राज्य सरकार का पलायन आयोग बेशक पहाड़ छोड़ गया हो, लेकिन पूर्व विधायक कृष्ण चंद पुनेठा ने कृषि और पशु पालन के जो अनूठे प्रयोग किए हैं उनसे प्रभावित होकर लोग अब अपने गांव घरों को लौट रहे हैं। गांव में ही 30-40 हजार रुपए प्रतिमाह कमा ले रहे हैं। पुनेठा ने अपने डेरी फार्म में न केवल अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों की ज्यादा दूध देने वाली गायों की नस्ल तैयार की हैं, बल्कि ऑर्गेनिक खेती के सफल प्रयोग भी किए हैं। चंद दिनों में हरा चारा पैदा करने की इजरायली तकनीक से भी उन्होंने पहाड़वासियों को परिचित कराया है। पूर्व विधायक पुनेठा के बेटे मयंक पिता के पदचिन्हों पर हैं। मयंक ने डेवलपमेंट ऑफिसर की नौकरी छोड़कर कृषि और पशुपालन में जो अनूठे प्रयोग किए उनके लिए वर्ष 2013 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ग्लोबल एग्रीकल्चर अवार्ड से नवाजा था

उत्तराखण्ड में इन दिनों पलायन को लेकर सेमिनार हो रहे हैं। हर जगह बहसें छिड़ी हुई हैं। लेकिन व्यवहारिक धरातल पर पलायन रोकने के प्रयासों की स्थिति यह है कि खुद राज्य सरकार का पलायन आयोग पहाड़ में नहीं ठहर पाया। ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी’ कभी पहाड़ के काम नहीं आए, जैसी चिंता हर कोई रजानेता व्यक्त करता है। लेकिन व्यवहारिक रूप से किसी ने काम नहीं किया। सीमांत चंपावत जिले में लोहाघाट क्षेत्र के पूर्व विधायक कृष्ण चंद पुनेठा जैसे कुछ लोग अपवाद के तौर पर अवश्य हैं जो युवाओं को दिशा दे रहे हैं कि पहाड़ में रहकर भी आजीविका कमाई जा सकती है।

प्रशिक्षण देते कृष्ण चंद्र पुनेठा

लोहाघाट से करीब सात किलोमीटर दूर मायावती आश्रम से कुछ पहले ही फोरटी गांव स्थित है। इस गांव में भाजपा के पूर्व विधायक कृष्ण चंद पुनेठा का मानस डेरी फार्म स्थित है। यहां आए दिन लोगों का जमावड़ा लगता है। खासकर प्रदेश के बेरोजगार महिला-पुरुष यहां आकर देखते हैं कि किस तरह एक नेता गाय पालकर और आर्गेनिक खेती करके लोगों को स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर रहा है। पुनेठा से प्रेरित होकर आस-पास के सैकड़ों लोग अब दूध और सब्जी बेचकर जीविकोपार्जन कर रहे हैं। पूर्व विधायक पुनेठा का मानस डेरी फार्म पर्वतीय क्षेत्र में ग्राम स्वराज, पशु पालन, कृषि प्रौद्योगिकी का प्रेरणा केंद्र बनकर उभरा है। आज से सात साल पहले सिर्फ 5 गायों से डेरी का कार्य शुरू करने वाले पूर्व विधायक आज 28 गाय पाल रहे हैं। इन गांवों के दूध से बनने वाले खोया, पनीर, लस्सी, छाछ को पैक करके पहाड़ के बाजारों में बेचा जा रहा है। डेरी फार्म में एक दर्जन लोगों को रोजगार मिल रहा है।

