए लोगों का तांता लगा रहता है। वाराही मंदिर, देवीधुरा : चंपावत जनपद में स्थित देवी के इस मंदिर में हर साल श्रावणी पूर्णिमा को बग्वाल खेली जाती है। नैना देवी मंदिर, नैनीताल : नैनीताल जनपद स्थित नैनी झील के किनारे इस मंदिर में सती के शक्ति रूप की पूजा की जाती हैं। मंदिर में दो नेत्रा हैं जो नैना देवी को दर्शाते हैं। गर्जिया देवी मंदिर : नैनीताल जनपद स्थित यह मंदिर माता पार्वती के प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह स्थल शांति व रमणीयता के लिए प्रसिद्ध है। कोटगाड़ी (कोकिला) देवी मंदिर : जनपद पिथौरागढ़ के थल कस्बे से 9 किमी. दूर स्थित है यह मंदिर। इसे ‘अंतिम दिव्य अदालत’ के रूप में माना जाता है। यहां न्याय से वंचित भक्त के साथ ही अन्य भक्त भी अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने की इच्छा से आते हैं। कोटभ्रामरी मंदिर, बागेश्वर : यह भ्रमारी व कोट माई के नाम से जाना जाता है। यह बैजनाथ से 3 किमी. की दूरी पर डंगोली के समीप है। चैती (बाल सुंदरी मंदिर) काशीपुर : जनपद ऊधमसिंह नगर स्थित इस मंदिर में चैत मास में चैती मेला लगता है। इसे आदिशक्ति के बाल रूप में पूजा जाता है। नंदा देवी मंदिर, अल्मोड़ा : इस मंदिर का इतिहास हजार साल से भी उपर का माना जाता है। कुमाऊंनी शिल्पविद्या शैली से निर्मित यह मंदिर चंद वंश की ईष्ट देवी को समर्पित है। कसार देवी मंदिर, अल्मोड़ा : अल्मोड़ा के कसार पर्वत पर स्थित यह मंदिर चुंबकीय शक्ति का केन्द्र माना जाता है। माना जाता है कि इस शक्तिपीठ में मां दुर्गा साक्षात् प्रकट हुई थी।

दूनागिरी मंदिर, द्वाराहाट : यह द्वाराहाट से 14 किमी. दूर स्थित हैं। मां दूनागिरी की वैष्णवी रूप में पूजा की जाती है। अखिलतारणी मंदिर, लोहाघाट। इसे उप शक्तिपीठ के रूप में मान्यता है। कहा जाता है कि यहां पांडवों ने घटोत्कच का सिर पाने के लिए मां भगवती की प्रार्थना की थी। कालीमठ मंदिर, रूद्रप्रयाग : यह महालक्ष्मी, महासरस्वती व महाकाली के सिद्धपीठ के रूप में जाना जाता है। कुन्जापुरी देवी मंदिर, नरेंद्रनगरः ऋषिकेश से लगभग 25 किमी. दूर स्थित यह मंदिर देवी सती को समर्पित है। मान्यता है कि यहां पर माता सती के शरीर का ऊपरी भाग गिरा था। ज्वालपा देवी मंदिर, सतपुली : नबालिका नदी के किनारे स्थित इस मंदिर की विशेष मान्यता है। कालिंका मंदिर, बीरोंखाल : पौड़ी गढ़वाल स्थित यह मंदिर को मां काली का स्वरूप माना जाता है। यहां हर तीन साल में सर्दिर्यों के मौसम में मेला लगता है। सुरकुंडा देवी मंदिर, कद्दूखाल। टिहरी जिले में स्थित यह मंदिर सुरकुट पर्वत पर लगभग 2757 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। नंदा देवी मंदिर, कुरूड़ : चमोली जनपद में स्थित इस मंदिर को राजराजेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। मनसा देवी मंदिर, हरिद्वार : मनसा देवी को भगवान शिव की मानस पुत्री के रूप में पूजा जाता है। इनका प्रादुर्भाव मस्तक से हुआ है। इस कारण इनका नाम मनसा पड़ा। इन्हें नागराज वासुकी की बहन के रूप में भी पूजा जाता है। चंद्रबदनी मंदिर, देवप्रयाग : यह शक्तिपीठों व माता सती के पवित्रा स्थल के रूप में माना जाता हैं यह चंद्रकूट पर्वत के ऊपर स्थित है। हरियाली देवी मंदिर, रूद्रप्रयाग : इस मंदिर की देवी को सीता माता, बाला देवी व वैष्णो देवी के नाम से भी जाना जाता है। चण्डी देवी मंदिरः हरिद्वार के नील पर्वत के शिखर पर प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि इस मंदिर की मूर्ति को महान संत आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में स्थापित किया था। नागणी देवी मंदिर : उत्तरकाशी के बालखिला पर्वत पर स्थित मंदिर की भी काफी मान्यता है। धारी देवी मंदिर, श्रीनगर : अलकनंदा नदी के तट पर स्थित इस मंदिर को प्राचीन सिद्धपीठों में माना जाता है। माता धारी देवी को उत्तराखण्ड की रक्षक देवी के रूप में जाना जाता है।

झूमादेवी : लोहाघाट के उत्तर में मरोड़खान पर्वत खिर में इसका मंदिर है। स्थानीय पाटन गांव से देवी का डोला इस मंदिर में लाया जाता है। झूला देवी : रानीखेत-चौबटिया मार्ग पर इस देवी का मंदिर स्थित है। यहां नित्य पूजा अर्चना होती है। दुर्गा देवी : मल्ला जोहार में रावत, धर्मसक्तू, पांगती, सयाना, जंगपांगी जातियों के लोग इस देवी की पूजा करते हैं। दूनागिरीदेवी : द्वाराहाट नगर के
दूनागिरी पर्वत शिखर पर इस देवी की पूजा की जाती हैं। इसे वैष्णव देवी के नाम से जाना जाता है। यहां भी प्रतिदिन पूजा होती है यहां पर सप्तमी व अष्टमी को विशेष पूजा का आयोजन होता है। धुर्कादेवी : यह काफलीखान से भनोली जाने वाले मार्ग पर स्थित पर्वत पर स्थित है। नंदा देवी : यह कुमाऊं व गढ़वाल में पूजी जाती हैं। यह कुमाऊं के चंद व कत्यूरी तो गढ़वाल के पंवारवंशी राजाओं की कुलदेवी रही हैं। इसे हिमालय की पुत्री व शिव की अर्द्वागिनी माना जाता है। नारसिंही देवी : अल्मोड़ा के मजखाली-सोमेश्वर मार्ग पर गोलछीना के निकट गल्ली ग्राम में नारसिंही देवी का सिद्धपीठ है। न्यूडांग देवी : दारमा में निवास करने वाली शौका जाति के लोग इसकी पूजा करते हैं। नैणकालिका : अल्मोड़ा जनपद में काकड़ीगाड़ के तट पर यह प्राचीन मन्दिर है। नैथाणादेवी : अल्मोड़ा जनपद के पाली के निकट नैथाणा गांव के पर्वत शिखर पर देवी का सिद्धपीठ है।

नैनादेवी : नैनीताल में नैनादेवी का मंदिर स्थित है। पातालदेवीः अल्मोड़ा के धार की तूनी के निकट पातालदेवी के नाम से देवी का प्राचीन मंदिर है। पाषाण देवी : नैनीताल के ठंडी सड़क पर इस देवी की पूजा की जाती है। बानणी देवी : अल्मोड़ा-लमगड़ा मार्ग पर एक पर्वत शिखर पर इसकी पूजा की जाती है।

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