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बुग्यालों को बचाने की मुहिम

बुग्यालों में अनियंत्रित मानवीय आवाजाही इनके लिए खतरा बन रही है। यही वजह है कि स्थानीय लोग बुग्यालों को बचाने के लिए नीति बनाने की मांग कर रहे हैं

बुग्यालों में अनियंत्रित मानवीय आवाजाही से स्थानीय लोग चिंतित हैं। इन्हें बचाए रखने के लिए जहां एक ओर लोग न्यायालय में गए हैं, वहीं दूसरी तरफ संगठित होकर संघर्ष भी चला रहे हैं। इसी क्रम में लौहजंग में 25 अगस्त को आली-वेदनी-बागजी बुग्याल संघर्ष समिति की बैठक हुई। बैठक में सदस्यों ने हाईकोर्ट के निर्णय का स्वागत किया और बुग्यालों में रात्रि विश्राम के लिए टेंटों पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाने की वकालत की। संघर्ष समिति के उपाध्यक्ष हीरा सिंह बुग्याली ने कहा कि आली-वेदनी-बागजी बुग्याल संघर्ष समिति द्वारा दायर की गई याचिका पर माननीय हाइकोर्ट के दिए गए फैसले का हम स्वागत करते हैं। आखिरकार हमारी जीत हुई है। बुग्यालों में आवाजाही नियंत्रित होनी चाहिए। साथ ही बुग्यालां में रात्रि विश्राम पर भी रोक लगनी चाहिए। रात्रि विश्राम टिम्बर रेखा से नीचे होना चाहिए। जिससे बुग्यालों में मौजूद बहुमूल्य वनस्पतियों को कोई नुकसान न पहुंचे और बुग्याल बचे रह सकें।

समिति के संरक्षक तारा दत्त कुनियाल का कहना है कि रूपकुंड, वेदनी, आली बुग्याल के लिए ट्रैकिंग का संचालन आलीवेदनी-बागजी बुग्याल संघर्ष समिति के जरिए किया जाय। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा। साथ ही बाहरी ट्रेकिंग ऐंजेसी पर अंकुश लग सकेगा। ट्रेकिंग एक निश्चित संख्या में हो जिससे बुग्यालों पर दबाव न पड़े।

बुग्यालों में रात्रि विश्राम पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते लोग

सामाजिक कार्यकर्ता हीरा सिंह गढ़वाली ने कहा की लंबे संघर्षों के बाद आखिरकार आली -बागजी-बेदनी बुग्याल संघर्ष समिति की मेहनत रंग लाई है। जिसमें सबसे बड़ा योगदान स्व. कैप्टन दयाल सिंह पटवाल का है। उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। सीमांत जनपद चमोली के देवाल ब्लॉक के बांक गांव निवासी कैप्टन दयाल सिंह पटवाल ने सेना से रिटायर होने के पश्चात अपना शेष जीवन लौहजंग में बिताया। उन्होंने लौहजंग और पूरे क्षेत्र के विकास के लिए कई कार्य किये। वे आली और वेदनी बुग्याल को पर्यटन हब बनाने के हियामती थे। हिमालय की पीड़ा उन्हें सदैव कचोटती रहती थी। वे हिमालय में सीमित आवाजाही के पक्षधर रहे। उनकी दीर्घकालीन सोच थी की यदि हम अपने बुग्यालों को सुरक्षित रखेंगे तो ये लंबे समय तक हमें फायदा देंगे। हिमालय के उच्च बुग्यालो में अनियंत्रित और अनियोजित रूप से मानवीय हस्तक्षेप बढ़ने से वे बेहद चिंतित थे। क्यांकि बुग्याल इस दबाब को झेलने में असमर्थ हैं। इससे बुग्यालां पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। बेदिनी बुग्याल को बचाने के लिए उन्होंने हाईकोर्ट में बहुत लंबी लड़ाई लड़ी। जगह-जगह से जरूरी कागजात जुटाए और अब जब हाइकोर्ट ने अपना फैसला उनके पक्ष में सुनाया तो कैप्टन दयाल सिंह पटवाल हमारे बीच नहीं हैं। जून माह में उनका देहांत हो चुका है। बैठक में संघर्ष समिति ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

हीरा सिंह बुग्याली

आली-वेदनी-बागजी बुग्याल संघर्ष समिति की बैठक में सदस्यों और ग्रामीणों ने कहा कि राज्य बनने के 18 साल बाद भी प्रदेश में बुग्यालों को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है। जिस कारण बुग्यालों में मानवीय हस्तक्षेप बढ़ा है। बुग्यालों का अत्यधिक दोहन भी हुआ है। यदि समय रहते चेते नहीं तो आने वाले दिनों में कहीं हम इन बुग्यालों को खो न दें। समिति की जनहित याचिका पर माननीय हाइकोर्ट द्वारा दिए गये आदेशों के बाद उम्मीद की जानी चाहिए की आने वाले दिनों में बुग्यालां में आवाजाही नियंत्रित हो सकेगी। हिमालय और बुग्यालों को लेकर ठोस नीति बने। संघर्ष समिति की बैठक में भुवन सिंह बिष्ट, रघुवीर सिंह, हीरा पहाड़ी, खडग सिंह, रणजीत सिंह, गंगा सिंह पटवाल, लक्ष्मण सिंह, खिलाप सिंह, राजू शाह, इंद्र सिंह राणा सहित कई लोग उपस्थित थे।

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