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कोरोना से बचने को वरुण धवन ने 2020 में दिलाई 1920 की याद 

इस समय कोरोना महामारी ने दुनियाभर में कहर मचाया हुआ है। भारत में लॉकडाउन के चार फेज निकलने के बाद अनलॉक 1 किया गया है। इसका मतलब ये नहीं है कि कोरोना महामारी का खतरा टल गया या कम हो गया, बल्कि देशभर में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में फिल्म और रंगमंच से जुड़े कई कलाकार इस महामारी को लेकर लोगों को जागरुक कर रहे हैं। उन्ही में से एक है फिल्म अभिनेता वरुण धवन जिन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर 1920 में फैली महामारी की कुछ तस्वीरें शेयर की हैं।

इन तस्वीरों के साथ लिखी बातों में उन्होंने देशवासियों से अपनी जिम्मेदारी समझने की अपील की है। वरुण ने अपनी पोस्ट में लिखा है- ‘1920 और 2020’। दुनिया पहले भी इन हालातों से गुजरी है। हमें अपने डॉक्टरों, पुलिस बल और फ्रंट लाइन योद्धाओं की मदद करनी होगी साथ ही उनका सम्मान भी करना होगा। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार भारत की जून 2020 की आबादी 1 अरब 38 करोड़ 4 हजार 385 अनुमानित है। भारत की जनसंख्या कुल विश्व जनसंख्या के 17.7% के बराबर है। ऐसे में हम सभी को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

वरुण की इस पोस्ट को सोशल मीडिया पर खूब पसंद किया जा रहा है। वरुण के फैंस और उनके दोस्त इस पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। वरुण की पोस्ट पर लोग उनसे सहमत नजर आ रहे हैं। जो लोग 1920 में फैली महामारी के बारे में नहीं जानते हैं उनको बताना चाहेंगे कि स्पेनिश फ्लू, जिसे 1918 फ्लू महामारी के रूप में भी जाना जाता है। H1N1 इन्फ्लूएंजा एक वायरस के कारण फैली घातक महामारी थी। फरवरी 1918 में यह वायरस फैलना शुरू हुआ था और अप्रैल 1920 तक इसकी मौजूदगी रही। इस महामारी ने 500 मिलियन लोगों को संक्रमित किया था जो उस समय दुनिया की पूरी आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा था।

इस महामारी के कारण मरने वालों की संख्या संभवतः 100 मिलियन से अधिक थी, जिससे यह मानव इतिहास में सबसे घातक महामारियों में से एक बन गई थी। कोरोना की तरह ही यह वायरस तब फैलता था जब किसी संक्रमित व्यक्ति को छींक या खांसी आती थी। इस फ्लू के दुनियाभर में फैलने का एक बड़ा कारण यात्राएं थीं।  साल 1918 में सबसे पहले मार्च के दूसरे हफ्ते में बीमारी का पहला मरीज सामने आया था जिसका नाम था अल्बर्ट गिट्चेल। ये मरीज यूएम आर्मी में रसोइये का काम करता था। 104 डिग्री बुखार के साथ उसे कंसास के अस्पताल में भर्ती कराया गया।

जल्द ही ये बुखार सेना के 54 हजार टुकड़ियों में फैल गया। मार्च के आखिर तक हजारों सैनिक अस्पताल पहुंच गए और 38 सैनिकों की गंभीर न्यूमोनिया से मौत हो गई। बीमारी सैनिकों में पहले विश्व युद्द के दौरान खंदकों, कैंपों में खराब हालातों में रहने की वजह से आई थी। लड़ाई तो 1918 के अंत तक खत्म हो गई, लेकिन लगभग 4 सालों तक साफ-सफाई न मिलने और ठीक खाना न मिलने के कारण स्पेनिश फ्लू फैला। फ्रांस के सीमावर्ती खंदकों में भयंकर गंदगी के कारण वायरस सैनिकों के फेफड़ों तक पहुंचा। लड़ाई के बाद घर लौटे सैनिक अपने साथ ये बीमारी लेकर लौटे। मई तक इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन और इटली के सैनिक और आम लोग भी स्पेनिश फ्लू का शिकार हो चुके थे।

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