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शैक्षिक, आर्थिक तस्वीर बदलने का सपना

पहाड़ों पर चीड़ के पेड़ बहुतायत में पाए जाते हैं। इन पेड़ों के पिरूल को जंगलों के लिए सबसे खतरनाक कहा जाता है। इन्हें जंगलों में आग लगने का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। लेकिन अब इसी पिरूल से गांवों में महिलाओं की जिदंगी संवारने का बीड़ा उठाया जा चुका है। रुद्रप्रयाग जिले के मणिगुह गांव में आयोजित किया गया ‘पिरूल हस्तशिल्प’ मणिगुह गांव की महिलाओं के लिए एक नया अवसर है जिसमें इस गांव के विकास का स्वप्न निहित है। शिक्षा के साथ-साथ स्वरोजगार के माध्यम से गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का यह अभिनव प्रयास है। जिससे उत्तराखण्ड के इस पहले पुस्तकालय गांव की शैक्षिक और आर्थिक तस्वीर बदलने का सपना साकार होगा

 

उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में विकास की राह देख रहे हैं। मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा प्रति व्यक्ति आय यहां लगभग आधी है। इन पर्वतीय क्षेत्रों में कई अन्य चुनौतियां भी हैं जिनकी वजह से यहां पलायन की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। सालाना जंगलों में लगने वाली आग भी इसका एक प्रमुख कारण है। इस आग की एक मुख्य वजह चीड़ के पत्ते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में पिरूल कहा जाता है। इन पत्तों में आग बहुत जल्दी पकड़ती है और देखते ही देखते पूरे क्षेत्र में फैल जाती है।

‘हमारा गांव घर फाउंडेशन’ उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित मणिगुह ग्राम को पुस्तकालय गांव थीम पर विकसित कर रहा है और यह बीड़ा उठाया है यहीं की बेटी बीना नेगी मिश्र ने। जिन्होंने अपने पति और कुछ साथियों के साथ मिलकर इस गांव को उत्तराखण्ड का पहला पुस्तकालय गांव बनाया है। इस गांव में जहां दस हजार के करीब किताबें उपलब्ध हैं वहीं कई पुस्तक मंदिरों के द्वारा पुस्तकालय को घर-घर पहुंचाने का प्रबंध किया गया है। इस पुस्तकालय गांव का उद्घाटन इसी वर्ष 26 जनवरी को हुआ और बहुत ही कम समय में इस गांव ने उत्तराखण्ड में अपनी एक खास पहचान बना ली है। अभी कुछ महीने पहले ही फाउंडेशन ने ‘पुस्तक मैराथन’ का आयोजन किया था। जिसमें आस-पास के कई स्कूलों ने प्रतिभाग किया था।
यह फाउंडेशन इस क्षेत्र में स्वरोजगार और पर्यटन को विकसित करने हेतु भी समर्पित है। इसी दिशा में ‘हमारा गांव-घर फाउंडेशन’ की ओर से 24 जून से 27 जून तक चार दिवसीय पिरूल हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसमें गांव की महिलाओं को पिरूल हस्तशिल्प की बारीकियां विस्तार से समझाई गई। इस कार्यशाला में मणिगुह, खाल्युं, खामोली, बंडी और स्यालडोभा क्षेत्र की महिलाओं ने भाग लिया।

इस कार्यशाला में ताड़ीखेत की प्रसिद्ध पिरूल हस्तशिल्पकार मंजू आर साह ने ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण दिया। मंजू पिरूल हस्तशिल्प कला का एक जाना-माना नाम है जिन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। इस कार्यशाला में मंजू ने ग्रामीण महिलाओं के साथ मिलकर उन्हें इस कला की बारीकियों से अवगत करवाया और उन्हें इसके भविष्य के विषय में बताया। मंजू के अनुसार इन उत्पादों की जितनी मांग है, उत्तराखण्ड उसकी पूर्ति नहीं कर पाता। इस कार्य के लिए सामूहिक प्रयास बहुत जरूरी है ताकि बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण देकर इस तरह के उत्पाद अधिक मात्रा में बनाए जा सकें और उन्हें देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचाया जा सके।

पर्वतीय ग्रामीण क्षेत्रों की जीवन शैली में कई चुनौतियां हैं जिनकी वजह से यहां की उत्पादकता बहुत सीमित हो जाती है। शाम होते ही यहां घना अंधकार पसर जाता है और लोग अपने- अपने घरों में लौट जाते हैं। रात में करने के लिए कुछ भी नहीं होता। शायद यही वजह है कि इन प्रदेशों में लोग शाम होते ही खा- पीकर जल्दी सो जाते हैं।

महिलाओं के इस खाली समय का सदुपयोग करने और इस समय को उत्पादक बनाने के लिए ‘हमारा गांव-घर फाउंडेशन’ की यह कार्यशाला अब रंग ला रही है। दिन के साथ ही अब रात को भी गांव की महिलाएं पिरूल से नए-नए प्रयोग कर रही हैं। फाउंडेशन इन महिलाओं के उत्पाद को बाजार उपलब्ध करवाएगा जिससे गांव की आर्थिकी में भी सुधार होगा। पुस्तकालय गांव मणिगुह में कुछ पुराने शिल्पकार भी हैं जो पीढ़ियों से रिंगाल के उत्पाद बनाते आए हैं लेकिन रिंगाल की अनुपलब्धता और प्लास्टिक के बर्तनों के प्रचार की वजह से उनका काम धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। पिरूल के साथ ऐसी समस्या नहीं है। पिरूल हर गांव में बहुतायत से उपलब्ध है और इसे जमा करना भी आसान है।

