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अपने हिस्से से दूसरों के भूख मिटाते बच्चे

चिड़िया चोंच भर ले गई, नदी को घटर्यों न नीर- दान दिए धन ना घटे, कह गए संत कबीर। कबीर द्वारा लिखे गए इस दोहे को आज के दौर में स्कूल के बच्चे सार्थक करते नजर आए। देवों की भूमि कहे जाने वाले प्रयागराज में जहां प्राचीन काल में जब माघ मेले में सम्राट हर्षवर्धन अपने वस्त्र तक दान दे देते थे। वहीं यहां ज्यादा नहीं तो थोड़े ही सही दान की परंपरा अब एक स्कूल के बच्चे निभाते नजर आ रहे हैं। ये स्कूली बच्चे अपने हिस्से के निवाले से दूसरों की भूख मिटाकर एक मिसाल पेश कर रहे हैं। स्कूल की प्रिंसिपल रविंदर विरदी बताती हैं कि इस योजना का एक फायदा यह हुआ कि बच्चों के स्वभाव में भी बदलाव देखा जा रहा है। इस योजना के कारण अब बच्चों में मदद करने की भावना भी जागृत हुई है।

करीब दो हजार बच्चों के टिफिन से निकलने वाली रोटियां स्कूल के पास बने अस्पताल के तीमारदारों का पेट भर रही हैं। स्कूल के प्रिंसिपल की पहल पर शुरू हुए इस अभियान को अभिभावकों का भी भरपूर सहयोग मिल रहा है। यही कारण है कि सिर्फ 45 दिनों में ही यह अभियान दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया।

जरूरतमंदों की मदद का यह सिलसिला 16 अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस के मौके पर श्रीमहाप्रभु पब्लिक स्कूल में शुरू हुआ। जब स्कूल की प्रिंसिपल ने बच्चों से उनकी और परिवार की इच्छा से जरूरतमंदों की मदद के लिए प्रस्ताव रखा तो बच्चे ही नहीं उनके अभिभावक भी तैयार हो गए। फिर क्या था सभी क्लास रूम्स में एक एक छोटी बास्केट रखी गई। जिसमें बच्चे अपने घर से लाई एक्स्ट्रा खाद्य सामग्री रखते और फिर क्लास मॉनिटर द्वारा उसे एक बड़ी बास्केट तक पहुंचा दिया जाता और फिर अंत में वह स्कूल के फूडबैंक तक पहुंचता। योजना के को-ऑर्डिनेटर ज्ञान प्रकाश बताते हैं कि जबसे चिल्ड्रंस हॉस्पिटल में इसे शुरू किया गया वहां पहले से अधिक साफ-सफाई दिखने लगी है। अगर एक स्कूल की वजह से किसी हॉस्पिटल में बदलाव आ सकता है तो शहर के अन्य स्कूलों की मदद से दूसरे हॉस्पिटल्स में भी जरूरतमंदों की मदद की जा सकती है।

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