उत्तराखण्ड में पशु नस्ल सुधार की दिशा में सबसे पहला प्रयोग करने का श्रेय मानस डेरी को जाता है। अमेरिका में जिस तरह सेक्सेड सीमेन से उत्तम किस्म की नसल पैदा की जाती है, वैसा ही प्रयोग इस डेरी फार्म ने भी किया। इसका फायदा यह हुआ कि पहले पहाड़ी गाय जहां महज 3 से 5 लीटर दूध देती थी वहीं अब नई नस्ल की गायों से दूध उत्पादन में काफी वृद्धि हुई। अमेरिकन सेक्सेड सीमेन नस्ल की गाय 25 से 30 लीटर दूध देती है। अमेरिकन सेक्सेड सीमेन नस्ल की गाय देश में सबसे पहले पंजाब में आई थी। पंजाब डेरी फेडरेशन से ही कृष्ण चंद पुनेठा 20 डोज लेकर आए थे। गौरतलब है कि अमेरिकन सेक्सेड सीमेन की प्रक्रिया से 90 प्रतिशत बछिया ही पैदा होती हैं।

मानस डेरी फार्म हाउस ने पर्वतीय क्षेत्र में पहली बार पशु नस्ल सुधार के लिए गिर और एचएफ (हॉस्ट्रेलियन फ्रिजन) का भी प्रयोग किया। जिसमें 3 बछिया 15 माह की हैं। यह प्रयोग कभी ब्राजील में शुरू हुआ था। गिर स्वदेशी गाय है। वह मूलतः गुजरात की नस्ल है। लेकिन दुर्भाग्य से वर्तमान में गिर का ओवा और सीमेन ब्राजील से आयात किया जाता है। अमूमन पहाड़ के लोगों में यह मान्यता थी कि गाय की गिर नस्ल पहाड़ में कामयाब नहीं हो सकती। लेकिन मानस डेरी ने पहाड़ों में इस नस्ल को पैदा किया। यही नहीं बल्कि गिर और एचएफ हॉस्ट्रेलियन फ्रिजन का मिश्रण करके एक नई नस्ल ईजाद की गई है। इन दोनों के मिश्रण से फ्रांस की एबोडेंस नस्ल तैयार हुई है। इस नस्ल की गाय प्रतिदिन 25 से 30 लीटर दूध देती है। मानस डेरी में इस नस्ल की फिलहाल 28 गायें हैं। 30 गायों से दूध का कारोबार कर रहे पूर्व विधायक ने अपने आस-पास के लोगों को भी इस नस्ल के सीमने दिए हैं। जिसके चलते कई गांवों के लोग इस नस्ल की गायों से प्रचुर मात्रा में दूध प्राप्त कर रहे हैं।

मानस डेरी की पहल पर भीमताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, लोहाघाट और चंपावत के दर्जनों पशु पालकों ने अब ऐसी ही नस्ल वाली गायों को पालना शुरू कर दिया है। जिससे रोजगार का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। आए दिन मानस डेरी में दूर-दराज के लोग आते हैं और कृष्ण चंद पुनेठा से जानकारी लेकर अपने पैरों पर खड़े हो रहे हैं। क्षेत्र के बहुत से लोग जो दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में रहकर 20-25 हजार की नौकरी कर रहे थे वे अपने घरों, गांवों की तरफ लौट रहे हैं। कृष्ण चंद पुनेठा के अनुसार नई नस्ल की एक गाय से प्रतिमाह करीब 10 हजार की आमदनी हो जाती है। इस तरह जो व्यक्ति दिल्ली-नोएडा में रहकर 20-25 हजार की नौकरी कर रहा था वह दो गाय पाल कर ही इतना पैसा कमा रहा है। ऐसे में उसकी अपने परिवार से दूर रहने की बाध्यता भी खत्म हो जाती है। भीमताल के वीसी उप्रेती सहित आज कई लोगों की लंबी सूची है जो अपने घरों को लौट आए हैं और पशु पालन कर रोजगार का साधन बना रहे हैं।

