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मातृ शक्ति की प्रतीक माधुरी

डॉ. माधुरी बड़थ्वाल वर्षों से लोक-संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में जुटी हैं। आकाशवाणी नजीवाबाद की पहली महिला कम्पोजर माधुरी को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर उत्तराखण्ड समाज में खुशी की लहर हैं

उत्तराखण्ड में संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में मातृ शक्ति का विशेष योगदान रहा है। जागर गायिका बसंती बिष्ट पद्मश्री से सम्मानित हैं। अब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने लोक गीतों के संरक्षण और संबंधित के लिए डॉ माधुरी बड़थ्वाल को ‘नारी शक्ति पुरस्कार-2018’ से नवाजा है।


ऋतु मा ऋतु कु ऋतु बड़ी
ऋतु मा ऋतु बसंत ऋतु बड़ी
जौ जस देवा खोली का गणेशा
ग्वीरालू फूल फूली गे मेरा भेना
रे मासी कू फूल, फूल कविलास
के देवा चढालू, फूल कविलास

जैसे लोकगीत तो महज कुछ एक उदाहरण हैं। डॉ माधुरी बड़थ्वाल के पास सैकड़ों ऐसे लोकगीतों का खजाना है जो आज लोक से विलुप्त हो चुके हैं। इन लोकगीतों को यदि डॉ माधुरी बड़थ्वाल की लोक को चरितार्थ करती हुई जादुई आवाज में सुना जाए तो भला कौन लोकसंगीत का मुरीद न होये–? माधुरी ने परंपराओं को अपनी सोच के साथ सहेजने का प्रयास किया है।

माधुरी बड़थ्वाल को महज ढाई साल की उम्र से लोकसंगीत के प्रति ऐसा लगाव हुआ कि वे विगत 5 दशकों से लोकगीतों के संरक्षण और संवर्धन मे बड़ी शिद्दत से जुटी हुई हैं। पिछले 50 वर्षों में उत्तराखण्ड के गांव-गांव घूमकर लोक के असली कलाकारों को पहचाना, सैकड़ों लोगों को लोकसंगीत का प्रशिक्षण दिया। साथ ही पारंपरिक वाद्य यंत्रों में पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दी और महिलाओं की मांगल एवं ढोल वादन टीम देते हुए नई लकीर खींची।


आकाशवाणी नजीवाबाद की पहली महिला म्यूजिक कम्पोजर माधुरी ने पारंपरिक वर्जनाओं को तोड़, बाधाओं को पार कर लोकगीतों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। 19 मार्च 1953 को जन्मी डॉ माधुरी बड़थ्वाल ने महज ढाई बरस की उम्र में अपनी ताई पार्वती देवी से घर के चूल्हे पर लोकसंगीत के बारे में जाना और गुनगुनाया। भुवना देवी और चंद्रमा बौ सहित गांव की अन्य महिलाओं से भी लोकगीतों का ककहरा सीखा। लोकसंगीत के प्रति इतना जुनून था कि अक्सर छुट्टी के दिन गांव के जंगलों में गाती थी। उस जमाने में लड़कियों के गाने को अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन जिद्द और धुन की पक्की माधुरी ने अपनी मंजिल का सफर खुद ही तय किया। गाने की वजह से माधुरी के माता-पिता को बहुत कुछ सुनना पड़ा था। गांव के पास दूसरे गांव के ढोल सागर वादक शुभदास और गब्बूदास से उन्होंने लोकसंगीत की बारिकीयां सीखी। माधुरी जब भी इनसे मिलती तो जय भैरवी-जय भैरवी गीत गुनगुनाती और गाती थी। माधुरी की पढ़ाई लिखाई लैंसडाउन में हुई। पिताजी श्री चंद्रमणि उनियाल जो प्रख्यात गायक एवं सितारवादक थे, ने अपनी बेटी माधुरी को प्रयाग संगीत समिति में विधिवत संगीत की शिक्षा दिलाई। माधुरी ने 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद अपनी मेहनत से संगीत प्रभाकर की डिग्री हासिल कर ली थी जिसके बाद वो अपने ही विद्यालय राजकीय इंटर कॉलेज लैंसडाउन में संगीत अध्यापिका के रूप में कार्य करने लगी थी। माधुरी ने शास्त्रीय संगीत की विधिवत तालीम ली, लेकिन मन पहाड़ के लोकगीतों में लगा रहता था। माधुरी को आकाशवाणी नजीबाबाद में प्रथम महिला म्यूजिक कम्पोजर के रूप में अखिल भारतीय स्तर पर पहचान मिली। इस दौरान उन्होंने सैकड़ों संगीत, नाटकों और रूपकों का कुशल निर्देशन, लेखन और निर्माण किया। गढ़वाली भाषा, मुहावरे, लोकोक्तियां, लोकगीतां, लोकगाथाआें एवं कथाओं का गूढ़ ज्ञान भी प्राप्त किया। हिंदी में स्नातकोत्तर करने के साथ ही संगीत और साहित्य का अनूठा रिश्ता बनता चला गया।

आकाशवाणी में 32 साल कार्य करने के उपरांत माधुरी ने अपनी लोक संस्कृति और लोकगीतों को आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाने और इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए महिलाओं की मांगल टीम बनाकर उन्हें ढोल वादन में परांगत किया। महिलाओं को ढोल वादन रूढ़िवादी परम्परा के पैरोकारां को चुनौती देना था। लेकिन माधुरी ने हार नहीं मानी और आज उनकी महिलाओं का ढोल बैंड लोगों के लिए एक नजीर है।

माधुरी कहती हैं कि लोकगीतों के मूल को ढूंढ़ना होगा एवं पहचानना होगा। लोक संस्कृति को बचाने का ऋण हर व्यक्ति पर है। हमारी पहचान, हमारी लोक संस्कृति इन्हीं लोकगीतों में समाहित है। जीवन के सभी संस्कार, लोकजीवन, तीज त्योहार, ऋतु और परंपराएं इन्हीं में रची-बसी है। आज सैकड़ों लोकगीत विलुप्त हो चुके हैं। इसलिए इनके संरक्षण और संवर्धन को लेकर जमीनी प्रयास किए जाने चाहिए। उत्तराखण्ड में जन्म लेना सौभाग्य है। जीवनपर्यंत बदरी-केदार का आशीर्वाद मिला तभी जाकर में कुछ कर पाई। मेरे लिए लोकगीत महत्वपूर्ण हैं जिनमें मेरी सांसें रची-बसी हैं।

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