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समाज-सिनेमा में हिट है ‘स्त्री द्वेष’

सिनेमा को ग्लोरिफाई करना बिल्कुल वाजिब नहीं है, पहले भी सिनेमा में ऐसी फिल्मों की भरमार थी जो दो हिट फार्मूला अपनाती थी, एक तो स्त्री किरदारों का वस्तुकरण दूसरा हीरो को ‘अल्फा’ मेल दिखाने की भरसक कोशिश। यही आज की कई फिल्मों का भी हाल है। इसका ताजा उदाहरण फिल्म ‘एनिमल’ है। इसमें हिंसा से भरे ऐसे दृश्य हैं जो इसे अतिश्योक्ति से भरे अभिव्यक्तियों से भी पार ले जाते हैं। इतनी हत्याएं हो रही हैं फिल्म में, इतना कुछ गैर-कानूनी, असंवैधानिक सरेआम, लेकिन कोई कानून, कोई पुलिस व्यवस्था, कुछ नहीं है! खैर, फिक्शन का काम ही यही है, पर फिक्शन चरमपंथी विचारों को बढ़ावा देने के लिए नहीं होना चाहिए

सिनेमा सिर्फ अभिव्यक्ति तो नहीं है न, वह तमाम अभिव्यक्तियों के कारणों की जांच पड़ताल करता है। इसी प्रक्रिया के चलते वह समाज में व्याप्त रूढ़िवादियों और थोपे गए बिंबों को तोड़ता है। ठीक है कि व्यावसायिक सिनेमा में ऐसा संभव न के बराबर होता है लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी संख्या के दर्शकों की इस तरह की स्थिति हुई कैसे, यह सब अचानक तो नहीं हुआ! फिल्म ‘एनिमल’ के रिव्यू के बहाने और वैसे भी पुराने समय के सिनेमा को ग्लोरिफाई करना बिल्कुल वाजिब नहीं है, पहले भी सिनेमा में ऐसी फिल्मों की भरमार थी जो दो हिट फार्मूला अपनाती थी, एक तो स्त्री किरदारों का वस्तुकरण दूसरा हीरो को ‘अल्फा’ मेल दिखाने की भरसक कोशिश। यही आज की कई फिल्मों का भी हाल है।

 


फिल्म के एक दृश्य में इंटीमेट रणबीर कपूर और रश्मिका मंदारा

इसका ताजा उदाहरण जरूर फिल्म ‘एनिमल’ है लेकिन हिंदी सिनेमा की कई ऐसी फिल्में हैं जो इस लीग को तोड़ती हैं, मसलन 1982 में रमेश सिप्पी के निर्देशन में आई फिल्म ‘शक्ति’। इसकी पटकथा लिखी थी सलीम-जावेद की जोड़ी ने। यहां भी एक पिता और बेटे की कहानी है। दिलीप कुमार पिता और अमिताभ बच्चन बेटे की भूमिका में हैं, बेटे के मन में अपने पिता को लेकर कई असहमतियां होती हैं, नफरत होती है। मगर यहां बेटा खून की नदियां नहीं बहाता, हिंसा का सहारा नहीं लेता!

 

 

 

‘एनिमल’ में हिंसा से भरे ऐसे दृश्य हैं जो इसे अतिशयोक्ति से भरे अभिव्यक्तियों से भी पार ले जाते हैं। इतनी हत्याएं हो रही हैं फिल्म में, इतना कुछ गैर-कानूनी, असंवैधानिक सरेआम, लेकिन कोई कानून, कोई पुलिस व्यवस्था, कुछ नहीं है! खैर, फिक्शन का काम ही यही है, पर फिक्शन चरमपंथी विचारों को बढ़ावा देने के लिए नहीं होना चाहिए न! पिता-पुत्र के संबंध पर एक बड़ी खूबसूरत फिल्म का उदाहरण लीजिए, 1983 में शेखर कपूर के निर्देशन में आई फिल्म ‘मासूम’, यह फिल्म लेखक एरिक सीगल के उपन्यास ‘मैन, वुमेन एण्ड चाइल्ड’ पर आधारित थी। इस फिल्म के स्क्रीन राइटर गुलजार थे।

फिल्म में हीरो नसीरुद्दीन शाह का किरदार बिलकुल ‘अल्फा’ टाइप का नहीं है, जो कि सहज बात है। एक्स्ट्रा मैरिटल संबंध से उसे एक बेटा होता है, जिसकी अंततः जिम्मेदारी वह खुद लेता है और बड़ी खूबसूरती से उस

फिल्म के एक दृश्य में रणबीर कपूर

बच्चे की मनोस्थिति को समझते हुए उसके साथ तथाकथित पिता नहीं, बल्कि एक दोस्त की तरह व्यवहार करता है। सिनेमा को समृद्ध ऐसी फिल्में ही बनाती हैं। ‘एनिमल’ तो बार-बार अतीत में ले जाती है और पिछड़ा बनाने के लिए, एक पिछड़ा वर्ग बने रहने के लिए प्रेरित करती है। जहां स्त्रियों को वस्तु समझो और मार-काट, जबरन यौन संबंध को मर्दानगी!

