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सरकारी तंत्र से त्रस्त, गांववालों ने खुद बना डाली सड़क

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गंगोली हाट से 15 किमी दूर टुंडा चौड़ा गांव में आजादी के बाद से वहां के लोग सड़क के आने की आस लगाए बैठे हैं। लेकिन इस बाबत लोगों की हर अपील  पर सरकारों से सिर्फ कोरे आश्वासन ही मिले।गांव के लोगों ने कई पत्र लिखे, कई नेताओं के घरों के चक्कर भी लगाए पर आजतक उनकी इस गुहार को किसी ने नहीं सुना।

स्थानीय लोगों के मुताबिक ,नेताओं ने यही कहा कि “सरकार आपका काम कर रही है।आपका काम हो जाएगा।” लेकिन इन आश्वासनों से थककर अब गांव के युवाओं ने खुद अपने हाथों में बेलचा, गेंड़ी पकड़ ली है।उन्होंने गांव की प्रधान मनीषा बिष्ट और उनके पति गोविंद बिष्ट से बात की। जहां यह तय हुआ कि अब गांव की समस्या गांव वाले ही दूर करेंगे।
पहले सप्ताह 7 से 8 लोग सड़क निर्माण में जुड़े। फिर  35 युवा सम्मिलित हुए और देखते ही देखते यह संख्या बढ़ने लगी। जब सड़क निर्माण में दूसरे गांव दुगई अगर के लोगों की जमीन की जरूरत पड़ी तो वहां के पूर्व प्रधान और वर्तमान उप प्रधान मोहन चंद्र जोशी ने बेहिचक इस नेक कार्य में अपना योगदान दिया। उन्होंने अपने गांव के लोगों ख़ासकर बड़े बुजुर्ग को समझाया कि ये लड़के अच्छा काम कर रहे हैं, इसलिए हमें इनकी हर सम्भव मदद करनी चाहिए।
उसके बाद तो तीन गांव को मिलाकर लगभग 200 लोग इस मुहिम से जुड़ गए। 12 वें दिन स्थानीय विधायक मीना गंगोला से बात हुई, सड़क निर्माण में तकनीकी समस्याओं का निराकरण करने के लिए सड़क का सर्वे करवाया गया। दूसरे गांव के रंजीत सिंह,गोकुल सिंह और अन्य ने अपने खेत भी दे दिए। लेकिन सिर्फ श्रम दान से सड़क का काम तेजी से पूरा होनहीं किया जा सकता था,इसलिए पत्रकार गोविंद सिंह ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रमेश भट्ट से बात की।
उससे यह मदद मिली कि सरकार ने पीडब्ल्यूडी से जेसीबी मशीन निःशुल्क सात दिन के लिए उपलब्ध कराई। टुंडा चौड़ा गांव के लोगों के साथ अब दुगई अगर छैतिगांव और ईटना गांव के लोग भी इस मुहिम में साथ आ गए हैं। गांव के ठेकेदार रामसिंह बिष्ट ने भी अपनी जेसीबी मशीन सड़क कटान के लिए दे दी। जिसके बाद अब तीनों गांव कब लोगों के सहयोग से सड़क का कार्य अब अंतिम स्थिति में हैं। जो कार्य आजादी के बाद से अब तक नहीं हो पाया था अब गांव वालों ने खुद कर दिखाया है।
टुंडा की प्रधान मनीषा बिष्ट की बात करें तो वह बीएससी फाइनल की तैयारी कर रही हैं। वह जब प्रधान नहीं बनी थी तभी से सड़क निर्माण के मुद्दे पर पुरजोर आवाज़ उठाती रही हैं। गांव वालों के अनुसार, उनकी जागरूकता और सामाजिक कर्तव्य के कारण ही गांव वालों ने उन्हें प्रधान बनाया। मनीषा के पति मुम्बई में पत्रकारिता कर रहे थे, लेकिन गांव के लिए कुछ कर गुजरने की हसरत ने उन्हें सब कुछ छोड़कर फिरसे गांव बुला लिया। और वह मुंबई से अपने गांव वापस आ गए। अब जब मनीषा और उनके पति को गांव वालों खास कर युवाओं का साथ और समर्थन मिला तो उन्होंने अपने द्वारा किये गए वादों को पूरा कर दिखाया।
इस पूरे मामले में मनीषा बिष्ट कहती हैं कि, “हम लोग कई वर्षों से गांव में सड़क निर्माण के लिए प्रयासरत थे। शासन-प्रशासन से कई पत्राचार किये पर कोई लाभ नहीं हुआ। फिर हमने इस लॉक डाउन में ही युवाओं के साथ मुलाकात की। जहां सभी ने निर्णय लिया कि अब हम किसी सरकारी व्यवस्था का इंतजार नहीं करेंगे बल्कि खुद ही सड़क निर्माण करेंगे।मैं उन सभी गांव वालों की आभारी हूँ जिन्होंने इस नेक कार्य में मिलकर गांव की उन्नति में हमारी हर सम्भव मदद की।”

निश्चित ही टुंडा चौड़ा गांव के लोगों ने आपसी सूझ बूझ और एकता से पूरे देश को एक मिसाल दी हैं । पर दूसरी तरफ यह पूरा मामला, कहीं न कहीं सरकारी तंत्र के उस लचर व्यवस्था को भी उजागर करती है जहां एक कागज पर कार्यवाही होने में वर्षों लग जाते हैं। और कभी कभी तो कई पत्र दफ्तरों में पड़े-पड़े सिर्फ धूल खाती रहती है। उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

फ़िलहाल स्थानीय लोगों के कड़ी मेहनत और हौसले से अब तीनों गांव तक सड़क पहुंच गई। जिससे अब वहां गाड़ियों का आवागमन शुरू होगा और गांव सीधे तौर पर अन्य बाजार, स्वास्थ्य सुविधाओं आदि से जुड़ सकेगा।लेकिन अभी भी एक और कार्य है जो होना है वरना ये सारी मेहनत फीकी पड़ी रहेगी, सड़क से 50 मीटर की दूरी पर लगभग 40 मीटर का पत्थर लगने के कारण गाड़ियां नहीं चल पा रही हैं। अब यह समस्या सरकार कितने दिनों में दूर करेगी यह समय ही बताएगा, पर यदि इसे संज्ञान लिया जाता है तो युवाओं की यह मेहनत सफल हो जाएगी।

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