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  •      जर्नादन कुमार सिंह

 

वर्ष 1988 वह साल था जब पंजाब में उग्रवादी-अलगाववादी विद्रोह चरम पर था इसी साल 8 मार्च के दिन अमर सिंह चमकीला की महज 27 वर्ष की उम्र में हत्या कर दी गई। ‘पंजाब का एल्विस’ और ‘रॉकस्टार’ कहे जाने वाले चमकीला ऐसे शख्स थे जो अपनी आवाज और गीत की ताकत से भारी भीड़ (अखाड़ों) को नियंत्रित करने का बूता रखते थे। उन्होंने अपने गीतों के जरिए सामंती पंजाब में जाट गौरव, कृषि श्रमिकों की दुर्दशा, नशा, दहेज, घरेलू हिंसा पर करारा वार किया था। उनका कसूर सिर्फ यह था कि वे एक दलित के घर पैदा हुए। समाज के ठेकेदारों को उनके लोक गीतों की लोकप्रियता हजम नहीं हो रही थी, जिसके चलते उन पर अश्लील गीत गाने के आरोप लगाए गए। जिनको अश्लील गीत कहा गया उन्हें महिलाएं शादी-विवाह में गाती थीं। जाति और धर्म के नाम पर समाज को बांटने वालों को यह गंवारा नहीं था कि एक दलित का बेटा सिख जाट की बेटी अमरजोत कौर से शादी करे। फलस्वरूप अमर सिंह चमकीला की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई। दशकों बाद भी चमकीला की हत्या का राज पर्दाफाश नहीं हो सका है। ऐसे में इम्तियाज अली ने अमर सिंह चमकीला बायोपिक के जरिए एक बार फिर पंजाब की जाति व्यवस्था पर कुठाराघात किया है। इस फिल्म में बहुत ईमानदारी से जातिवाद की समस्या को दिखाया गया है। नेटफिलिक्स पर रीलीज हुई यह बायोपिक सुपरहिट की श्रेणी में शुमार हो चुकी है। सोशल मीडिया पर इस फिल्म के दीवानों ने एक स्वस्थ बहस शुरू कर दी है

फिल्म ‘चमकीला’ एक जमाने में पंजाब के सबसे मशहूर और सबसे महंगे गायक रहे अमर सिंह चमकीला की जीवनी पर आधारित है। चमार परिवार में जन्मा यह सितारा जातिवादी लोगों की नफरत का शिकार हो गया। जिन्होंने बड़ी बेरहमी से पत्नी के साथ इनकी भी हत्या कर दी। इस हत्या कांड मे कोई गिरफ्तारी नहीं हुई थी। महज 27 साल की उम्र में ही चमकीला इतने चमक चुके थे कि बाकी के गायक उनके सामने बहुत फीके नजर आने लगे थे। हालात यह हो गए थे कि लोग शादी की तारीख तब तय करते जब चमकीला के अखाड़े की तारीख मिल जाती थी। अमर सिंह चमकीला की कहानी यह दिखाती है कि समाज चाहे जहां का भी हो, जिस भी प्रदेश का हो या जिस भी धर्म का हो, समाज एक जैसा ही है। भौगोलिक स्थितियां बदल जाती हैं, खाना, बोली व परिधान बदल जाते हैं पर समाज नहीं बदलता है। फिल्म में नायक चमकीला द्वारा लिखे व गाए गानों में समाज की एक वास्तविकता दिखती है। लोगों को गाने पसंद आते हैं और लोग सुनते हैं पर समाज के एक तबके को चमकीला के गाने नहीं पसंद आते हैं। हालांकि फिल्म में दिखाया गया है कि वह तबका भी चोरी छिपे चमकीला के ही गाने सुनता है। चमकीला को धमकी दी जाती है कि ऐसे गाने न गाएं नहीं तो परिणाम भुगतना होगा। अंततः चमकीला की गोली मारकर हत्या कर दी जाती है। दरअसल, जब लोग अपनी पसंद या मनमुताबिक चीजें नहीं करवा पाते तो उसे धर्म या समाज के हिसाब से गलत बताते हैं और यह कहते हैं कि इससे समाज या धर्म की छवि खराब हो रही है।