एक बेहद गंभीर बात यह है कि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग ऐसी फिल्में देखता है, नजरअंदाज कर दूसरी अच्छी फिल्म भी तो वह देख सकता है। लेकिन शायद ‘एनिमल’ फिल्म के निर्देशक संदीप रेड्डी वांगा यह समझ चुके हैं कि फिल्म तब जरूर हिट होगी जब फिल्म की कहानी के विषयवस्तु का सीधा संबंध सामाजिक परिवेश से होगा और परिवेश तो यही है कि औरतों को चाहे जब उठाया जा रहा है, बलात्कार किया जा रहा है, पति अपनी पत्नी, बेटी, मां को चाहे जब मार-पीट रहा है, कोई किसी को भी मार दे रहा है, चलते-फिरते छेड़खानी आम है।

ऐसे में संदीप रेड्डी का सिनेमा तो समाज के यथार्थ के बेहद क़रीब ले जाता है। संदीप रेड्डी की पिछली दोनों फिल्में भी यही सब संदेश दे रही थी, ‘कबीर सिंह’ और ‘अर्जुन रेड्डी’! ‘एनिमल’ फिल्म के अंत में इस पूरी मार-काट के मूल में ख़राब पैरेंटिंग का मुद्दा जोड़ दिया जाता है। यह वाकई हिंसा से भरे फिल्म को किसी दावे को न्यायोचित ठहराने के लिए किया जाना ही नजर आता है।

याद करिए कोई भारतीय फिल्म जो पिता और बेटी के रिश्ते पर केंद्रित हो। यकायक जेहन में याद नहीं आएगी, मगर ऐसा नहीं है कि इस विषय पर सिनेमा ने काम नहीं किया है। ‘बेटी’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘हम तो चले परदेस’ आदि मूवीज हैं पर करीब से देखने-समझने पर सार यह निकलेगा कि यह सारी फिल्में एक तरह की ‘आदर्श बेटी’ की बात करती हैं, भारतीय बेटियां अगर ऐसी नहीं हैं तो हो जाएं! इन सबसे इतर इस विषय पर कई निर्देशक हैं जो सिनेमा को उसके तार्किकता के साथ सामने ला रहे हैं जिसमें मुझे 2015 में आई शूजित सरकार द्वारा निर्देशित फिल्म ‘पीकू’ सबसे अधिक प्रभावशाली फिल्म लगती है, विशेषकर अपनी हर फिल्म में पितृसत्तात्मक डोज खाने वाली सिनेमा में ऐसी फिल्म का आना बेहद सकारात्मक और संजीदा पहलू देता है। यहां एक बेटी है जो अपने पिता की देखभाल के साथ-साथ सब कुछ सहजता और सामान्य तरीके से संभाल रही है बिना मैस्क्युलिन हुए। यानी निर्देशक को बिल्कुल नहीं दिखाना पड़ा कि मजबूत किरदार पोट्रेट करने के लिए कतई जरूरी नहीं कि उसे मैस्कुलिन दिखाया जाए।

क्या हर बार सिनेमा में पुरुष किरदार को सौम्य और कोमल दिखाने के लिए उसे फेमिनिन लुक दिया जाता है? नहीं ना। मगर स्त्री किरदारों को मजबूत दिखाने के लिए यह सार्वभौमिक टाइप दबाव पटकथा लेखक और निर्देशक पर अक्सर देखा जा सकता है। कई लोगों ने इस सोच को तोड़ा है। ‘पीकू’ इस लीग से हटकर अलग खड़ी फिल्म नजर आती है।

 

 

रणबीर कपूर और बॉबी देओल के बीच मारपीट

‘एनिमल’ कमर्शियली हिट है, मगर अपील नहीं करती। यह पूरी तरह से हिट फॉर्मूला बेस्ड फिल्म है। मेरे एक मित्र जो सिनेमा आलोचक हैं वे कहते हैं कि अच्छा सिनेमा इसलिए कम बनता है क्योंकि अच्छे दर्शक नहीं हैं यहां। मेरा सवाल यही है कि अच्छे दर्शक तैयार करने की जिम्मेदारी किसकी है? सुधीर मिश्र और एटली जैसे निर्देशक भी इसी दौर में हैं न जो कमर्शियल अच्छी फिल्म ‘अफवाह’ और ‘जवान’ जैसी फिल्म बना रहे हैं न?! हाल ही में अविनाश शरण के निर्देशन में एक शानदार फिल्म ‘थ्री ऑफ अस’ आई। लेकिन हुआ क्या, जल्द ही सिनेमाघरों से उतर गई। मुझे उस मित्र की याद आई जिसने कहा था कि अच्छा सिनेमा देखने वाले दर्शक नहीं हैं। कभी नेहरू- युगीन सिनेमा था, ‘श्री 420’ में बेढंग कपड़े पहने एक बेघरबार नायक उस नेहरू की राजनीति को नायकत्व देता था, गाता था-‘निकल पड़े हैं खुली सड़क पर अपना सीना ताने/मंजिल कहां, कहां रुकना है, ऊपर वाला जाने/नादान हैं जो बैठे किनारे, पूछें राह वतन की/ चलना जीवन की कहानी, रुकना मौत की निशानी’। मैं यहां ‘एनिमल’ के किस हिस्से को इसके पैरेलल में रखूं? आज की अधिकतर सिनेमा किसकी राजनीति और रणनीति का पैरोकार है पता नहीं, पर इसके हीरो नायकत्व तो सिर्फ हिंसा और तथाकथित मर्दवाद का कर रहे हैं।

(लेखिका लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ से जुड़ी हैं एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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