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Indian Economy

जानिए कैसे बनता है बजट, कौन बनाता है बजट, क्या है जीडीपी

बजट, आम शब्दों में कहें तो सरकार का बही खाता। सरकार हर साल अपने बही खाते को देखती है और पूरे देश के लिए बजट तैयार करती है। लेकिन ये बजट है क्या, जिसकों लेकर पूरे देश को इसका इंतजार रहता है। हर व्यक्ति हर महीने अपने घर का बजट बनाता है। अपने घर का बजट व्यक्ति अपनी आमदनी के हिसाब से बनाता है। कहा कितना खर्च हो रहा है किससे कितना बच रहा है। किन चीजों पर ज्यादा खर्च हो रहा और किन चीजों से ज्यादा कमाई आ रही है। वैसे ही सरकार देश के बजट को तैयार करती है। बजट को समझने के लिए हमे सबसे पहले जीडीपी को समझना होगा।

जीडीपी क्या होती है।

जीडीपी को हिंदी में सकल घरेलू उत्पाद कहते है। सकल का मतलब सभी और घरेलू का घर से संबंधी। पंरतु सरकार के लिए घर का अर्थ देश होता है। क्योंकि सरकार किसी एक घर के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए बजट तैयार करती है। उत्पाद का मतलब उत्पादन, प्रोड्क्शन। कुल मिलाकर देश में हो रहा हर तरह का उत्पादन, यानि कारखानों में या फैक्ट्ररियों में। कुछ साल पहले इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और कंप्यूटर जैसी अलग-अलग सेवाओं यानी सर्विस सेक्टर को भी जोड़ दिया गया। इस तरह उत्पादन और सेवा क्षेत्र की तरक्की या गिरावट का जो आंकड़ा होता है, उसे जीडीपी कहते हैं।

अब इसे आसान शब्दों में समझाए तो मान लीजिए आपके पास एक खेत धान का है। किसान धान बेचकर पैसा कमाता है, और वह पैसा किसान के खाते में आता है। इसलिए पैसा देश का भी है। अब धान से कितने तरह के प्रोड्क्ट बनते है। दुकानदार प्रोडक्ट को खरीदते है। दुकानदार से आम आदमी प्रोडक्ट खरीदता है। आम आदमी पैसा खर्च करता है और दुकानदार के पास पैसा आ जाता है। इसे खरीदने में पैसे खर्च होते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में जो पैसा आता है, वही जीडीपी है।

सबसे पहले तय होता है बेस ईयर। यानी आधार वर्ष। एक आधार वर्ष में देश का जो उत्पादन था, वो इस साल की तुलना में कितना घटा-बढ़ा है? इस घटाव-बढ़ाव में जो रेट होता है, उसे ही जीडीपी कहते हैं। अगर उत्पादन बढ़ा है तो जीडीपी बढ़ी है। अगर तुलनात्मक रूप से उत्पादन घटा है तो जीडीपी में कमी आई है। इसे कॉन्स्ट्रैंट प्राइस कहते हैं, जिसके आधार पर जीडीपी तय की जाती है। यानी कि कीमत स्थिर रहती है। इसके अलावा एक और तरीका भी है। इसे करेंट प्राइस कहते हैं। चूंकि हर साल उत्पादन और अन्य चीजों की कीमतें घटती-बढ़ती रहती हैं, इसलिए इस तरीके को भी जीडीपी नापने के काम में लाया जाता है, जिसमें महंगाई दर भी शामिल होती है। हालांकि अपने देश में अभी करेंट प्राइस पर जीडीपी नहीं नापी जाती है। लेकिन इसकी मांग लंबे वक्त से हो रही है। केंद्र सरकार ने देश को जो पांच ट्रिलियन इकनॉमी बनाने की बात कही है, उसके लिए करेंट प्राइस को ही आधार बनाया गया है। जीडीपी का आंकलन देश की सीमाओं के अंदर होता है। यानी गणना उसी आंकड़े पर होगी, जिसका उत्पादन अपने देश में हुआ हो। इसमें सेवाएं भी शामिल हैं। मतलब बाहर से आयातित चीज़ों का जीडीपी में कोई बड़ा हाथ नहीं है।