यह फिल्म दिखाती है कि समाज में मौजूद कुछ चीजें जब सामने आती हैं तो समाज असहज हो जाता है। समाज उन चीजों में सुधार लाने के बावजूद आपको चुप रहने को कहता है। जब तक चीजें पर्दे में रहती हैं तब तक लोग उस पर बात नहीं करते हैं। गलत को गलत जानते हुए भी उसे गलत नहीं बोलते क्योंकि वह समय के साथ उनका अंग बन चुकी होती हैं पर जब कोई चीज बाहर आ जाती है तो लोग उसे दबाना चाहते हैं न कि उसे बदलना। फिल्म के एक दृश्य में जब नायिका की बहनें कहती हैं कि कितना गंदा आदमी है, ऐसे गाने कैसे लिख लेता है, औरतों के बारे में इतना गंदा कैसे सोच लेता है। तब वहां बैठी एक वृद्ध महिला कहती है कि सोचते तो सारे मर्द हैं पर चमकीला बोल देता है फिर वहां मौजूद अन्य महिलाएं कहती हैं कि इसमें नया क्या है? हम लोग भी तो शादियों में ऐसे ही गाने गाते हैं। वृद्ध महिला व अन्य महिलाओं की बातें बिल्कुल सही हैं अगर आप भी अपने क्षेत्र में देखेंगे तो आपको ऐसे गीत मिल जाते हैं जो अक्सर शादियों में महिलाओं के द्वारा गाए जाते हैं।

फिल्म के एक दृश्य में जब धर्म के ठेकेदारों से चमकीला की बात होती है तो चमकीला बोलता है कि सिर्फ मैं ही तो नहीं हूं जो ये सब करा रहा है और भी तो गायक हैं जो गंदे गाने गाते हैं मुझसे भी ज्यादा गंदे गाने गाते हैं पर मुझे ही क्यों रोका जा रहा है। दरअसल उनको दिक्कत गाने से नहीं थी दिक्कत इस बात से थी कि चमकीला की आवाज पंजाब की चारदीवारी से बाहर निकल गई थी। चमकीला की ख्याति से समाज व धर्म को खतरा पैदा हुआ था, अगर चमकीला इतना बड़ा कलाकार नहीं बना होता या उसके गाने इतने न चले होते तो शायद उससे समाज या धर्म को कोई खतरा नहीं होता और शायद चमकीला की हत्या न की गई होती।

एक दर्शक का कहना है कि जो शख्स एक फिल्म के टाइटल को लेकर आशंकित हो कि कही ये द्विअर्थी तो नहीं। जो करण जौहर की पहली फिल्म ‘कुछ-कुछ होता है’ के गाने लिखने से सिर्फ इसलिए मना कर दिया कि कही ये फिल्म अश्लील ना हो और जिसे सरकाई लो खटिया समाज के लिए घातक लगता तो वो भला चमकीला के गानों को कैसे हजम कर सकते हैं? सरकाई लो खटिया तो उसके सामने बच्चा सांग है। चमकीला ने बचपन में वही सब देखा कोई लड़की किसी लड़के के साथ खेतों में गई। कोई किसी लड़की को छुपकर नहाते हुए देख रहा है। चमकीला ने अपने समाज के आसपास वही सब देखा और उसको वो अपने गानों में पिरो दिया। क्योंकि वो जान चुका था लोग इसी तरह के गानों को पसंद कर रहे हैं। अगर ना कर रहे होते तो वो भला चलते? लेकिन वो खूब चले और चमकीला स्टार गायक बन गया। ऐसा नहीं कि सिर्फ वही गा रहा था इस तरह के गाने बाकी गायक भी गा रहे थे। लेकिन शोहरत, नाम और पैसा चमकीला के पास आया। जब पैसा आया तो दुश्मन भी आए।

चर्चाओं में फिल्म के डायलॉग
‘चमार हूं भूखा नहीं मरूंगा।’
‘अश्लीलता तो सबके अंदर होती है सब मर्द औरतों के बारे में लगभग एक जैसा सोचते हैं बस फर्क इतना है कि चमकीला कह देता है अपने गानों में और बाकी लोग नहीं कह पाते।’
‘जावेद अख्तर के गानों की दुनिया कभी भी चमकीला के गानों की दुनिया को नहीं समझ पाएगी…!’
‘गरीबी से निकल कर कोई वापस गरीब नहीं होना चाहता…।’
ये जो हम बकवास करते हैं ना
‘अमीरी ने गरीबी को बहलाने के लिए किताबों में लिखा जिसे हम शास्त्र कहते हैं…।’
‘गरीबी एक कोढ़ है..।’
‘और कोई भी इस कोढ़ को सीने से नहीं लगाता कि हम दरिद्र नारायण हैं…।’
बाप नाराज होता है कि तू सिख होकर केश (बाल) कटवा आया.. बेटा बोलता नहीं सीधे नोटों की गड्डी बाप की जेब में रखकर बोलता है ‘बापू हमारे हालात बदल जाएंगे मुझे गाने दंे, अब तू शराब देसी नहीं विलायती पियेगा…।’
प्रोग्राम अरेंज करने वाले से जब चमकीला पैसा बढ़ाने को कहता है तो वो चमकीला को उसकी जात याद दिलाता है और कहता है कि एक नीचे बैठने वाले को सिर पर नहीं बैठाया जाता।
और कहता है तू चमार हमारी बराबरी करेगा..??
‘संगीत कहां जात देखती है..?’
‘मोहम्मद रफी जात के नाई थे…।’

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