[gtranslate]
राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी ने अपने पैतृक गांव की मतदाता सूची में नाम जोड़कर जो पहल शुरू की है, उसे जोरदार समर्थन मिल रहा है। सोशल मीडिया पर उनका ‘अपना वोट-अपना गांव’ अभियान खूब वायरल हो रहा है
‘‘मित्रों, मैंने अपने मूल गांव की मतदाता सूची में अपना नाम जोड़ने का निर्णय किया है। अभी तक मेरा नाम मालवीय उद्यान, कोटद्वार की सूची में था, जिसे मैंने स्थानांतरित कर ग्राम-नकोट, पट्टी- कंडवालस्युं, विकासखंड कोट, जिला पौड़ी में स्थानांतरित कर दिया है। यह मेरी निजी स्तर पर प्रतीकात्मक शुरुआत है ताकि हम अपने छूट चुके गांव से जुड़ने का शुभारंभ करें और जनअभियान बनाएं। पलायन के समाधान के लिए केवल सरकारों पर आश्रित नहीं रहा जा सकता। पहल अपने-अपने स्तर पर हमें भी करनी होगी। ऐसा कर प्रवासियों का अपने मूल गांव से पुनः भावनात्मक रिश्ता बनेगा, गांव की समस्याओं से अवगत होंगे और मिलजुलकर उनका समाधान करेंगे। तभी हमारी समृद्ध भाषा, संस्कøति, खानपान, रीति- रिवाज और महान परंपरा जीवित रह सकेंगी।“
सोशल मीडिया में भाजपा के एक राज्यसभा सांसद की यह अपील बडी तेजी से वायरल हो रही है। खासकर उत्तराखण्ड के सोशल मीडिया से जुड़े लोगों ने सांसद की इस अनोखी अपील को फेसबुक और व्हाट्स अप की डीपी पर लगाकर इस अभियान का जोरदार समर्थन किया है। इस अभियान का नाम दिया गया है ‘अपना वोट अपने गांव’। इस  अभियान की शुरुआत करने वाले शख्स हैं उत्तराखण्ड के राज्यसभा सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी। इनके इस अभियान से उत्तराखण्ड में हो रहे पलायन को रोकने की दिशा में एक नई पहल कहा जा रहा है। इस अभियान से लोगां में जैसे एक नई चेतना जगी है। इसके तहत लोग अपने वोटों को शहरी वोटर लिस्ट से हटाकर अपने गांव की सूची में अंकित कराने लगे हैं। फिलहाल इससे उत्तराखण्ड के पहाडी गांवों में कम होती वोटरों की संख्या में इजाफा होता हुआ दिखाई देने लगा है।
इसी के साथ बलूनी ने गत 19 जून को नीति आयोग के उपाध्यक्ष  राजीव कुमार  से उत्तराखण्ड के पलायन के विषय पर भेंट की। उनसे हुई भेंट का असर यह हुआ कि नीति आयोग ने उत्तराखण्ड में तीन बिंदुओं पर सरकार को सहयोग करने का वादा किया है। जिनमें से एक यह है कि दस पर्वतीय जनपदों के एक-एक निर्जन गांव (घोस्ट विलेज) को विकसित करने में सहयोग किया जाएगा, जबकि दूसरा पलायन पर एक उच्चस्तरीय अध्ययन रिपोर्ट तैयार की जाएगी। इसी के साथ तीसरा यह कि अनिल बलूनी द्वारा गोद लिए गए बौरगांव का भी आयोग द्वारा दौरा किया जाएगा।
पलायन पर अपने अभियान को लेकर अनिल बलूनी यहीं तक नहीं ठहरे, बल्कि इससे एक दिन पूर्व 18 जून को वह इस मुद्दे पर केंद्रीय वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण से भी मुलाकात कर आगामी बजट सत्र में  उत्तराखण्ड के पर्वतीय  जिलों से पलायन रोकने के लिए विशेष कोष बनाने की मांग भी कर चुके हैं। सीतारमण ने उन्हें हर संभव सहायता करने का वादा किया है। एक तरफ अनिल बलूनी पलायन से बुरी तरह कराह रहे उत्तराखण्ड को दिनों दिन गहरी होती इस समस्या से निजात दिलाने के लिए प्रयासरत हैं तो वहीं दूसरी तरफ प्रदेश में 2017 में गठित हुए पलायन आयोग की आश्चर्यचकित कर देने वाली रिपोर्ट भी आ गई है।
जिसके अनुसार वर्ष 2018 में पलायन आयोग की पहली रिपोर्ट के आंकड़े चौंकाने वाले हैं, जो पलायन पर सरकारों की नीतियों को कटघरे में खड़ा करती है। पलायन आयोग की पहली रिपोर्ट में बताया गया कि 2011 में उत्तराखण्ड में 1034 गांव खाली थे, जो वर्ष 2018 तक 1734 हो चुके थे। राज्य में 405 गांव ऐसे थे, जिनमें 10 से भी कम लोग रहते हैं। राज्य के लगभग साढ़े तीन लाख से ज्यादा घरों में कोई नहीं रहता। अकेले पौड़ी में 300 से ज्यादा गांव खाली हो गए हैं।