जीडीपी की गणना हर तिमाही होती है। जिम्मेदारी मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिक्स ऐंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन के तहत आने वाले सेंट्रल स्टेटिक्स ऑफिस की। सरकार हर तीन महीने के बाद देखती है कि देश में पिछली तिमाही की तुलना में कितना उत्पादन बढ़ा है और कितना घटा। भारत में जीडीपी मुख्यत तीन प्रमुख चीजों पर आधारित होती है। कृषि, सेवा और उद्योग। इन तीनों को ध्यान में रखकर देश का बजट तैयार किया जाता है।
इसके लिए देश में जितना भी प्रोडक्शन होता है, जितना भी व्यक्तिगत उपभोग होता है, व्यवसाय में जितना निवेश होता है और सरकार देश के अंदर जितने पैसे खर्च करती है उसे जोड़ दिया जाता है। इसके अलावा कुल निर्यात (विदेश के लिए जो चीजें बेची गईं है) में से कुल आयात (विदेश से जो चीजें अपने देश के लिए मंगाई गई हैं) को घटा दिया जाता है। जो आंकड़ा सामने आता है, उसे भी ऊपर किए गए खर्च में जोड़ दिया जाता है। यही हमारे देश की जीडीपी है।

कौन तैयार करता है बजट

देश का बजट बनाने के लिए देश का वित्त मंत्रालय, नीति आयोग, आर्थिक सलाहकार और सरकार के अन्य मंत्रालय मिलकर देश का बजट तैयार करते है। बजट डिविजन पर देश का बजट बनाने की जिम्मेदारी होती है। यह डिविजन नोडल एजेंसी होता है। बजट डिवीजन सभी मंत्रालयों, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, स्वायत्त निकायों, विभागों और रक्षा बलों को सर्कुलर जारी करके उन्हें अगले वर्ष के अनुमानों को बताने के लिए कहता है। मंत्रालयों और विभागों से मांगें प्राप्त होने के बाद वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग के बीच गहन चर्चा होती है। इसके अलावा आर्थिक मामलों का विभाग और राजस्व विभाग अर्थशास्त्रियों, कारोबारियों, किसान और सिविल सोसाइटी जैसे हितधारकों के साथ बैठक करते हैं। इस दौरान इनके विचार लिए जाते हैं। बजट पर काम कर रहे अधिकारी 100 के करीब होते है। जब बजट तैयार हो रहा होता है तो वह तीन-चार सप्ताह तक बाहर नहीं आ जा सकते। बजट बनाने की प्रक्रिया के दौरान उन्हें अपने परिजनों तक से बातचीत करने अथवा मिलने की अनुमति नहीं होती है।

इसके बाद बजट पेश करने की तारीख से पहले लोकसभा स्पीकर से सहमति ली जाती है। इसके बाद लोकसभा सचिवालय के महासचिव राष्ट्रपति से मंजूरी लेता है। वित्त मंत्री लोकसभा में बजट पेश करते हैं। बजट पेश करने से ठीक पहले समरी फॉर द कैबिनेट के जरिए बजट के प्रस्तावों पर कैबिनेट को संक्षेप में बताया जाता है। वित्त मंत्री के भाषण के बाद सदन के पटल पर बजट रखा जाता है। बजट पेश करते देश की संसद में विपक्ष का होना जरूरी है।

जीडीपी किसी देश के आर्थिक विकास का सबसे बड़ा पैमाना है। अधिक जीडीपी का मतलब है कि देश की आर्थिक बढ़ोतरी हो रही है। अगर जीडीपी बढ़ती है तो इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था ज्यादा रोजगार पैदा कर रही है। इसका ये भी मतलब है कि लोगों का जीवन स्तर भी आर्थिक तौर पर समृद्ध हो रहा है। इससे ये भी पता चलता है कि कौन से क्षेत्र में विकास हो रहा है और कौन का क्षेत्र आर्थिक तौर पर पिछड़ रहा है।

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