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जिंदगी जरूरी है…

शहर से लेकर गांव तक नशा जिस तरह युवाओं को बर्बाद कर रहा है, उसे देखते हुए डॉक्टर पीताम्बर अवस्थी ने एक अच्छी पहल शुरू की है। वे स्कूल- कॉलेजों में जाकर युवाओं को समझा रहे हैं कि उनके लिए जिंदगी जरूरी है

 

जनपद पिथौरागढ़ नशे के कारोबारियों के लिए ऐशगाह साबित हो रहा है। आए दिन कई नौजवान नशे की भेंट चढ़ रहे हैं। नशे के कारोबारी युवाओं को आसानी से शराब, स्मैक, चरस जैसे मादक पदार्थों में डुबा अपना हित साधने में लगे हैं। मादक पदार्थों की चपेट में न सिर्फ युवक आ रहे हैं, बल्कि बड़ी तेजी से युवतियां भी इनकी आदी बनती जा रही हैं। अभी हाल में अकेले जिला मुख्यालय में कई नौजवान मादक पदार्थों की लत के कारण अपनी जान गंवा बैठे। मादक पदार्थों के बढ़ते कारोबार को देखते हुए जनपद पुलिस ने भी इसके खिलाफ अभियान चलाया है। जिसमें बड़ी मात्रा में मादक पदार्थों की तस्करी पकड़ने में वह सफल भी रही है, लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी नशे का कारोबार तेजी से फैल रहा है। जनपद में जिस तरह से युवा वर्ग इसकी चपेट में आ रहा है उससे अभिभावक काफी चिंतित एवं डरे- सहमे हैं।


नशामुक्त समाज की परिकल्पना के साथ पिछले दो दशक से नशे के विरुद्ध अभियान चला रहे डा ़ पीताम्बर अवस्थी ने पिछले दिनों एसडीएस राजकीय इंटर कॉलेज पिथौरागढ, ग्राम सभा नाकोट, भुरमुनी, नैकिया, झूलाघाट, पत्थरखानी, बढ़ावे, सिंगाली, डीडीहाट, थल, बगड़ीघाट, मुवानी, क्वीटी, राथीसैंण, होकरा, मुनस्यारी, जौलजीवी, धारचूला आदि जगहों पर नशामुक्त अभियान चलाया। वह कहते हैं कि जनजागरूकता ही इसका एकमात्र विकल्प है। अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों पर ध्यान न देने के कारण भी यह समस्या विकराल हो रही है। यूं तो डा ़ अवस्थी जनपद के सरकारी, प्राइवेट विद्यालयों के साथ ही गांव, कस्बे, नगरों में नशे के खिलाफ लगातार जनसंपर्क अभियान करते रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से युवा नशे के सॉफ्ट टारगेट बन रहे हैं उसे देखते हुए उन्होंने अपने जनसंपर्क अभियान को और तेज कर दिया है। इसके लिए उन्होंने स्कूली छात्र-छात्राओं को अपना माध्यम बनाया है ताकि वह नशे के कुप्रभावों के बारे में जान सकें और आने वाले भविष्य में इस बुराई से बच सकें। यही नहीं नशा किस तरह समाज के लिए घातक है व इससे कैसे बचा जा सकता है, बगैर नशे के किस तरह एक बेहतर जिंदगी जी जा सकती है, इसके लिए उन्होंने ‘जिंदगी जरूरी है’ पुस्तक भी प्रकाशित की हुई है। इसे भी वह निःशुल्क लोगों को वितरित कर रहे हैं। वह कहते हैं कि नशा व कुरीतियां उस दीमक की तरह हैं जो पूरी तरह व्यक्ति को खत्म कर देती हैं। जब तक इसके खिलाफ व्यापक जनजागरूकता अभियान नहीं चलाया जाएगा व शासकीय स्तर पर संवेदनशीलता पैदा नहीं होगी तब तक इन कुरीतियों से समाज को मुक्ति नहीं मिल सकती।

लेकिन दुखद स्थिति यह है कि बच्चे जो देश का भविष्य हैं वह तेजी से नशे की चपेट में आ रहे हैं। नशापान बच्चों में तेजी से हावी हो रहा है। नशे की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है जबकि बच्चे ही राष्ट्र की धरोहर होते हैं। आज तमाम किशोर श्वास, दमा, कैंसर जैसी बीमारियों की चपेट में ही नहीं आ रहे हैं, बल्कि तेजी से अवसाद से भी घिर रहे हैं। कई मोटर दुर्घटनाओं का शिकार बन रहे हैं तो कई आत्महत्या की तरफ बढ़ रहे हैं। नशे के बढ़ते इन कुप्रभावों पर जब ‘दि संडे पोस्ट’ के इस संवाददाता ने पड़ताल कर जानना चाहा कि नशा किस तरह से युवा वर्ग को अपनी चपेट में ले रहा है तो पाया कि कई युवा काम में मन न लगने, उदास व गुमसुम सा रहने, अचानक क्रोधित हो जाना, पारिवारिक जनों से संबधों में तकरार होना, दमा, श्वांस जैसी बीमारियों की चपेट में आ जाना, जल्दी थकान महसूस करना, चिड़चिड़ापन, आर्थिक रूप से अशक्त महसूस करना, आत्महत्या का विचार मन में आना, पारिवारिक कलह का शिकार बनना, घर में मारपीट व व्यवहार में अभद्रता उनके हर रोज की जीवन शैली में शामिल हो गया है। कई होनहार युवा नशे के चलते अपना शानदार कैरियर दांव पर लगा दे रहे हैं। इन सबके बीच यह बात निकल कर सामने आई है कि अगर नशे से बचना है तो इसके लिए व्यापक अभियानों की जरूरत है। डा. अवस्थी के प्रयास अवश्य ही एक आशा की किरण के रूप में दिखते हैं।

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