लोगों की मानें तो पहाड़ में पलायन का मुख्य कारण है रोजगार। रोजगार के नाम पर उत्तराखण्ड के पहाड़ों पर कुछ भी नहीं है, जिसके कारण युवा बड़े शहर की ओर रुख कर रहे हैं और पहाड़ के गांव भूतिया हो रहे हैं। उत्तराखण्ड के जिन गावों में कोई नहीं रहता उनको भूतिया गांव कहा जाता है। इस बार पलायन आयोग ने सरकार के समक्ष पलायन को रोकने के लिए कुछ सुझाव और सिफारिशें भी रखी हैं।
उत्तराखण्ड पलायन आयोग ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के सामने रिपोर्ट पेश की। उसके मुताबिक अकेले अल्मोड़ा जिले में 70 हजार लोगों ने पलायन किया है। सल्ट- भिकियासैंण-चौखुटिया और स्याल्दे ब्लॉक में सबसे ज्यादा पलायन हुआ। वहीं सूबे की 646 पंचायतों में 16,207 लोग स्थाई रूप से अपना गांव छोड़ चुके हैं। पलायन आयोग की रिपोर्ट में 73 फीसदी परिवारों की मासिक आय 5000 से कम बताई गई है, वहीं पलायन आयोग के मुताबिक मूलभूत सुविधाओं के अभाव में पलायन हो रहा है, पर किसी भी राज्य की ताकत जिसे माना जाता है वो हैं युवा और उत्तराखण्ड में पलायन करने वालों में 42.2 फीसदी युवा हैं। जिनकी उम्र 26 से 35 साल है। पलायन आयोग की मानें तो इस बार भी पौड़ी और अल्मोड़ा जिले में पलायन सबसे अधिक हुआ है।
गौरतलब है कि पौड़ी जिले को बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि बड़े-बड़े अधिकारी से लेकर खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत यहां से आते हैं। ऐसे में उनके जिले से ज्यादा पलायन होना सरकार की नीतियों की खामियां भी उजागर करता है। पलायन आयोग ने दूसरी रिपोर्ट भी सरकार को सौंप दी है, जिसमें उन्होंने सरकार को इस समस्या से उबरने के लिए कई सुझाव दिए हैं।
राज्य पलायन आयोग के उपाध्यक्ष एसएस नेगी द्वारा उत्तराखण्ड सरकार को 7950 गांवों के सर्वेक्षण के आधार पर भेजी गई रिपोर्ट में यह बताया गया कि उत्तराखण्ड के सभी जिलों से पलायन हो रहा है लेकिन पहाड़ी क्षेत्र में आने वाले जिलों में पलायन का प्रतिशत अधिक और चिंताजनक है। इन जिलों में पलायन का प्रतिशत 60 प्रतिशत तक पहुंच गया है। पलायन के कारणों में आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 50 फीसदी लोगों ने आजीविका के चलते जबकि 73 फीसदी लोगों ने बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य के चलते उत्तराखण्ड के ही शहरी क्षेत्र या अन्य राज्यों में मजबूरी में पलायन किया है।
पलायन को लेकर पिछले 18 सालों से उत्तराखण्ड सरकार में नई-नई नीतियां बनती रही हैं। लेकिन ज्यादातर नीतियां कार्ययान्वित नहीं हो पाई, क्योंकि यह नीतियां जमीन से जुड़े हुए व्यक्ति की समस्याओं को दूर नहीं कर पाती हैं। इस बार हम ऐसी नीति लेकर आए हैं जो लोगों को मैदान से पहाड़ की ओर ले जाएंगे। ‘अपना वोट-अपने गांव’ के तहत शहर से गांव की ओर मतदाता जाएगा तो गांव में चहल-पहल होगी। पिछले 18 सालों में उत्तराखण्ड का पलायन इस कदर हुआ है कि पहाड़ की नौ विधानसभा सीटें मैदान में आ गई हैं और कम से कम 10 विधानसभा सीटें जितने व्यक्ति देश के बड़े महानगरों में शिफ्ट हो गए हैं। मैं इस अभियान को आगे बढ़ाने के लिए उत्तराखण्ड के सेलिब्रिटियों के पास जाऊंगा। रोज एक सेलिब्रिटी से मिलूंगा। इसी के साथ -साथ नोएडा, गाजियाबाद, दिल्ली, गुड़गांव, लखनऊ और मुंबई जैसे महानगरों में भी उत्तराखण्ड के उन लोगों से अपील करूंगा जिन्होंने अपने गृह क्षेत्र की बजाय वोट शहरों में जहां वह रह रहे हैं वहां बनवाए हैं। सभी लोग अपने-अपने गांवों से जुडें़गे तो किसी हद तक हम पलायन को रोक सकने में सक्षम होंगे।
अनिल बलूनी, राज्यसभा सांसद और मीडिया प्रमुख भाजपा

You may also like

MERA DDDD DDD DD