कुमाऊं के अलावा गढ़वाल क्षेत्र में भी पिरूल हस्तशिल्प की बहुत संभावनाएं हैं। चार धाम यात्रा की वजह से इस क्षेत्र में देश-विदेश के सैलानी और तीर्थयात्री बड़ी संख्यां में आते हैं। यहां अगर इस हस्तशिल्प को एक संगठित उद्योग की तरह प्रचारित किया जाए तो यह क्षेत्र की महिलाओं और हस्तशिल्पकारों के लिए एक अच्छा वैकल्पिक रोजगार बन सकता है। कुमाऊं क्षेत्र की बात करें तो यहां पिरूल हस्तशिल्प अब एक रोजगार का रूप ले चुका है और कई गांव इस कला के माध्यम से अच्छी कमाई कर रहे हैं। यहां की महिलाएं छोटे-छोटे समूह बनाकर पिरूल से कई प्रकार की वस्तुएं बनाती हैं जो अच्छे मूल्य पर बिक भी जाती हैं। गढ़वाल क्षेत्र में भी ऐसे शिल्पकारों द्वारा ऐसी कलाओं के नियमित प्रशिक्षण की आवश्यकता है ताकि यहां के पर्वतीय गांव में आत्मनिर्भर हो सकें। एक आंकड़े के अनुसार प्रति वर्ष लगभग पचास लाख टन पिरूल नीचे गिरता है और पर्वतीय जंगलों में आग लगने का यह एक मुख्य कारण है। चीड़ के वनों को उत्तराखण्ड की जैव विविधता के लिए अभिशाप समझा जाने लगा है जबकि चीड़ के पेड़ से अनेकों उत्पाद बनाए जा सकते हैं और उन्हें दुनिया भर में बेचा जा सकता है। चीड़ के हरे पत्तों से ग्रीन-टी बनाई जाती है जो स्वांस के रोगों के लिए बड़ी कारगर होती है।

पुस्तकालय गांव के बंडी क्षेत्र की कई महिलाएं इस कला को लेकर काफी उत्साहित हैं। महिलाओं ने इस कार्यशाला के दौरान पिरूल से राखी, टोकरी, फूलदान, कछुआ, झुमके, पूजा थाल, आसन, पेन स्टैंड, डोरमैट, टी कोस्टर, डाइनिंग मैट, ईयर रिंग, फूलदान, मोबाइल चार्जिंग पाॅकेट, पर्स, हैट, पेंडेंट, अंगूठी, आदि कई वस्तुएं बनाईं। इन महिलाओं ने कार्यशाला की समाप्ति पर अपना निश्चय दोहराया कि वे इसका अभ्यास करती रहेंगी। फाउंडेशन ने उन्हें
प्रोत्साहित करने के लिए उनके उत्पाद खरीदने की घोषणा की।

पुस्तकालय गांव मणिगुह की कुछ महिलाओं ने इस हस्तशिल्प में अपनी गहरी रुचि दिखाई है और फाउंडेशन उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए हर संभव मदद कर रहा है। बीना नेगी मिश्र कहती हैं कि फाउंडेशन पुस्तकालय गांव की महिलाओं की हर संभव मदद करेगा और उनके उत्पाद खरीद कर उन्हें प्रोत्साहित करता रहेगा। पुस्तकालय गांव में मंडवा, झंगोरा और रामदाना (चैलाई) जैसे खाद्यान भी बहुतायत से होते हैं। प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल को मिलेट वर्ष घोषित किया है। ग्रामीणों को इनकी उपज का उचित मूल्य मिल सके इस के लिए भी फाउंडेशन कार्यरत है। फाउंडेशन ने अभी हाल ही में पुस्तकालय गांव में ग्रामीणों को होम-स्टे के लिए भी प्रोत्साहित किया है। इन होम-स्टे में कई परिवारों ने इस गांव की नैसर्गिक सुंदरता का आनंद लिया है।

चीड़ की उपयोगिता

चीड़ के पेड़ भारत में ही नहीं, विश्व भर में पाए जाते हैं और इन का उपयोग विदेशों में कई प्रकार से किया जाता है। धीरे-धीरे भारत भी चीड़ के महत्व से परिचित हो रहा है और इस अभिशाप को एक वरदान के रूप में देखा जाने लगा है। उत्तराखण्ड के कई हस्तशिल्पकार चीड़ के पत्तों से आभूषण और रोजमर्रा की वस्तुएं जैसे टोकड़ी और सजावट के सामान बना रहे हैं और इनकी मांग देश-विदेश में बहुत ज्यादा है। चीड़ के पत्तों से ग्रीन टी, इसकी छाल से कई हस्तशिल्प और यहां तक कि कुकीज भी बनाए जा सकते हैं। मुंह के छालों से छुटकारा पाने में चीड़ के पेड़ से निकलने वाला गोंद काफी फायदेमंद साबित होता है। इसके गोंद से गार्गिल करने से इस समस्या से निजात मिल जाती है। चीड़ को विटामिन सी का पावर हाउस कहा जाता है। विटामिन की मात्रा शरीर में जाने से शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र काफी मजबूत होता है। इससे विभिन्न प्रकार के रोगों से बचाव संभव है। साथ ही इस पेड़ के छिलकों में काफी ज्यादा मात्रा में विटामिन सी मौजूद होता है। पाइन अथवा चीड़ की छाल में विटामिन ए और कैरोटिनाइड की मात्रा भी काफी अधिक होती है। कैरोटिनाइड वास्तव में एक प्रकार का एंटी-आॅक्सीडेंट है, जो खास-तौर से आंखों की रोशनी को बढ़ाने का काम करते हैं। चीड़ में मौजूद विटामिन ए बालों और त्वचा के लिए भी लाभकारी होता है।

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