प्लास्टिक ट्रे में हरा चारा उगाने की तकनीक

पशुपालन के साथ ही भाजपा के पूर्व विधायक कृष्ण चंद पुनेठा ने आर्गेनिक खेती में भी कई प्रयोग किए हैं। जिनमें सिर्फ एक सप्ताह में ही इजरायल की हाईड्रोपोनिक तकनीक से हरे चारे की पैदावार की जाती है। इसमें जमीन की खेती की बजाय प्लास्टिक की ट्रे में ही हरा चारा पैदा किया जाता है। इजरायल पद्धति के अनुसार हाईड्रोपोनिक चारा बनाने के तहत मक्के के बीज से सिर्फ एक सप्ताह में ही 10 से 12 इंच का हरा चारा तैयार हो जाता है। इसके तहत दो दिन तक मक्के के दानों को भिगो के रखा जाता है। इसके अगले दो दिन उन्हें 24 घंटे बोरी में बंद करके छोड़ दिया जाता है। इस दौरान वह अंकुरित हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें प्लास्टिक की ट्रे में 2 से 3 सेंटीमीटर में बिछा दिया जाता है। इस पद्धति में पानी की भी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती। सिर्फ दिन में 4 बार स्प्रे करना पड़ता है। एक ट्रे में पूरे दिन में महज आधा लीटर पानी ही लगता है। इस तरह केवल एक सप्ताह में ही 10 से 12 इंच तक मक्का का हरा चारा पैदा हो जाता है। बिना जमीन के भी हरा चारा पैदा करने की यह तकनीक पहाड़ों में बहुत फायदे का सौदा है।

पूर्व विधायक कृष्ण चंद पुनेठा के पुत्र मयंक पुनेठा पहले एलआईसी में डेवलपमेंट ऑफिसर थे। दिल्ली में ड्यूटी करने के दौरान वह घर से दूर रहते थे। लेकिन अब वह अपने गांव में पिताजी का हाथ बंटाते हैं। मयंक पुनेठा अब कृषि क्षेत्र और दुग्ध में दिनों दिन नए प्रयोग कर रहे हैं। इसके चलते 6 सितंबर 2013 को गुजरात सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने मयंक पुनेठा को कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए ग्लोबल एग्रीकल्चर एवार्ड से नवाजा था। मयंक ने जैविक कृषि में नया प्रयोग किया है। उन्होंने पॉलीहाउस में इजरायल का खीरा पैदा किया है। इजरायली खीरे का यह बीज सात रुपए का एक पड़ता है। इसकी बेल नहीं होती, बल्कि यह एक पौधा होता है। इसी तरह इजरायली टमाटर भी यहां पैदा किया गया। जिसकी खूब पैदावार हो रही है। इसी के साथ जमीन की बजाय प्लास्टिक के कट्टे में आलू बोने की नई विधि अपनाई गई है। इसमें आलू की बम्पर पैदावार होती है।

बोरी में आलू की खेती

पूर्व विधायक कृष्ण चंद पुनेठा के अनुसार जब वह विधायक थे तो चंपावत टी स्टेट से गुजर रहे थे। उन्होंने टी स्टेट के पास फूलों की खेती होती देखी। इस बाबत जब उन्होंने आस-पास के लोगों से पूछा कि यहां तो पहले बंजर जमीन होती थी, लेकिन इसे हरी-भरी किसने किया। तब लोगों ने बताया कि प्लेंस (मैदान) के एक सरदार जी हैं जिन्होंने किराए पर खेत लेकर खेतीबाड़ी की है। पुनेठा का कहना था कि जब बाहर से आया हुआ व्यक्ति खेतीबाड़ी कर सकता है तो स्थानीय वाशिंदे क्यों नहीं कर सकते। उनका दावा है कि जिस व्यक्ति के पास पांच नाली जमीन, 5 विदेशी नस्ल की गायें और एक पॉलीहाउस हो वह व्यक्ति अपने परिवार का जीवाकोपार्जन बेहतर तरीके से कर सकता है। उसे पालायन करने की बजाय अपने ही गांव, घर और खेत में यह कार्य शुरू कर देना चाहिए। जिससे उन्हें नौकरी करने बाहर जाना नहीं पड़ेगा, बल्कि घर बैठे ही 30 से 45 हजार रुपए प्रतिमाह कमा सकते हैं। आज बहुत से लोग ऐसे हैं जो महानगरों से वापस अपने घरों की ओर लौट रहे हैं और पशु पालन एवं खेती किसानी कर खुशहाल जीवन जी रहे हैं।

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